Sunday, February 28, 2021

बाबा ! मुझे उतनी दूर मत ब्याहना

निर्मला पुतुल की कविता: 
बाबा ! मुझे उतनी दूर मत ब्याहना

बाबा! 
मुझे उतनी दूर मत ब्याहना 
जहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिर 
घर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हें 

मत ब्याहना उस देश में 
जहाँ आदमी से ज़्यादा 
ईश्वर बसते हों 

जंगल नदी पहाड़ नहीं हों जहाँ 
वहाँ मत कर आना मेरा लगन 
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वहाँ तो क़तई नहीं 
जहाँ की सड़कों पर 
मन से भी ज़्यादा तेज़ दौड़ती हों मोटरगाड़ियाँ 
ऊँचे-ऊँचे मकान और 
बड़ी-बड़ी दुकानें 

उस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ता 
जिस में बड़ा-सा खुला आँगन न हो 
मुर्ग़े की बाँग पर होती नहीं हो जहाँ सुबह 
और शाम पिछवाड़े से जहाँ 
पहाड़ी पर डूबता सूरज न दिखे 
मत चुनना ऐसा वर 
जो पोचई और हड़िया में डूबा रहता हो अक्सर 
काहिल-निकम्मा हो 
माहिर हो मेले से लड़कियाँ उड़ा ले जाने में 
ऐसा वर मत चुनना मेरी ख़ातिर 
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कोई थारी-लोटा तो नहीं 
कि बाद में जब चाहूँगी बदल लूँगी 
अच्छा-ख़राब होने पर 

जो बात-बात में 
बात करे लाठी-डंडा की 
निकाले तीर-धनुष, कुल्हाड़ी 
जब चाहे चला जाए बंगाल, असम या कश्मीर 
ऐसा वर नहीं चाहिए हमें 
और उसके हाथ में मत देना मेरा हाथ 
जिसके हाथों ने कभी कोई पेड़ नहीं लगाए 
फ़सलें नहीं उगाईं जिन हाथों ने 
जिन हाथों ने दिया नहीं कभी किसी का साथ 
किसी का बोझ नहीं उठाया 

और तो और! 
जो हाथ लिखना नहीं जानता हो ‘ह’ से हाथ 
उसके हाथ मत देना कभी मेरा हाथ !
ब्याहना हो तो वहाँ ब्याहना 
जहाँ सुबह जाकर 
शाम तक लौट सको पैदल 
मैं जो कभी दुख में रोऊँ इस घाट 
तो उस घाट नदी में स्नान करते तुम 
सुनकर आ सको मेरा करुण विलाप 

महुआ की लट और 
खजूर का गुड़ बनाकर भेज सकूँ संदेश तुम्हारी ख़ातिर 
उधर से आते-जाते किसी के हाथ 
भेज सकूँ कद्दू-कोहड़ा, खेखसा, बरबट्टी 
समय-समय पर गोगो के लिए भी 
मेला-हाट-बाज़ार आते-जाते 
मिल सके कोई अपना जो 
बता सके घर-गाँव का हाल-चाल 
चितकबरी गैया के बियाने की ख़बर 
दे सके जो कोई उधर से गुज़रते 
ऐसी जगह मुझे ब्याहना! 

उस देश में ब्याहना 
जहाँ ईश्वर कम आदमी ज़्यादा रहते हों 
बकरी और शेर 
एक घाट पानी पीते हों जहाँ 
वहीं ब्याहना मुझे ! 
उसी के संग ब्याहना जो 
कबूतर के जोड़े और पंडुक पक्षी की तरह 
रहे हरदम हाथ 
घर-बाहर खेतों में काम करने से लेकर 
रात सुख-दुख बाँटने तक 
चुनना वर ऐसा 
जो बजाता हो बाँसुरी सुरीली 
और ढोल-माँदल बजाने में हो पारंगत 

वसंत के दिनों में ला सके जो रोज़ 
मेरे जूड़े के ख़ातिर पलाश के फूल 

जिससे खाया नहीं जाए 
मेरे भूखे रहने पर 
उसी से ब्याहना मुझे !


