Saturday, October 31, 2020

आज धरती से कौन विदा हुआ - अमृता प्रीतम

आज धरती से कौन विदा हुआ 
कि आसमान ने बाँहें फैला कर 
धरती को गले से लगा लिया 
त्रिपुरा ने हरी चादर कफ़न पर डाली 
और सुबह की लालिमा ने 
आँखों का पानी पोंछ कर 
धरती के कंधे पर हाथ टिकाया 
कहा— 
थोड़ी-सी महक विदा हुई है 
पर दिल से न लगाना 
कि आसमान ने तुम्हारी महक को 
सीने में सँभाल लिया है... 

आओ तन्हाई में गुजर बसर कर के देखें.

आओ तन्हाई में गुजर बसर कर के देखें. 
तन्हाई कितनी गहरी है दिल में उतर के देखें ।

मुट्ठी भर आसमान है हमारे तुम्हारे सामने ,
चलो दम हैं तो वहां जाकर हम चढ़ के देखें ।

मानता हूं हवाओं पर जोर चलेगा न हमारा ,
पर फिक्र किसे लगता है हवाओं से झगड़ के देखें ।

कौन संभालेगा तुझे इस भरी महफिल में ,
तुमने क्यों सोचा कि यहां थोड़ा उखड़ के देखें ।

हर शाम यहां जाम आदमी की जरूरत हैं ,
हम पीते नही पर जिद है जाम पकड़ के देखें ।

जो वर्तमान हैवो परेशान है

जो वर्तमान है
वो परेशान है
जो भूत हो गया
वो शुद्ध हो गया
जो भविष्य में है
वो भाग्यवान है

कोई शस्त्र ना उठा
कोई अस्त्र ना चला
सोच कर बात कर
ये सब मौत का सामान है

सांस बंद हो गई
नब्ज़ भी थम गई
असमय मृत्यु
सृष्टि का अपमान है

ना सुनाई दिया
ना दिखाई दिया
ऐसे दुश्मन पर अटकी
क्यों तेरी जान है

युद्ध के अंत से
जो वाकिफ ना हो
विश्व में क्या ऐसा
कोई इंसान है

जो खत्म हो गया
वह भस्म हो गया
बीती बातों का किस्सा
हजम हो गया

सब हंस कर रहे
सब मिल कर चले
शांति ही सुख का परिधान है

हम न सोए रात थक कर सो गई

ओस की बूंद से क्या करती है अब सुबह सुलूक
वह मेरे साथ के सब तश्ना दहां कैसे हैं
उड़ती-पड़ती ये सुनी थी कि परेशान हैं लोग
अपने ख्वाबों से परेशान हैं लोग


जिस गली ने मुझे सिखलाए थे आदाबे-जुनूं
उस गली में मेरे पैरों के निशां कैसे हैं
शहरे रुसवाई में चलती हैं हवायें कैसी
इन दिनों मश्गलए-जुल्फे परीशां क्या है
साख कैसी है जुनूं वालों की
कीमते चाके गरीबां क्या है


1. रास्ते अपनी नज़र बदला किए
हम तुम्हारा रास्ता देखा किए
अहल-ए-दिल सहरा में गुम होते रहे
ज़िंदगी बैठी रही पर्दा किए
एहतिमाम-ए-दार-ओ-ज़िंदाँ की क़सम
आदमी हर अहद ने पैदा किए
हम हैं और अब याद का आसेब है
उस ने वादे तो कई ईफ़ा किए
हाए-रे वहशत कि तेरे शहर का
हम सबा से रास्ता पूछा किए.


2. हम तो हैं परदेस में देस में निकला होगा चाँद
अपनी रात की छत पर कितना तन्हा होगा चाँद
जिन आँखों में काजल बन कर तैरी काली रात
उन आँखों में आँसू का इक क़तरा होगा चाँद
रात ने ऐसा पेँच लगाया टूटी हाथ से डोर
आँगन वाले नीम में जा कर अटका होगा चाँद
चाँद बिना हर दिन यूँ बीता जैसे युग बीते
मेरे बिना किस हाल में होगा कैसा होगा चाँद .


3. जिन से हम छूट गए अब वो जहाँ कैसे हैं
शाख़-ए-गुल कैसी है ख़ुश्बू के मकाँ कैसे हैं
ऐ सबा तू तो उधर ही से गुज़रती होगी
उस गली में मिरे पैरों के निशाँ कैसे हैं
पत्थरों वाले वो इंसान वो बेहिस दर-ओ-बाम
वो मकीं कैसे हैं शीशे के मकाँ कैसे हैं
कहीं शबनम के शगूफ़े कहीं अंगारों के फूल
आ के देखो मिरी यादों के जहाँ कैसे हैं
कोई ज़ंजीर नहीं लायक़-ए-इज़हार-ए-जुनूँ
अब वो ज़िंदानी-ए-अंदाज़-ए-बयाँ कैसे हैं
ले के घर से जो निकलते थे जुनूँ की मशअल
इस ज़माने में वो साहब-नज़राँ कैसे हैं
याद जिन की हमें जीने भी न देगी 'राही'
दुश्मन-ए-जाँ वो मसीहा-नफ़साँ कैसे हैं .


