Monday, February 13, 2023

Propose Day Shayari

खुलकर ये बात स्वीकार करता हूं
कि मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं
............................इसीलिए
अपने प्यार का इजहार करता हूं


आँखों में रहा दिल में उतरकर नहीं देखा,
कश्ती के मुशाफिर समंदर नहीं देखा,
पत्थर कहता है मुझे मेरा चाहने वाला,
मैं मोम हूँ उसने मुझे छु कर नहीं देखा।


मेरे दिल की मजबूरी को कोई इल्जाम ना दे,
मुझे याद रख बेशक मेरा नाम ना ले,
तेरा वहम है की मैंने भुला दिया तुझे,
मेरी एक सांस ऐसी नही जो तेरा नाम ना ले !!


मेरी सारी हसरतें मचल गयी..
जब तुमने सोचा एक पल के लिए
अंजाम-ए- दीवानगी क्या होगी
जब तुम मिलोगी मुझे उम्र भर के लिए


फिजा में महकती शाम हो तुम,

प्यार में झलकता जाम हो तुम
सीने में छुपाए फिरते हैं हम यादें तुम्हारी
इसलिए मेरी जिंदगी का दूसरा नाम हो तुम।

कसूर तो था ही इन निगाहों का
जो चुपके से दीदार कर बैठा
हमने तो खामोश रहने की ठानी थी
पर बेवफा ये ज़ुबान इज़हार कर बैठा


अगर तुम न होते तो ग़ज़ल कौन कहता,
तुम्हारे चेहरे को कमल कौन कहता,
यह तो करिश्मा है मोहब्बत का,
वरना पत्थर को ताज महल कौन कहता!!


फिर न सिमटेगी मोहब्बत जो बिखर जायेगी,
जिंदगी जुल्फ नहीं जो फिर सवंर जायेगी,
थाम लो हाथ उसका जो प्यार करे तुमसे,
ये जिंदगी ठहरेगी नहीं जो गुजर जायेगी।


इश्क पर जोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने
आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक





अक्सर चुप रहता हूं मैं

हंसना हंसाना आता है मुझे, मुझसे गम की बात नहीं होती, 
मेरी बातों में मजाक होता है, मेरी हर बात मजाक नहीं होती

किसी से कुछ नहीं कहता मैं ,मगर फिर भी...
कहते हैं लोग कि बहुत कुछ कहता हूं मैं...
कुछ कहा तो, न जाने क्या कुछ कहेंगे लोग...
बस यही सोचकर, अक्सर चुप रहता हूं मैं...


सुना है वो हमें भुलाने लगे हैं

सुना है वो हमें भुलाने लगे हैं
तो क्या हम उन्हें याद आने लगे हैं 
 

हटाए थे जो राह से दोस्तों की
तो पत्थर मेरे घर में आने लगे हैं
 

ये कहना था उनसे मुहब्ब्त हो मुझको
ये कहने मे मुझको ज़माने लगे हैं
 

कयामत यकीनन करीब आ गई है
"ख़ुमार" अब तो मस्ज़िद में जाने लगे हैं

ख़ुमार बाराबंकवी 



हमनवा कोई न था

इक तुम्हारी याद जैसा क़ाफ़िला कोई न था।
बस तुम्हें यूँ छोड़कर अब रास्ता कोई न था।

साथ पल दो पल दिया और कुछ चले भी दूर तक,
पर घने इन गेसुओं सा आसरा कोई न था।

बेकसी थी ज़िंदगी में और उदासी थी बढ़ी,
पर हसीं वो दूसरा तो सिलसिला कोई न था।

दूर हमसे ख़ुद रहे तुम वक्त का था खेल सब,
दो दिलो में वैसे तो अब फ़ासला कोई न था।

क्यों किसी पे भी लुटा दे यूँ सुधा इस जान को,
दिल को मेरे समझे तुम सा हमनवा कोई न था।

कितना सहल है बिजली गिरा देना

 हया से सर झुका लेना अदा से मुस्कुरा देना 

हसीनों को भी कितना सहल है बिजली गिरा देना 

ये तर्ज़ एहसान करने का तुम्हीं को ज़ेब देता है 
मरज़ में मुब्तला कर के मरीज़ों को दवा देना 