किसी की मृत्यु पर होने वाला शोक या दुख को विलाप कहते हैं, किन्हीं और दुखद परिस्थितियों में प्रकट की जाने वाली निराशा भी विलाप के दायरे में ही आती है।

यूँ तो वो हर किसी से मिलती है

यूँ तो वो हर किसी से मिलती है 
हम से अपनी ख़ुशी से मिलती है 

सेज महकी बदन से शर्मा कर 
ये अदा भी उसी से मिलती है 

वो अभी फूल से नहीं मिलती 
जूहिए की कली से मिलती है 

दिन को ये रख-रखाव वाली शक्ल 
शब को दीवानगी से मिलती है 

आज-कल आप की ख़बर हम को! 
ग़ैर की दोस्ती से मिलती है 

शैख़-साहिब को रोज़ की रोटी 
रात भर की बदी से मिलती है 

आगे आगे जुनून भी होगा ! 
शेर में लौ अभी से मिलती है 

Friday, February 26, 2021

एक शख़्स जो सच-मुच ख़ुदाओं जैसा है

कभी वो हाथ न आया हवाओं जैसा है 
वो एक शख़्स जो सच-मुच ख़ुदाओं जैसा है 

हमारी शम-ए-तमन्ना भी जल के ख़ाक हुई 
हमारे शो'लों का आलम चिताओं जैसा है 

वो बस गया है जो आ कर हमारी साँसों में 
जभी तो लहजा हमारा दुआओं जैसा है 

तुम्हारे बा'द उजाले भी हो गए रुख़्सत 
हमारे शहर का मंज़र भी गाँव जैसा है 

वो एक शख़्स जो हम से है अजनबी अब तक 
ख़ुलूस उस का मगर आश्नाओं जैसा है 

हमारे ग़म में वो ज़ुल्फ़ें बिखर गईं 'नासिर' 
जभी तो आज का मौसम भी छाँव जैसा है

रख साफ़गोई इतनी कि कभी बेजुबां ना होना पड़े

रख साफ़गोई इतनी कि
कभी बेजुबां ना होना पड़े,

करले गुनाहों से तौबा के
कभी पशेमां ना होना पड़े!

Wednesday, February 24, 2021

और कुछ लोग भी दीवाना बना देते हैं

तल्ख़ शिकवे लब-ए-शीरीं से मज़ा देते हैं
घोल कर शहद में वो ज़हर पिला देते हैं

यूँ तो होते हैं मोहब्बत में जुनूँ के आसार
और कुछ लोग भी दीवाना बना देते हैं

वाए-तक़दीर कि वो ख़त मुझे लिख लिख के 'ज़हीर'
मेरी तक़दीर के लिक्खे को मिटा देते हैं

ज़हीर देहलवी

मोहब्बत यारों जुनूँ का काम नहीं
ये वो सफ़र है जिस में आराम नहीं

तुझे देखने का जुनून--और भी गहरा होता है ,,¡¡
जब तेरे रुखसार पे ज़ुल्फ़ों का पहरा होता है..!

वो किसी से तुम को जो रब्त था तुम्हें याद हो कि न याद हो
वो किसी पे था कोई मुब्तिला तुम्हें याद हो कि न याद हो !!

#जहीर_देहलवी

बुतों से बंचके चलने पर भी आफ़त आ ही जाति हैं ये काफिर वो क़यामत हैं तबियत आ भी जाति हैं 
 ~~ज़हीर देहलवी

इश्क़ का रोग कि दोनों से छुपाया न गया
हम थे सौदाई तो कुछ वो भी दीवाने निकले
-कुमार पाशी

ज़िंदगी पर इस से बढ़ कर तंज़ क्या होगा 'फ़राज़' 
उस का ये कहना कि तू शाएर है दीवाना नहीं

अहमद फ़राज़

"अहले-ख़िरद क्या जाने उनको, उनकी भी मजबूरी है,
इश्क़ में कुछ पागल सा होना शायद बहुत ज़रूरी है।"







ये रिश्ता मोहब्बत का, बिखरता ही नहीं शायद.