4. इस सफ़र में नींद ऐसी खो गई
हम न सोए रात थक कर सो गई

 - राही मासूम रज़ा 


तेरा वक़्त भी आएगा

रख यक़ीन ऐ बंदे
तेरा दिन भी आएगा
हर नफ़रत करने वाला तुझसे तेरे आगे सिर झुकाएगा
आज तू गुमनाम है
सारी खुशियों से अनजान है
रख यक़ीन बस इतना की तेरा वक़्त भी आएगा
तु भी हर सुख आजमाएगा
छोड़ तु दुनिया का सहारा
यहां हर कोई मतलबी दुनिया से हारा
रख खुद पर और उस खुदा पे भरोसा
उनके अलावा और कोई ना किसी का

हर सुब्ह धूप तुझे जगाती है तेरी पलक को छूकर

हर सुब्ह धूप तुझे जगाती है तेरी पलक को छूकर
खुशबू फूले नहीं समाती है तेरी अलक को छूकर

हम अगर तेरा साया भी छू लें तो हंगामा हो जाए
तितली मगर उड़ जाती है तेरे लब तलक को छूकर

बुलन्दियों की ख्वाहिश भी बड़ी अजीब ख्वाहिश है
मेरी तमन्ना जमीं पे लौट आती है रोज़ फलक को छूकर

मैं सच बोल तो दूं हुकूमत का कच्चा चिट्ठा खोल तो दूं
मगर एक तलवार मुझे डरा जाती है मेरे हलक को छूकर

'नामचीन' दुनिया पर खुदा की मेहरबानियां बहुत हैं
तभी तो हर कयामत लौट जाती है इस खलक को छूकर

Friday, October 30, 2020

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नोमान शौक़ की शायरी mage Credit/Pexels Ylanite-Koppens
NEWS18HINDI
LAST UPDATED: OCTOBER 30, 2020, 9:55 AM IST
नोमान शौक़ की शायरी (Noman Shauq Shayari) : नोमान शौक़ का नाम शायरी की दुनिया में बेहद अदब के साथ लिया जाता है. नोमान शौक़ बिहार के आरा से ताल्लुक रखते हैं. नोमान शौक़ की शायरी में प्रेम और प्रतिरोध का अनोखा मेल आप देख सकते हैं. नोमान शौक़ जलता शिकारा ढूंढने में, फ़्रीज़र में रखी शाम, अपने कहे किनारे उर्दू में और कविता संग्रह रात और विषकन्या जैसी प्रसिद्ध रचनाएं लिखी हैं. उन्होंने आकाशवाणी की विदेश प्रसारण सेवा में भी काम किया है. आज हम आपके लिए रेख्ता के साभार से लेकर आए हैं नोमान शौक़ की शायरी...
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1. अब ऐसी वैसी मोहब्बत को क्या सँभालूँ मैं
ये ख़ार-ओ-ख़स का बदन फूँक ही न डालूँ मैं

