Sunday, July 5, 2020

गुलज़ार के शायराना गुलपोश से चुनिंदा फूल

आइना देख कर तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई


आंखों से आंसुओं के मरासिम पुराने हैं
मेहमां ये घर में आएं तो चुभता नहीं धुआं


चूल्हे नहीं जलाए कि बस्ती ही जल गई
कुछ रोज़ हो गए हैं अब उठता नहीं धुआं


ये दिल भी दोस्त ज़मीं की तरह
हो जाता है डांवा-डोल कभी


ये शुक्र है कि मिरे पास तेरा ग़म तो रहा
वगर्ना ज़िंदगी भर को रुला दिया होता


ख़ामोशी का हासिल भी इक लम्बी सी ख़ामोशी थी
उन की बात सुनी भी हम ने अपनी बात सुनाई भी

राख को भी कुरेद कर देखो
अभी जलता हो कोई पल शायद


दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई
जैसे एहसां उतारता है कोई

कल का हर वाक़िआ तुम्हारा था
आज की दास्तां हमारी है


कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है
ज़िंदगी एक नज़्म लगती है

कलम, आज उनकी जय बोल।

जिनके सिंहनाद से सहमी
धरती रही अभी तक डोल
कलम, आज उनकी जय बोल।

पूरी कविता - 

जला अस्थियाँ बारी-बारी
चिटकाई जिनमें चिंगारी,
जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर
लिए बिना गर्दन का मोल
कलम, आज उनकी जय बोल।

जो अगणित लघु दीप हमारे
तूफानों में एक किनारे,
जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन
माँगा नहीं स्नेह मुँह खोल
कलम, आज उनकी जय बोल।

पीकर जिनकी लाल शिखाएँ
उगल रही सौ लपट दिशाएं,
जिनके सिंहनाद से सहमी
धरती रही अभी तक डोल
कलम, आज उनकी जय बोल।

अंधा चकाचौंध का मारा
क्या जाने इतिहास बेचारा,
साखी हैं उनकी महिमा के
सूर्य चन्द्र भूगोल खगोल
कलम, आज उनकी जय बोल।

-दिनकर 

शकील बदायुनी की नज़्म: ज़लज़ला

एक शब हल्की सी जुम्बिश मुझे महसूस हुई 
मैं ये समझा मिरे शानों को हिलाता है कोई 

आँख उठाई तो ये देखा कि ज़मीं हिलती है 
जिस जगह शय कोई रक्खी है वहीं हिलती है 

सहन-ओ-दीवार की जुम्बिश है तो दर हिलते हैं 
बाहर आया तो ये देखा कि शजर हिलते हैं 

कोई शय जुम्बिश-ए-पैहम से नहीं है महरूम 
एक ताक़त है पस-ए-पर्दा मगर ना-मालूम 
 

चंद लम्हे भी ये नैरंगी-ए-आलम न रही 
ज़लज़ला ख़त्म हुआ जुम्बिश-ए-पैहम न रही 

हैरत-ए-दीद से अंगुश्त-ब-दंदाँ था मैं 
शाहिद-ए-जल्वा-ए-क़हहारी-ए-यज़्दाँ था मैं 

दफ़अतन एक सदा आह-ओ-फ़ुग़ाँ की आई 
मेरे अल्लाह ये घड़ी किस पे मुसीबत लाई 

गुल किया ज़लज़ला-ए-क़हर ने किस घर का चराग़ 
किस पे ढाया ये सितम किस को दिया हिज्र का दाग़ 

जा के नज़दीक ये नज़्ज़ारा-ए-हिरमाँ देखा 
एक हसीना को ब-सद हाल-ए-परेशाँ देखा 

बैज़वी शक्ल में थे हुस्न के जल्वे पिन्हाँ 
आँख में सेहर भरा था मगर आँसू थे रवाँ 

मैं ने घबरा के ये पूछा कि ये हालत क्यूँ है 
तेरी हस्ती हदफ़-ए-रंज-ओ-मुसीबत क्यूँ है 