हद है अपनी तरफ़ नहीं मैं भी 
और उन की तरफ़ ख़ुदाई है 

जौश मलीहाबादी

मोहब्बत की तो कोई हद, कोई सरहद नहीं होती
हमारे दरमियाँ ये फ़ासले, कैसे निकल आए

ख़ालिद मोईन

‏‎ज़ालिम के हमराह था सारा जहाँ
मज़्लूम की हिमायत में बस उसका खुदा


अब तक न ख़बर थी मुझे उजड़े हुए घर की 
वो आए तो घर बे-सर-ओ-सामाँ नज़र आया 
~जोश मलीहाबादी

ये दिन बहार के अब के भी
रास न आ सके
कि गुंचे खिल तो सके
खिल के मुस्कुरा न सके
-जोश मलीहाबादी

ये रिश्ता मोहब्बत का, बिखरता ही नहीं शायद.
गिले सब भूल कर जो, अगर मुस्कुरा देते.


Tuesday, February 23, 2021

सबके पीछे बंधी है दुम आसक्ति की !

भवानी प्रसाद मिश्र की कविता- 
सबके पीछे बंधी है दुम आसक्ति की !

ना निरापद कोई नहीं है
न तुम, न मैं, न वे
न वे, न मैं, न तुम
सबके पीछे बंधी है दुम आसक्ति की !


आसक्ति के आनन्द का छंद ऐसा ही है
इसकी दुम पर
पैसा है !


ना निरापद कोई नहीं है
ठीक आदमकद कोई नहीं है
न मैं, न तुम, न वे
न तुम, न मैं, न वे
कोई है कोई है कोई है
जिसकी ज़िंदगी
दूध की धोई है

ना, दूध किसी का धोबी नहीं है
हो तो भी नहीं है!

निरापद' यानि जिसमें कोई संकट या आपत्ति ना हो या सुरक्षित। इसके अतिरिक्त जिसमें हानि या अनर्थ का डर ना हो उसे भी निरापद कहते हैं।

इश्क प्यार शायरी

इस उलझन को सुलझाने की कौन सी है तदबीर लिखो
इश्क़ अगर है जुर्म तो मुजरिम राँझा है या हीर लिखो
इलियास इश्क़ी
【तदबीर=उपाय】


उस की आँखों के अगर वस्फ़ रक़म कीजिएगा
शाख़-ए-नर्गिस को क़लम कर के क़लम कीजिएगा
इश्क़ औरंगाबादी
【वस्फ़=प्रशंसा,शाख़-ए-नर्गिस=नर्गिस जो कि फूल की प्रजाति है उस की डाली,क़लम=काटना,पेन】

ज़ुल्फ़ की शाम सुब्ह चेहरे की
यही मौसम जनाब दे दीजे
साबिर दत्त

हुस्न को हुस्न बनाने में मिरा हाथ भी है
आप मुझ को नज़र-अंदाज़ नहीं कर सकते
रईस फ़रोग़

दौलत है बड़ी चीज़ हुकूमत है बड़ी चीज़ इन सब से बशर के लिए इज़्ज़त है बड़ी चीज़... जब ज़िक्र किया मैं ने कभी वस्ल का उन से वो कहने लगे पाक मोहब्बत है बड़ी चीज़... 
नूह नारवी
【बशर=इंसान,वस्ल=मुलाक़ात】

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का 
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब

मेरे होने में किसी तौर से शामिल हो जाओ 
तुम मसीहा नहीं होते हो तो क़ातिल हो जाओ 
इरफ़ान सिद्दीक़ी

कौन कहता है कि दिल सिर्फ सीने में होता है 
तुमको लिखूँ तो मेरी उँगलियाँ भी धड़कती हैं
अज्ञात

रात भर चाँद सितारों की मदद लेता हूँ !!
आसमा पर तेरी तस्वीर बनाने के लिए !!
नासिर अमरोहवी

