Saturday, May 2, 2020

मजदूर शायरी

 
एक हथौड़े वाला घर में और हुआ। 
हाथी सा बलवान, जहाजी हाथों वाला और हुआ।
सूरज सा इंसान, तरेरी आंखोंवाला और हुआ। 

-केदारनाथ अग्रवाल

 ''जो शिलाएं तोड़ते हैं
जिन्दगी को वह गढ़ेंगे जो शिलाएं तोड़ते हैं
 जो भगीरथ नीर की निर्भय शिराएं मोड़ते हैं
 यज्ञ की इस शक्ति-श्रम को
 श्रेष्ठतम मैं मानता हूँ।''

-केदारनाथ अग्रवाल

मुनव्वर राणा ने लिखा-
सो जाते हैं फुटपाथ पर अखबार बिछा कर
मजदूर कभी नींद की गोली नहीं खाते। 


रामावतार त्यागी ने लिखा-

  ''किसी गुमनाम से इक गांव में पैदा हुए थे हम
 नहीं मालूम पर कोई अशुभ सा ही महीना था
 रजाई की जगह ओढ़ी पुआलों की भभक हमने 
 विरासत में मिला जो कुछ हमारा ही पसीना था। '' 

अकलमंदी हमारे नाम के आगे नहीं जुड़ती
मगर भोले नहीं इतना कि जितना आम दिखते हैं
हमें हस्ताक्षर करना न आया चेक पर माना
मगर दिल पर बड़ी कारीगरी से नाम लिखते हैं

हमारे अंत की चर्चा गुलाबों तक रहे सीमित
हमारे जन्म की तारीख काग़ज़ पर नहीं लिखना
न गंगाजल न हलाहल न कोई और ही जल हो
किसी लाचार आंसू को हमारे भाल पर लिखना।


वो जिसके हाथ में छाले हैं, पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बंगलों में आई है। 

महल से झोपड़ी तक एकदम घुटती उदासी है
किसी का पेट खाली है किसी की रूह प्यासी है

कि नंगी पीठ हो जाती है जब हम पेट ढँकते हैं
मेरे हिस्से की आज़ादी भिखारी के क़बा-सी है।

-अदम गोंडवी 



न हो कमीज़ तो पांवों से पेट ढँकते हैं
ये लोग कितने मुनासिब है इस सफर के लिए।
-दुष्यंत कुमार 

यश मालवीय ने लिखा- 

दूध नहीं मिलता 
बच्चे को खून पिलाती है
धधक रहे सूरज से खुलकर 
आंख मिलाती है
भूखे सच के आगे खुद कोरख कर देख रही
 पता नहीं रोटी झुलसी है
 या झुलसा चेहरा। 


साधन नहीं है कोई भी, भरने हैं कई पेट
इक टोकरी है, सर है कि मज़दूर दिवस है।
-ओम प्रकाश यती 

बात शायरी

बात से बात की गहराई चली जाती है 
झूट आ जाए तो सच्चाई चली जाती है 
-शकील आज़मी

ये सब कहने की बातें हैं कि ऐसा हो नहीं सकता 
मोहब्बत में जो दिल मिल जाए फिर क्या हो नहीं सकता 
-हफ़ीज़ जौनपुरी

मौत ख़ामोशी है चुप रहने से चुप लग जाएगी 
ज़िंदगी आवाज़ है बातें करो बातें करो 
- अहमद मुश्ताक़

तिरी आवाज़ को इस शहर की लहरें तरसती हैं 
ग़लत नंबर मिलाता हूँ तो पहरों बात होती है 
- ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

बोलते रहना क्यूँकि तुम्हारी बातों से 
लफ़्ज़ों का ये बहता दरिया अच्छा लगता है 
- अज्ञात
देर तक चंद मुख़्तसर बातें 
उस से कीं मैं ने आँख भर बातें 

तू मिरे पास जब नहीं होता 
तुझ से करता हूँ किस क़दर बातें 
-आसिम वास्ती

बात की बात ही इसे कहिए
क़हक़हे दर्द-ओ-ग़म मिटाते हैं
- मुमताज़ राशिद
सब्र पर दिल को तो आमादा किया है लेकिन 
होश उड़ जाते हैं अब भी तिरी आवाज़ के साथ 
- आसी उल्दनी

तुम ने छेड़ा तो कुछ खुले हम भी
बात पर बात याद आती है
- अज़ीज़ लखनवी

 
ये क्या कि बात बात पे बस दिल-लगी की बात
तुम भी तो पेश आओ कभी अपने-पन के साथ
- मुंतज़िर क़ाएमी

