Wednesday, December 6, 2023

तुम दिल के सबसे करीब हो

माना की हमारे बिच बोहोत सी दूरियां हैं 

लेकिन फिर भी तुम दिल के सबसे करीब हो

माना की रात की ख़ामोशी मुझे डरा देती है
लेकिन अगली सुबह की वो खिलती हुई धूप की तुम उम्मीद हो

माना की हमें कुछ मांगना नहीं आता है रब से
पर मेरी हर दुआ में कांपते हाथों की तुम लकीर हो

माना की हम कोई कलाकार तो नहीं हैं
पर मेरी कला की तुम खूबसूरत तस्वीर हो
तुम दिल के सबसे करीब हो....

बहुत खूबसूरत कहानी हो तुम

हमारी आंख का पानी हो तुम

बहुत खूबसूरत कहानी हो तुम
अंगूठियां तो कब की लापता हैं मगर
उंगलियों पे पड़ी निशानी हो तुम
बहुत खूबसूरत कहानी हो तुम
जिसमे लगते थे सजर रौनकों के
उन्हीं महफिलों की वीरानी हो तुम
बहुत खूबसूरत कहानी हो तुम
आहटों का सिलसिला थमेगा नहीं
खुशबुओं में रात की रानी हो तुम
बहुत खूबसूरत कहानी हो तुम
तुमको भुलाना जैसे मुमकिन नहीं
उम्र भर जो रहेगी वो निशानी हो तुम
बहुत खूबसूरत कहानी हो तुम....