लगने दो महफिल आज शायरी की जुबां करते हैं 
तुम गालिब की किताब उठाओ,हम हाले दिल बयाँ करते हैं 
अज्ञात

जिस गौहर को छुपाये फ़िरते हो आँखों में
 ये सच है उन्हीं आँखों की हम चाह करें हैं
अज्ञात
【गौहर=मोती】

उस वक़्त का हिसाब क्या दूँ 
जो तेरे बग़ैर कट गया 
अहमद नदीम क़ासमी

राह की कुछ तो रुकावट यार कम कर दीजिए 
आप अपने घर की इक दीवार कम कर दीजिए 
आप का आशिक़ बहुत कमज़ोर दिल के है हुज़ूर देखिए 
ये शिद्दत-ए-इन्कार कम कर दीजिए 
बस मोहब्बत बस मोहब्बत बस मोहब्बत जान-ए-मन 
बाक़ी सब जज़्बात का इज़हार कम कर दीजिए
फ़रहत एहसास
【शिद्दत-ए-इन्कार =मनाही की अधिकता】

सुरमें से लिखे तेरे वादे आँखों की ज़बानी आते हैं 
तेरी बातों में किमाम की खुशबू है तेरा आना भी गर्मियों की लू है 
गुलज़ार

इज़हार-ए-मुद्दआ का इरादा था आज कुछ
तेवर तुम्हारे देख के ख़ामोश हो गया
शाद अज़ीमाबादी
【इज़हार-ए-मुद्दआ=इच्छाओं की अभिव्यक्ति】

तुझको मैं अपना संसार लिखूं........

तुझे इश्क़ लिखूं तुझे प्यार लिखूं ,
तुझको मैं अपना संसार लिखूं........

तुझे प्रेम कहूं तुझको ही दुनिया,
तुझको अपना पालनहार लिखूं......

तुझे साथी बताऊं या परमेश्वर,
तुझे ईश्वर का उपहार लिखूं........

मुझे अश्क मिले तुझको खुशियां,
तेरे खातिर मैं अरदास लिखूं.........

मैं राम कहूं तुम हो कान्हा,
मैं मीरा सा इजहार लिखूं.........

सोचूं कुछ करूं कुछ और,
तुझको मैं हर बार लिखूं..........

आत्मविश्वास हिम्मत जोश शायरी

बंदा तो इस इकरार पै बिकता है तेरे हाथ,
लेना है अगर मोल तो आज़ाद न करना। 
- नज़्म तबातबाई

वही हक़दार हैं किनारों के,
जो बदल दें बहाव धारों के। 
- निसार इटावी 

ख़ुदा तौफीक़ देता है जिन्हें, वो यह समझते हैं,
कि ख़ुद अपने ही हाथों से बना करती हैं तक़दीरें। 
- अफ़सर मराठी 

मेरे टूटे हौसले के पर निकलते देख कर
उस ने दीवारों को अपनी और ऊंचा कर दिया। 
- आदिल मंसूरी  

हवा ख़फ़ा थी मगर इतनी संग-दिल भी न थी
हमीं को शमअ जलाने का हौसला न हुआ। 
- क़ैसर-उल जाफ़री 

देख यूं वक़्त की दहलीज़ से टकरा के न गिर,
रास्ते बंद नहीं सोचने वालों के लिए। 
- फारिग़ बुख़ारी

कहिए तो आसमां को ज़मीं पर उतार लाएं 
मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए। 
- शहरयार 

इन अंधेरों से परे इस शब-ए-ग़म से आगे 
इक नई सुब्ह भी है शाम-ए-अलम से आगे 
- इशरत क़ादरी
 
साहिल के सुकूँ से किसे इंकार है लेकिन 
तूफ़ान से लड़ने में मज़ा और ही कुछ है 
- आल-ए-अहमद सूरूर

हार हो जाती है जब मान लिया जाता है 
जीत तब होती है जब ठान लिया जाता है 
- शकील आज़मी