थी कभी बात बात में तासीर
अब दुआ में असर नहीं आता
- हफ़ीज़ जौनपुरी

बराबर से बच कर गुज़र जाने वाले

बराबर से बच कर गुज़र जाने वाले

ये नाले नहीं बे-असर जाने वाले

नहीं जानते कुछ कि जाना कहां है
चले जा रहे हैं मगर जाने वाले

मिरे दिल की बेताबियां भी लिए जा
दबे पांव मुंह फेर कर जाने वाले

तिरे इक इशारे पे साकित खड़े हैं
नहीं कह के सब से गुज़र जाने वाले

मोहब्बत में हम तो जिए हैं जिएंगे
वो होंगे कोई और मर जाने वाले

अकेला दिन है कोई और न तन्हा रात होती है

अकेला दिन है कोई और न तन्हा रात होती है 
मैं जिस पल से गुज़रता हूँ मोहब्बत साथ होती है 

तिरी आवाज़ को इस शहर की लहरें तरसती हैं 
ग़लत नंबर मिलाता हूँ तो पहरों बात होती है 

सरों पर ख़ौफ़-ए-रुस्वाई की चादर तान लेते हो 
तुम्हारे वास्ते रंगों की जब बरसात होती है 

कहीं चिड़ियाँ चहकती हैं कहीं कलियाँ चटकती हैं 
मगर मेरे मकाँ से आसमाँ तक रात होती है 

किसे आबाद समझूँ किस का शहर-आशोब लिखूँ मैं 
जहाँ शहरों की यकसाँ सूरत-ए-हालात होती है 

Friday, May 1, 2020

शायरों की कलम से बहे आंसू - शायरी

तुम्हारा नाम आया और हम तकने लगे रस्ता
तुम्हारी याद आई और खिड़की खोल दी हम ने
- मुनव्वर राना


किसी अकेली शाम की चुप में
गीत पुराने गा के देखो
- मुनीर नियाज़ी


गर कभी रोना ही पड़ जाए तो इतना रोना
आ के बरसात तिरे सामने तौबा कर ले
- मुनव्वर राना


इतनी सारी यादों के होते भी जब दिल में
वीरानी होती है तो हैरानी होती है
- अफ़ज़ल ख़ान

दिल की बर्बादियों का रोना क्या
ऐसे कितने ही वाक़िआत हुए
- साग़र निज़ामी


हर सम्त है वीरानी सी वीरानी का आलम
अब घर सा नज़र आने लगा है मिरा घर भी
- बिस्मिल आग़ाई

जवानी क्या हुई इक रात की कहानी हुई
बदन पुराना हुआ रूह भी पुरानी हुई
- उबैदुल्लाह अलीम


जो हंसना हंसाना होता है
रोने को छुपाना होता है
- अनवर मसूद

मुद्दतें हो गईं बिछड़े हुए तुम से लेकिन
आज तक दिल से मिरे याद तुम्हारी न गई
- अख़्तर शीरानी


कोई वीरानी सी वीरानी है
दश्त को देख के घर याद आया
- मिर्ज़ा ग़ालिब

मौत तू एक कविता है

मौत तू एक कविता है

मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको

डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे
ज़र्द सा चेहरा लिये जब चांद उफक तक पहुँचे
         दिन अभी पानी में हो, रात किनारे के करीब
         ना अंधेरा ना उजाला हो, ना अभी रात ना दिन

जिस्म जब ख़त्म हो और रूह को जब साँस आए
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको

- गुलजार 

लोगों का मकां तो होता है, मगर घर नहीं होता

लोगों का मकां तो होता है, मगर घर नहीं होता
अब दिलों में मोहब्बत का, वो असर नहीं होता

पाल रखा है जन्नत का ख़्वाब तो हर आदमी ने,
मगर वो कपट की चालों से, बेख़बर नहीं होता

यारो बन जाती ये दुनिया वीरानियों का मरकज़,
गर रहमो करम का दुनिया में, बसर नहीं होता

हम तो बदल देते हैं तक़रीरें मतलब के हिसाब से,
पर कुदरत का फैसला, इधर से उधर नहीं होता

काश न बदल जाती इस इंसान की नियति यारो,
तो इस ज़िन्दगी का ये ढांचा, यूं लचर नहीं होता

न बोते हम डगर में खुद यूं बीज काँटों के, 
तो ज़िंदगी का ये सफर भी, यूं दुष्कर नहीं होता