बोली ऐ शाएर-ए-रंगीन-तबीअत मत पूछ 
रोज़-ओ-शब दिल पे गुज़रती है क़यामत मत पूछ 
लोग दुनिया को तिरी मुझ को ज़मीं कहते हैं 
अहल-ए-ज़र मुझ को मोहब्बत में हसीं कहते हैं 

मैं उन्हीं हुस्न-परस्तों की हूँ तड़पाई हुई 
तुझ से कहने को ये राज़ आई हूँ घबराई हुई 

ज़र-परस्तों से हैं बद-दिल मिरी दुनिया के ग़रीब 
हैं गिरफ़्तार-ए-सलासिल मिरी दुनिया के ग़रीब 

मुझ से ये ताज़ा बलाएँ नहीं देखी जाती 
ज़ालिमों की ये जफ़ाएँ नहीं देखी जातीं 
चाहती हूँ मिरे उश्शाक़ में कुछ फ़र्क़ न हो 
मुफ़्त में कश्ती-ए-एहसास-ए-वफ़ा ग़र्क़ न हो 

एक वो जिस को मयस्सर हों इमारात-ओ-नक़ीब 
एक वो जिस को न हो फूँस का छप्पर भी नसीब 

साहब-ए-दौलत-ओ-ज़ी-रुत्बा-ओ-ज़रदार हो एक 
बे-नवा ग़म-ज़दा-ओ-बेकस-ओ-लाचार हो एक 

एक मुख़्तार हो, औरंग-ए-जहाँबानी का 
इक मुरक़्क़ा हो ग़म-ओ-रंज-ओ-परेशानी का 
सख़्त नफ़रत है मुझे अपने परस्तारों से 
छीन लेते हैं मुझे मेरे तलब-गारों से 

चीरा-दस्ती का मिटा देती हैं सब जाह-ओ-जलाल 
हैफ़-सद-हैफ़ कि हाइल है ग़रीबों का ख़याल 

ये न होते तो दिखाती मैं क़यामत का समाँ 
ये न होते तो मिटाती मैं ग़ुरूर-ए-इंसाँ 

एक करवट में बदल देती निज़ाम-ए-आलम 
इक इशारे ही में हो जाती है ये महफ़िल बरहम 

इक तबस्सुम से जहाँ बर्क़-ब-दामाँ होता 
न ये आराइशें होतीं न ये सामाँ होता 
हर अदा पूछती सरमाया-परस्तों के मिज़ाज 
कुछ तो फ़रमाइए हज़रत कि हैं किस हाल में आज 

लख-पति संख-पती बे-सर-ओ-सामाँ होते 
जान बच जाए बस इस बात के ख़्वाहाँ होते 

बरसर-ए-ख़ाक नज़र आते हैं क़स्र-ओ-ऐवाँ 
अश्क-ए-ख़ूनीं से मिरे और भी उठते तूफ़ाँ 

मेरी आग़ोश में सब अहल-ए-सितम आ जाते 
मेरे बरताव से बस नाक में दम आ जाते 

बाज़ के मुँह ग़म-ए-आलाम से काले करती 
बाज़ को मौत की देवी के हवाले करती 
ख़ून-ए-ज़रदार ही मज़दूर की मज़दूरी है 
मैं जो ख़ामोश हूँ ये बाइस-ए-मजबूरी है 

मेरी आग़ोश में जाबिर भी हैं मजबूर भी हैं 
मेरे दामन ही से वाबस्ता ये मज़दूर भी हैं 