बलाएँ लेते हैं उन की हम उन पर जान देते हैं 
ये सौदा दीद के क़ाबिल है क्या लेना है क्या देना 

ख़ुदा की याद में महवियत-ए-दिल बादशाही है 
मगर आसाँ नहीं है सारी दुनिया को भुला देना 

Akbar Allahabadi

सोचता रहता हूं यूं

ना जाने क्यूं,
सोचता रहता हूं यूं,
हर लम्हा हर पल,
सोचता हूं साथ के वो पल
ना जाने क्यूं,
सोचता रहता हूं यूं,

पहले वजह ना थी जीने की,
अब वजह तुम हो,
पहले कोई ना था मेरा,
अब सिर्फ तुम हो,
ना जाने क्यूं,
सोचता रहता हूं यूं,

जब मिला था पहली बार,
दिल ने चाहा मिलें बार बार,
इसी के बहाव में,
मिलता रहा बार बार,
ना जाने क्यूं,
सोचता रहता हूं यूं,

दिल की तमन्ना थी,
जिंदगी खुशमिजाज थी,
जब बारिश आती,
तुम याद आती,
ना जाने क्यूं,
सोचता रहता हूं यूं,

एक पल था वो,
एक पल है ये,
पहले तू साथ थी,
अब तेरी यादें साथ है,
ना जाने क्यूं,
सोचता रहता हूं यूं,

जब समय आया बिछड़ने का,
ना में समझा ना वो समझी,
और जब बिछड़ गए,
तो दोनो को सब समझ आ गया,
ना जाने क्यूं,
सोचता रहता हूं यूं,
ना जाने क्यूं,
सोचता रहता हूं यूं।

प्रेम पर 10 दोहे

सतगुरु हम सूँ रीझि करि, एक कह्या प्रसंग। 
बरस्या बादल प्रेम का, भीजि गया सब अंग॥ 
- कबीर

अर्थ: सद्गुरु ने मुझ पर प्रसन्न होकर एक रसपूर्ण वार्ता सुनाई जिससे प्रेम रस की वर्षा हुई और मेरे अंग-प्रत्यंग उस रस से भीग गए।
सतगुरु हम सूँ रीझि करि, एक कह्या प्रसंग। 
बरस्या बादल प्रेम का, भीजि गया सब अंग॥ 
- कबीर

अर्थ: सद्गुरु ने मुझ पर प्रसन्न होकर एक रसपूर्ण वार्ता सुनाई जिससे प्रेम रस की वर्षा हुई और मेरे अंग-प्रत्यंग उस रस से भीग गए।
 

गंगा जमुना सुरसती, सात सिंधु भरपूर। 
‘तुलसी’ चातक के मते, बिन स्वाती सब धूर॥ 
- तुलसीदास

अर्थ: गंगा, यमुना, सरस्वती और सातों समुद्र ये सब जल से भले ही भरे हुए हों, पर पपीहे के लिए तो स्वाति नक्षत्र के बिना ये सब धूल के समान ही हैं। क्योंकि पपीहा सिर्फ स्वाति नक्षत्र में बरसा हुआ जल ही पीता है। भाव यह है कि सच्चे प्रेमी अपनी प्रिय वस्तु के बिना अन्य किसी वस्तु को कभी नहीं चाहता, चाहे वह वस्तु कितनी ही मूल्यवान क्यों न हो।

रैदास प्रेम नहिं छिप सकई, लाख छिपाए कोय। 
प्रेम न मुख खोलै कभऊँ, नैन देत हैं रोय॥ 
- रैदास

अर्थ: रैदास कहते हैं कि प्रेम कोशिश करने पर भी छिप नहीं पाता, वह जाहिर हो ही जाता है। प्रेम का बखान वाणी द्वारा नहीं हो सकता। प्रेम को तो आँखों से निकले हुए आँसू ही व्यक्त करते हैं।

जे सुलगे ते बुझि गए, बुझे ते सुलगे नाहिं। 
रहिमन दाहे प्रेम के, बुझि बुझि कै सुलगाहिं॥ 
- रहीम