मौत शायरी

बला की चमक उस के चेहरे पे थी 
मुझे क्या ख़बर थी कि मर जाएगा 
- अहमद मुश्ताक़

अब नहीं लौट के आने वाला 
घर खुला छोड़ के जाने वाला 
- अख़्तर नज़्मी

रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई 
तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई 
- कैफ़ी आज़मी


कहानी ख़त्म हुई और ऐसी ख़त्म हुई 
कि लोग रोने लगे तालियाँ बजाते हुए 
- रहमान फ़ारिस

रोने वालों ने उठा रक्खा था घर सर पर मगर 
उम्र भर का जागने वाला पड़ा सोता रहा 
- बशीर बद्र

लोग अच्छे हैं बहुत दिल में उतर जाते हैं 
इक बुराई है तो बस ये है कि मर जाते हैं 
- रईस फ़रोग़
कौन जीने के लिए मरता रहे 
लो सँभालो अपनी दुनिया हम चले 
- अख़्तर सईद ख़ान

हमारी ज़िंदगी तो मुख़्तसर सी इक कहानी थी 
भला हो मौत का जिस ने बना रक्खा है अफ़्साना 
- बेदम शाह वारसी
वो जिन के ज़िक्र से रगों में दौड़ती थीं बिजलियाँ 
उन्हीं का हाथ हम ने छू के देखा कितना सर्द है 
- बशीर बद्र

ना-उमीदी मौत से कहती है अपना काम कर 
आस कहती है ठहर ख़त का जवाब आने को है 
- फ़ानी बदायुनी
उस गली ने ये सुन के सब्र किया 
जाने वाले यहाँ के थे ही नहीं 
- जौन एलिया

'अनीस' दम का भरोसा नहीं ठहर जाओ 
चराग़ ले के कहाँ सामने हवा के चले 
- मीर अनीस
शुक्रिया ऐ क़ब्र तक पहुँचाने वालो शुक्रिया 
अब अकेले ही चले जाएँगे इस मंज़िल से हम 
- क़मर जलालवी

बड़ी तलाश से मिलती है ज़िंदगी ऐ दोस्त 
क़ज़ा की तरह पता पूछती नहीं आती 
- शानुल हक़ हक़्क़ी
 

जो मिल गया उसे याद रख


कहाँ आके रुकने थे रास्ते, कहाँ मोड़ था, उसे भूल जा;
जो मिल गया उसे याद रख, जो नहीं मिला उसे भूल जा! 

अज़ीज़ की 'यादों' पर शायरी

ये हिजरतें हैं ज़मीन ओ ज़माँ से आगे की 
जो जा चुका है उसे लौट कर नहीं आना 
- आफ़ताब इक़बाल शमीम

एक रौशन दिमाग़ था न रहा 
शहर में इक चराग़ था न रहा 
- अल्ताफ़ हुसैन हाली

तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं 
किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं 
- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

जाने वाले कभी नहीं आते 
जाने वालों की याद आती है 
- सिकंदर अली वज्द

वे सूरतें इलाही किस मुल्क बस्तियाँ हैं 
अब देखने को जिन के आँखें तरसतियाँ हैं 
- मोहम्मद रफ़ी सौदा

दिल धड़कने का सबब याद आया 
वो तिरी याद थी अब याद आया 
- नासिर काज़मी
इस ज़िंदगी में इतनी फ़राग़त किसे नसीब 
इतना न याद आ कि तुझे भूल जाएँ हम 
- अहमद फ़राज़

आप के बा'द हर घड़ी हम ने 
आप के साथ ही गुज़ारी है 
- गुलज़ार
सोचता हूँ कि उस की याद आख़िर 
अब किसे रात भर जगाती है 
- जौन एलिया

याद उस की इतनी ख़ूब नहीं 'मीर' बाज़ आ 
नादान फिर वो जी से भुलाया न जाएगा 
- मीर तक़ी मीर
जाते जाते आप इतना काम तो कीजे मिरा 
याद का सारा सर-ओ-सामाँ जलाते जाइए 
- जौन एलिया

जिस को तुम भूल गए याद करे कौन उस को 
जिस को तुम याद हो वो और किसे याद करे 
- जोश मलसियानी
उन का ज़िक्र उन की तमन्ना उन की याद 
वक़्त कितना क़ीमती है आज कल 
- शकील बदायुनी

आज फिर नींद को आँखों से बिछड़ते देखा 
आज फिर याद कोई चोट पुरानी आई 
- इक़बाल अशहर