Tuesday, December 5, 2023

मृदु स्पंदन

समस्त भावों को अपने चढ़ाती

मौन स्पंद मेरी तुझे बुलाती।

जो तुम आए ना इस बार

दहकेगी वेदना क्षुब्ध प्यास।


सृष्टि के कन कन का कंपन

रुक जाएगा आदि अनंत स्फुरण।

विराम विश्राम लगेगा जीवन पर

मिटेगी संवेदना जल थल पर।


नियति नृत्य करेगी कहरों से

डूबेगी धरा अश्रु लहरों से।

पिघल गिरि गिर बहेगा पार

जगती ज्वाला की कंचन धार।


ढलती रातों में आलोक तिमिर

चीत्कारेगी क्रंदन करती पीर।

प्रकट हो जाएगा जर्जर विकार

बचेगा ना कोई उर्वर उपसंहार।


जन्म मृत्यु की भयावह संसृति

बिखरेगी अंत आरंभ की नीति।

जड़ - चेतन का सुदृढ़ बंधन

शांत हो जाएगा मृदु स्पंदन।

बहुत कुछ और भी है इस जहाँ में, ये दुनिया महज़ ग़म ही ग़म नहीं है

जुनून-ए-शौक़ अब भी कम नहीं है

मगर वो आज भी बरहम नहीं है


बहुत मुश्किल है दुनिया का सँवरना

तिरी ज़ुल्फ़ों का पेच-ओ-ख़म नहीं है


बहुत कुछ और भी है इस जहाँ में

ये दुनिया महज़ ग़म ही ग़म नहीं है


तक़ाज़े क्यूँ करूँ पैहम न साक़ी

किसे याँ फ़िक्र-ए-बेश-ओ-कम नहीं है


उधर मश्कूक है मेरी सदाक़त

इधर भी बद-गुमानी कम नहीं है


मिरी बर्बादियों का हम-नशीनो

तुम्हें क्या ख़ुद मुझे भी ग़म नहीं है


अभी बज़्म-ए-तरब से क्या उठूँ मैं

अभी तो आँख भी पुर-नम नहीं है


ब-ईं सैल-ए-ग़म ओ सैल-ए-हवादिस

मिरा सर है कि अब भी ख़म नहीं है


'मजाज़' इक बादा-कश तो है यक़ीनन

जो हम सुनते थे वो आलम नहीं है

मजाज़ लखनवी 

उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ

उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ

अब क्या कहें ये क़िस्सा पुराना बहुत हुआ


ढलती न थी किसी भी जतन से शब-ए-फ़िराक़

ऐ मर्ग-ए-ना-गहाँ तिरा आना बहुत हुआ


हम ख़ुल्द से निकल तो गए हैं पर ऐ ख़ुदा

इतने से वाक़िए का फ़साना बहुत हुआ


अब हम हैं और सारे ज़माने की दुश्मनी

उस से ज़रा सा रब्त बढ़ाना बहुत हुआ


अब क्यूँ न ज़िंदगी पे मोहब्बत को वार दें

इस आशिक़ी में जान से जाना बहुत हुआ


अब तक तो दिल का दिल से तआ'रुफ़ न हो सका

माना कि उस से मिलना मिलाना बहुत हुआ


क्या क्या न हम ख़राब हुए हैं मगर ये दिल

ऐ याद-ए-यार तेरा ठिकाना बहुत हुआ


कहता था नासेहों से मिरे मुँह न आइयो

फिर क्या था एक हू का बहाना बहुत हुआ


लो फिर तिरे लबों पे उसी बेवफ़ा का ज़िक्र

अहमद-'फ़राज़' तुझ से कहा ना बहुत हुआ

Ahmad Faraz

ये जिंदगी बहुत कुछ सिखाती है

ये जिंदगी बहुत कुछ सिखाती है

कभी हंसाती कभी रुलाती है

लगाती है ठहाके मेरी हालत पर

कभी रोती कभी गुनगुनाती है

बहती है जिंदगी निर्झर की भांति

ख़ुद बेरंग होकर सारे रंग दिखाती है

कहती है मुझसे चल तू मेरे संग

ना चले तो कर दूंगी बेरंग

कहती हूं मैं ठहर तू एक पल

जाना कहां है अब चलेंगे कल

थके कदम अभी थके नहीं की

जिंदगी ने हाथ खींचा

कहा दूर है मंजिल अब भी

संघर्ष ही मेरा नाम है दूजा

लड़खड़ाते कदम और गिर पड़ी मैं

जिंदगी ने साथ छोड़ा

वक्त की जंजीर टूटी

सामने आजाद खड़ी मैं

सामने आजाद खड़ी मैं।

मोती हो कि शीशा जाम कि दुर जो टूट गया सो टूट गया

मोती हो कि शीशा जाम कि दुर 

जो टूट गया सो टूट गया 

कब अश्कों से जुड़ सकता है 

जो टूट गया सो छूट गया 


तुम नाहक़ टुकड़े चुन चुन कर 

दामन में छुपाए बैठे हो 

शीशों का मसीहा कोई नहीं 

क्या आस लगाए बैठे हो 


शायद कि इन्हीं टुकड़ों में कहीं 

वो साग़र-ए-दिल है जिस में कभी 

सद-नाज़ से उतरा करती थी 

सहबा-ए-ग़म-ए-जानाँ की परी 


फिर दुनिया वालों ने तुम से 

ये साग़र ले कर फोड़ दिया 

जो मय थी बहा दी मिट्टी में 

मेहमान का शहपर तोड़ दिया 


ये रंगीं रेज़े हैं शायद 

उन शोख़ बिलोरीं सपनों के 

तुम मस्त जवानी में जिन से 

ख़ल्वत को सजाया करते थे 

नादारी दफ़्तर भूक और ग़म 

उन सपनों से टकराते रहे 

बे-रहम था चौमुख पथराओ 