अर्थ: रहीम कहते हैं कि आग से जलकर लकड़ी सुलग-सुलगकर बुझ जाती है, बुझकर वह फिर सुलगती नहीं। लेकिन प्रेम की आग में जलने के बाद प्रेमी बुझकर भी सुलगते रहते हैं।
 

पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ। 
एकै आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होइ॥ 
-कबीर

अर्थ: सारे संसारिक लोग पुस्तक पढ़ते-पढ़ते मर गए कोई भी पंडित (वास्तविक ज्ञान धारण करने वाला) नहीं हो सका। लेकिन जो अपने प्रिय परमात्मा के नाम का एक ही अक्षर जपता है (या प्रेम का एक अक्षर पढ़ता है) वही सच्चा ज्ञानी होता है। वही परम तत्त्व का सच्चा पारखी होता है।

तो पर वारौं उरबसी, सुनि, राधिके सुजान। 
तू मोहन कैं उर बसी ह्वै उरबसी-समान॥ 
- बिहारी

अर्थ: कृष्ण कहते हैं कि हे सुजान राधिके, तुम यह समझ लो कि मैं तुम्हारे रूप-सौंदर्य पर उर्वशी जैसी नारी को भी न्यौछावर कर सकता हूँ। कारण यह है कि तुम तो मेरे हृदय में उसी प्रकार निवास करती हो, जिस प्रकार उर्वशी नामक आभूषण हृदय में निवास करता है।
 

जमला लट्टू काठ का, रंग दिया करतार। 
डोरी बाँधी प्रेम की, घूम रह्या संसार॥ 
- जमाल 

अर्थ: विधाता ने काठ के लट्टू को रंगकर प्रेम की डोरी से बांधकर उसे फिरा दिया और वह संसार में चल रहा है। अभिप्राय यह है कि पंचतत्त्व का यह मनुष्य शरीर विधाता ने रचा और सजाकर उसे जन्म दिया। यह शरीर संसार में अपने अस्तित्व को केवल प्रेम के ही कारण स्थिर रख रहा है।


प्रेम दिवाने जो भये, मन भयो चकना चूर। 
छके रहे घूमत रहैं, सहजो देखि हज़ूर॥ 
- सहजोबाई

अर्थ: सहजोबाई कहती हैं कि जो व्यक्ति ईश्वरीय-प्रेम के दीवाने हो जाते हैं, उनके मन की सांसारिक वासनाएँ-कामनाएँ एकदम चूर-चूर हो जाती हैं। ऐसे लोग सदा आनंद से तृप्त रहते हैं और संसार में घूमते हुए परमात्मा का साक्षात्कार कर लेते हैं।
 

कहि रहीम इक दीप तें, प्रगट सबै दुति होय। 
तन सनेह कैसे दुरै, दृग दीपक जरु दोय॥ 
- रहीम

अर्थ: रहीम कहते हैं कि जब एक ही दीपक के प्रकाश से घर में रखी सारी वस्तुएँ स्पष्ट दीखने लगती हैं, तो फिर नेत्र रूपी दो-दो दीपकों के होते तन-मन में बसे स्नेह-भाव को कोई कैसे भीतर छिपाकर रख सकता है! अर्थात मन में छिपे प्रेम-भाव को नेत्रों के द्वारा व्यक्त किया जाता है और नेत्रों से ही उसकी अभिव्यक्ति हो जाती है।

ख़ुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग। 
तन मेरो मन पीउ को, दोउ भए एक रंग॥ 
- अमीर ख़ुसरो

अर्थ: ख़ुसरो कहते हैं कि उसके सौभाग्य की रात्रि बहुत अच्छी तरह से बीत गई, उसमें परमात्मा प्रियतम के साथ जीवात्मा की पूर्ण आनंद की स्थिति रही। वह आनंद की अद्वैतमयी स्थिति ऐसी थी कि तन तो जीवात्मा का था और मन प्रियतम का था, परंतु सौभाग्य की रात्रि में दोनों मिलकर एक हो गए, अर्थात दोनों में कोई भेद नहीं रहा और द्वैत की स्थिति नहीं रही।