ज़ब्त करती हूँ जो ग़म आता है सह जाती हूँ 
जोश आता है मगर काँप के रह जाती हूँ

Saturday, July 4, 2020

दिल बस अब ज़ख़्म नया चाहता है

मसअला ख़त्म हुआ चाहता है
दिल बस अब ज़ख़्म नया चाहता है

कब तलक लोग अंधेरे में रहें
अब ये माहौल दिया चाहता है

मसअला मेरे तहफ़्फ़ुज़ का नहीं
शहर का शहर ख़ुदा चाहता है

मेरी तन्हाइयां लब मांगती हैं
मेरा दरवाज़ा सदा चाहता है

घर को जाते हुए शर्म आती है
रात का एक बजा चाहता है

चाहना, चाहत शायरी

मसअला ख़त्म हुआ चाहता है
दिल बस अब ज़ख़्म नया चाहता है
- शकील जमाली


मयस्सर से ज़ियादा चाहता है
समुंदर जैसे दरिया चाहता है
- अकरम नक़्क़ाश


इक सफ़र में कोई दो बार नहीं लुट सकता
अब दोबारा तिरी चाहत नहीं की जा सकती
- जमाल एहसानी


मसअला ख़त्म हुआ चाहता है
दिल बस अब ज़ख़्म नया चाहता है
- शकील जमाली

मयस्सर से ज़ियादा चाहता है
समुंदर जैसे दरिया चाहता है
- अकरम नक़्क़ाश


मैं रोना चाहता हूँ ख़ूब रोना चाहता हूँ मैं
फिर उस के बाद गहरी नींद सोना चाहता हूँ मैं
- फ़रहत एहसास

हम चाहते थे मौत ही हम को जुदा करे
अफ़्सोस अपना साथ वहाँ तक नहीं हुआ
- वसीम नादिर


सौ बार जिस को देख के हैरान हो चुके
जी चाहता है फिर उसे इक बार देखना
- सबा अकबराबादी