ये काँच के ढाँचे क्या करते 


या शायद इन ज़र्रों में कहीं 

मोती है तुम्हारी इज़्ज़त का 

वो जिस से तुम्हारे इज्ज़ पे भी 

शमशाद-क़दों ने रश्क किया 


इस माल की धुन में फिरते थे 

ताजिर भी बहुत रहज़न भी कई 

है चोर-नगर याँ मुफ़लिस की 

गर जान बची तो आन गई 


ये साग़र शीशे लाल-ओ-गुहर 

सालिम हों तो क़ीमत पाते हैं 

यूँ टुकड़े टुकड़े हों तो फ़क़त 

चुभते हैं लहू रुलवाते हैं 


तुम नाहक़ शीशे चुन चुन कर 

दामन में छुपाए बैठे हो 

शीशों का मसीहा कोई नहीं 

क्या आस लगाए बैठे हो 


यादों के गिरेबानों के रफ़ू 

पर दिल की गुज़र कब होती है 

इक बख़िया उधेड़ा एक सिया 

यूँ उम्र बसर कब होती है 


इस कार-गह-ए-हस्ती में जहाँ 

ये साग़र शीशे ढलते हैं 

हर शय का बदल मिल सकता है 

सब दामन पुर हो सकते हैं 

जो हाथ बढ़े यावर है यहाँ 

जो आँख उठे वो बख़्तावर 

याँ धन-दौलत का अंत नहीं 

हों घात में डाकू लाख मगर 


कब लूट-झपट से हस्ती की 

दूकानें ख़ाली होती हैं 

याँ परबत-परबत हीरे हैं 

याँ सागर सागर मोती हैं 


कुछ लोग हैं जो इस दौलत पर 

पर्दे लटकाते फिरते हैं 

हर पर्बत को हर सागर को 

नीलाम चढ़ाते फिरते हैं 


कुछ वो भी हैं जो लड़ भिड़ कर 

ये पर्दे नोच गिराते हैं 

हस्ती के उठाई-गीरों की 

हर चाल उलझाए जाते हैं 


इन दोनों में रन पड़ता है 

नित बस्ती-बस्ती नगर-नगर 

हर बस्ते घर के सीने में 

हर चलती राह के माथे पर 


ये कालक भरते फिरते हैं 

वो जोत जगाते रहते हैं 

ये आग लगाते फिरते हैं 

वो आग बुझाते रहते हैं 


सब साग़र शीशे लाल-ओ-गुहर 

इस बाज़ी में बद जाते हैं 

उट्ठो सब ख़ाली हाथों को 

इस रन से बुलावे आते हैं 

Faiz Ahmad Faiz 

चलो एक दीया फिर से जलाएं

चलो एक दीया,

फिर से जलाएं।

अंधेरे को धरा से,

मार भगाएं।

रहे जिनकी जिंदगी में,

सदा हैं अंधेरे।

उजाले न आए,

कभी न देखे सबेरे।

उन्हें आके फिर से,

सजाएं-संवारें।

चलो एक दीया

फिर से जलाएं।

अंधेरे को धरा से

मार भगाएं।

निशा बन गई,

जिनकी जिंदगी की।

कहानी,

हमेशा है देखी।

दुख और परेशानी,

उनके दर्द और घावों,

पर मरहम लगाएं।

चलो एक दीया,

फिर से जलाएं।

तिमिर है घना,

रात्रि न कटने वाली।

पता कब फिर से,

आएगी जीवन मे  दिवाली।

चलो उनके जीवन मे ,

सूरज बनके आएं।

उनके अंधकारपूर्ण जीवन मे ,

चांदनी बिखराएं।

चलो एक दीया,

फिर से जलाएं।

अंधेरे को धरा से,

मार भगाएं।

राकेश धर द्विवेदी 

सारी मस्ती शराब की सी है

हस्ती अपनी हबाब की सी है 

ये नुमाइश सराब की सी है 


नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए 

पंखुड़ी इक गुलाब की सी है 


चश्म-ए-दिल खोल इस भी आलम पर 

याँ की औक़ात ख़्वाब की सी है 


बार बार उस के दर पे जाता हूँ 

हालत अब इज़्तिराब की सी है 


नुक़्ता-ए-ख़ाल से तिरा अबरू 

बैत इक इंतिख़ाब की सी है 


मैं जो बोला कहा कि ये आवाज़ 

उसी ख़ाना-ख़राब की सी है 

आतिश-ए-ग़म में दिल भुना शायद 

देर से बू कबाब की सी है 


देखिए अब्र की तरह अब के 

मेरी चश्म-ए-पुर-आब की सी है 


'मीर' उन नीम-बाज़ आँखों में 

सारी मस्ती शराब की सी है 

Meer Taqi Meer 

बारिश के बाद की धूप

बारिश के बाद की धूप,

इंद्रधनुष से धरती पे उतरती धूप
पेड़ की पत्तियों पर चमकती धूप,
चेहरे पर आके निखरती धूप,

कहि कहि जो डूब रहा था,
देखो अब वो सुख रहा है,
गली मोहल्लों में पानी के रेले,
धीरे-धीरे टूट रहा है,

छत से जो पानी टपक रहा था,
देखो अब वो चटक रहा है,
कभी जलती थी जो धूप,
अब कितनी कोमल लगती है धूप,

गीला गीला था तन मन,
सुखा धूप में आया कितना आनन्द,
शीलन का वी गीला गन्ध,
धूप से मीट गया सारा दुर्गन्ध,

सारा दिन बीत चुका,
क्षितिज ने धूप को बुलाया है
जहाँ से वो आया है,
धूप से नाता अब छूट रहा हैं,
देखो क्षितिज में वो डूब रहा हैं,
कल फिर ले के आना सूरज,
यही प्यारी सी धूप।