याद आएंगे प्रथम प्यार के चुम्बन की तरह

जब चले जाएंगे लौट के सावन की तरह,
याद आएंगे प्रथम प्यार के चुम्बन की तरह।

ज़िक्र जिस दम भी छिड़ा उनकी गली में मेरा,
जाने शरमाए वो क्यों गांव की दुल्हन की तरह।

कोई कंघी न मिली जिससे सुलझ पाती वो,
ज़िन्दगी उलझी रही ब्रह्म के दर्शन की तरह।

दाग़ मुझमें है कि तुझमें यह पता तब होगा,
मौत जब आएगी कपड़े लिए धोबन की तरह।

हर किसी शख़्स की किस्मत का यही है किस्सा,
आए राजा की तरह ,जाए वो निर्धन की तरह।

जिसमें इन्सान के दिल की न हो धड़कन की 'नीरज',
शायरी तो है वह अख़बार की कतरन की तरह।

तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो

मैं तूफ़ानों में चलने का आदी हूँ

तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो

हैं फूल रोकते, काटें मुझे चलाते
मरुस्थल, पहाड़ चलने की चाह बढ़ाते
सच कहता हूँ जब मुश्किलें ना होती हैं
मेरे पग तब चलने में भी शर्माते
मेरे संग चलने लगें हवायें जिससे
तुम पथ के कण-कण को तूफ़ान करो

मैं तूफ़ानों में चलने का आदी हूँ
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो

अंगार अधर पे धर मैं मुस्काया हूँ
मैं मरघट से ज़िन्दगी बुला के लाया हूँ
हूँ आँख-मिचौनी खेल चला किस्मत से
सौ बार मृत्यु के गले चूम आया हूँ
है नहीं स्वीकार दया अपनी भी..
तुम मत मुझ पर न कोई एहसान करो
 
मैं तूफ़ानों में चलने का आदी हूँ
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो

श्रम के जल से राह सदा सिंचती है
गति की मशाल आंधी मैं ही हँसती है
शोलों से ही शृंगार पथिक का होता है
मंज़िल की मांग लहू से ही सजती है
पग में गति आती है, छाले छिलने से
तुम पग-पग पर जलती चट्टान धरो

मैं तूफ़ानों में चलने का आदी हूँ
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो

फूलों से जग आसान नहीं होता है
रुकने से पग गतिवान नहीं होता है
अवरोध नहीं तो संभव नहीं प्रगति भी
है नाश जहाँ निर्माण वहीं होता है
मैं बसा सकूं नव-स्वर्ग "धरा" पर जिससे
तुम मेरी हर बस्ती वीरान करो

मैं तूफ़ानों में चलने का आदी हूँ
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो
 

मैं पंथी तूफ़ानों में राह बनाता
मेरा दुनिया से केवल इतना नाता
वह मुझे रोकती है अवरोध बिछाकर
मैं ठोकर उसे लगा कर बढ़ता जाता
मैं ठुकरा सकूँ तुम्हें भी हँसकर जिससे
तुम मेरा मन-मानस पाषाण करो

मैं तूफ़ानों में चलने का आदी हूँ
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो

गोपालदास "नीरज" 



प्रथम💋चुम्बन

तुम्हारे अधरों पर प्रथम💋चुम्बन, 

खिल उठा हृदय, इक नया जीवन.

जैसे खुल गए साधना के बंधन,

तन मन में नव शैशव यौवन।


वो तुम्हारे होठों का कम्पन,

थम सी गई दिल की धड़कन.

जुम्बिश-ए-लब का अनविरत क्रम,

कुछ यूँ हुआ दो रूहों का मिलन।


ये तुम्हारा गुल सा बदन,

मेरे बालों पे तुम्हारे हाथों का छुअन.

बुझ गई सदियों की तपन,

वो हमारा प्रथम💋चुम्बन।


तुम सुंदर से अति सुंदर,

शीतल, निश्चल, करूण व निर्मल.

तेरा मेरा प्यार पतित पावन,

सदा रहे, न बदले, न हो कुछ कम॥