कुछ इस तरह से याद आते रहे हो
कि अब भूल जाने को जी चाहता है
- अख़्तर शीरानी


क्या बताऊँ कि कितनी शिद्दत से
तुम से मिलने को चाहता है जी
- इफ़्तिख़ार राग़िब

अब तो ये भी नहीं रहा एहसास

अब तो ये भी नहीं रहा एहसास 
दर्द होता है या नहीं होता 

इश्क़ जब तक न कर चुके रुस्वा 
आदमी काम का नहीं होता 

टूट पड़ता है दफ़अ'तन जो इश्क़ 
बेश-तर देर-पा नहीं होता 

वो भी होता है एक वक़्त कि जब 
मा-सिवा मा-सिवा नहीं होता 

हाए क्या हो गया तबीअ'त को 
ग़म भी राहत-फ़ज़ा नहीं होता 

दिल हमारा है या तुम्हारा है 
हम से ये फ़ैसला नहीं होता 

जिस पे तेरी नज़र नहीं होती 
उस की जानिब ख़ुदा नहीं होता 

मैं कि बे-ज़ार उम्र भर के लिए 
दिल कि दम-भर जुदा नहीं होता

वो हमारे क़रीब होते हैं 
जब हमारा पता नहीं होता 

दिल को क्या क्या सुकून होता है 
जब कोई आसरा नहीं होता 

हो के इक बार सामना उन से 
फिर कभी सामना नहीं होता

कुछ नहीं कोई बददुआ भेजो

अपनी मंज़िल का रास्ता भेजो 
जान हम को वहाँ बुला भेजो 

क्या हमारा नहीं रहा सावन 
ज़ुल्फ़ याँ भी कोई घटा भेजो 

नई कलियाँ जो अब खिली हैं वहाँ 
उन की ख़ुश्बू को इक ज़रा भेजो 


हम न जीते हैं और न मरते हैं 
दर्द भेजो न तुम दवा भेजो 

धूल उड़ती है जो उस आँगन में 
उस को भेजो सबा सबा भेजो 

ऐ फकीरो गली के उस गुल की 
तुम हमें अपनी ख़ाक-ए-पा भेजो 

शफ़क़-ए-शाम-ए-हिज्र के हाथों 
अपनी उतरी हुई क़बा भेजो 

कुछ तो रिश्ता है तुम से कम-बख़्तों 
कुछ नहीं कोई बद-दुआ' भेजो 

Friday, July 3, 2020

ठोकर शायरी

देख ठोकर बने न तारीकी
कोई सोया है पांव फैला कर
- आदिल मंसूरी


मिलती है पैरों को ताक़त
खा कर देख कभी तू ठोकर
- मुईन शादाब



समझाया था देख के चलिए
कैसी खाई ठोकर कहिए
- शाद आरफ़ी


एक ठोकर पे सफ़र ख़त्म हुआ
एक सौदा था कि सर से निकला
- राजेन्द्र मनचंदा बानी


नाकामियों से कम न हुआ हौसला मिरा
ठोकर लगी तो और संभलता चला गया
- रहमत इलाही बर्क़ आज़मी


किया करती है सज्दे मुझ को ठोकर
मुक़द्दस है मिरी आवारगी भी
- सुलेमान ख़ुमार

उस ने दरिया को लगा कर ठोकर
प्यास की उम्र बढ़ाई होगी
- अंजुम लुधियानवी


मार देती है ज़िंदगी ठोकर
ज़ेहन जब उल्टे पांव चलता है
- बलवान सिंह आज़र

ठोकर किसी पत्थर से अगर खाई है मैं ने
मंज़िल का निशां भी उसी पत्थर से मिला है
- बिस्मिल सईदी


इस अंधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगी
रात जंगल में कोई शम्अ जलाने से रही
- निदा फ़ाज़ली

Thursday, July 2, 2020

परवीन शाकिर की 3 चुनिंदा ग़ज़लें

अपनी तन्हाई मिरे नाम पे आबाद करे
कौन होगा जो मुझे उस की तरह याद करे

दिल अजब शहर कि जिस पर भी खुला दर इस का
वो मुसाफ़िर इसे हर सम्त से बरबाद करे

अपने क़ातिल की ज़ेहानत से परेशान हूँ मैं
रोज़ इक मौत नए तर्ज़ की ईजाद करे

इतना हैराँ हो मिरी बे-तलबी के आगे
वा क़फ़स में कोई दर ख़ुद मिरा सय्याद करे

सोच रखना भी जराएम में है शामिल अब तो
वही मासूम है हर बात पे जो साद करे

जब लहू बोल पड़े उस के गवाहों के ख़िलाफ़
क़ाज़ी-ए-शहर कुछ इस बाब में इरशाद करे

उस की मुट्ठी में बहुत रोज़ रहा मेरा वजूद
मेरे साहिर से कहो अब मुझे आज़ाद करे


2
बिछड़ा है जो इक बार तो मिलते नहीं देखा
इस ज़ख़्म को हम ने कभी सिलते नहीं देखा

इक बार जिसे चाट गई धूप की ख़्वाहिश
फिर शाख़ पे उस फूल को खिलते नहीं देखा

यक-लख़्त गिरा है तो जड़ें तक निकल आईं
जिस पेड़ को आँधी में भी हिलते नहीं देखा

काँटों में घिरे फूल को चूम आएगी लेकिन
तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा

किस तरह मिरी रूह हरी कर गया आख़िर
वो ज़हर जिसे जिस्म में खिलते नहीं देखा

3
बहुत रोया वो हम को याद कर के
हमारी ज़िंदगी बरबाद कर के

पलट कर फिर यहीं आ जाएँगे हम
वो देखे तो हमें आज़ाद कर के

रिहाई की कोई सूरत नहीं है
मगर हाँ मिन्नत-ए-सय्याद कर के

बदन मेरा छुआ था उस ने लेकिन
गया है रूह को आबाद कर के

हर आमिर तूल देना चाहता है
मुक़र्रर ज़ुल्म की मीआ'द कर के

Wednesday, July 1, 2020

कोई पेड़ यूँ ही बड़ा नहीं होता!

रास्ता कहाँ नहीं होता, बस हमें पता नहीं होता! 
बरसों मौसम के मिजाज सहता है, कोई पेड़ यूँ ही बड़ा नहीं होता!