गर एक दिल से नहीं भरता मेरे यार का दिल
तो इक बदन में भला कितने साँप पालूँ मैं
न क़ब्र की है जगह शहर में न मस्जिद की
बताओ रूह के काँटे कहाँ निकालूँ मैं
सदाक़तों पे बुरा वक़्त आने वाला है
अब उस के काँपते हाथों से आईना लूँ मैं
कई ज़माने मिरा इंतिज़ार करते हैं
ज़मीं रुके तो कोई रास्ता निकालूँ मैं
मैं आँख खोल के चलने की लत न छोड़ सका
नहीं तो एक न इक रोज़ ख़ुद को पा लूँ मैं
हज़ार ज़ख़्म मिले हैं मगर नहीं मिलता
वो एक संग जिसे आइना बना लूँ मैं
सुनो मैं हिज्र में क़ाएल नहीं हूँ रोने का
कहो तो जश्न ये अपनी तरह मना लूँ मैं .
2. क़ाएदे बाज़ार के इस बार उल्टे हो गए
आप तो आए नहीं पर फूल महँगे हो गए
एक दिन दोनों ने अपनी हार मानी एक साथ
एक दिन जिस से झगड़ते थे उसी के हो गए
मुझ को इस हुस्न-ए-नज़र की दाद मिलनी चाहिए
पहले से अच्छे थे जो कुछ और अच्छे हो गए
मुद्दतों से हम ने कोई ख़्वाब भी देखा नहीं
मुद्दतों इक शख़्स को जी भर के देखे हो गए
बस तिरे आने की इक अफ़्वाह का ऐसा असर
कैसे कैसे लोग थे बीमार अच्छे हो गए .
3.आसमानों से ज़मीं की तरफ़ आते हुए हम
एक मजमे के लिए शेर सुनाते हुए हम
किस गुमाँ में हैं तिरे शहर के भटके हुए लोग
देखने वाले पलट कर नहीं जाते हुए हम
कैसी जन्नत के तलबगार हैं तू जानता है
तेरी लिक्खी हुई दुनिया को मिटाते हुए हम
रेल देखी है कभी सीने पे चलने वाली
याद तो होंगे तुझे हाथ हिलाते हुए हम
तोड़ डालेंगे किसी दिन घने जंगल का ग़ुरूर
लकड़ियाँ चुनते हुए आग जलाते हुए हम
तुम तो सर्दी की हसीं धूप का चेहरा हो जिसे
देखते रहते हैं दीवार से जाते हुए हम
ख़ुद को याद आते ही बे-साख़्ता हँस पड़ते हैं
कभी ख़त तो कभी तस्वीर जलाते हुए हम .
4. बताऊँ कैसे कि सच बोलना ज़रूरी है
तअल्लुक़ात में ये तजरबा ज़रूरी है
नज़र हटा भी तो सकती है कम-नज़र दुनिया
वहीं है भीड़ जहाँ तख़लिया ज़रूरी है
तिरे बग़ैर कोई और इश्क़ हो कैसे
कि मुशरिकों के लिए भी ख़ुदा ज़रूरी है
नहीं तो शहर ये सो जाएगा सदा के लिए
मुझे ख़बर है मिरा बोलना ज़रूरी है
किसी को होता नहीं यूँ मोहब्बतों का यक़ीं
चराग़ बुझ के बताए हवा ज़रूरी है
मैं ख़ुद को भूलता जाता हूँ और ऐसे में
तिरा पुकारते रहना बड़ा ज़रूरी है
वो मेरी रूह की आवाज़ सुन रहा होगा
बदन रहे न रहे राब्ता ज़रूरी है .
5. बरसों पुराने ज़ख़्म को बे-कार कर दिया
हम ने तिरा जवाब भी तय्यार कर दिया
तौक़-ए-बदन उतार के फेंका ज़मीं से दूर
दुनिया के साथ चलने से इंकार कर दिया
ख़ुद ही दिखाए ख़्वाब भी तौसी-ए-शहर के
जंगल को ख़ुद ही चीख़ के हुशियार कर दिया
जम्हूरियत के बीच फँसी अक़्लियत था दिल
मौक़ा जिसे जिधर से मिला वार कर दिया
आए थे कुछ सितारे तिरी रौशनी के साथ
हम अपने ही नशे में थे इंकार कर दिया
वो नींद थी कि मौत मुझे कुछ पता नहीं
गहरे घने सुकूत ने बेदार कर दिया
हम आईने के सामने आए तो रो पड़े
उस ने सजा-सँवार के बे-कार कर दिया .

सफर शायरी

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया
मजरूह सुल्तानपुरी

किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल
कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा
अहमद फ़राज़

अपनी मर्ज़ी से कहां अपने सफ़र के हम हैं
रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं
निदा फ़ाज़ली

इस सफ़र में नींद ऐसी खो गई
हम न सोए रात थक कर सो गई
राही मासूम रज़ा

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो
निदा फ़ाज़ली

आवाज़ दे के देख लो शायद वो मिल ही जाए
वर्ना ये उम्र भर का सफ़र राएगांं तो है
मुनीर नियाज़ी

मैं लौटने के इरादे से जा रहा हू मगर
सफ़र सफ़र है मेरा इंतिज़ार मत करना
साहिल सहरी नैनीताली

मुझे ख़बर थी मेरा इंतिज़ार घर में रहा
ये हादसा था कि मैं उम्र भर सफ़र में रहा
साक़ी फ़ारुक़

सफ़र में ऐसे कई मरहले भी आते हैं
हर एक मोड़ पे कुछ लोग छूट जाते हैं
आबिद अदीब

ख़ामोश ज़िंदगी जो बसर कर रहे हैं हम
गहरे समुंदरों में सफ़र कर रहे हैं हम
रईस अमरोहव

है कोई जो बताए शब के मुसाफ़िरों को
कितना सफ़र हुआ है कितना सफ़र रहा है
शहरयार

ये बद-नसीबी नहीं है तो और फिर क्या है
सफ़र अकेले किया हम-सफ़र के होते हुए
हसीब सोज़

रेत-सी धूप है खेत चुपचाप हैं- दिनेश कुमार शुक्ल

सखि, डाल #कदम्ब की डोलती है
चहुं ओर सुधारस घोलती है । सखि

रेत-सी धूप है खेत चुपचाप हैं
मेंड़ पर ऊंघते पेड़ चुपचाप हैं
सूखते रुख की आत्मा में कहीं
जो तरलता बची है सो डोलती है
प्यार से ज़िन्दगी को टटोलती है
जो ये डाल कदम्ब की डोलती है । सखि.

अब न यमुना रही ना रहा वेणुवन
अब न मुरली की धुन ना कहीं श्यामघन
तप रही है मही तप रहा है गगन
और बरसों से सोया पड़ा है पवन
फिर भी जीवट तो इसका ज़रा देखिये
एक लौ-सी लगी है सो डोलती है । सखि.

वो नहर के किनारे जहां पेड़ थे
जिनकी माटी में जीवन का गुंजार था
खेलता जिनमें फसलों का अंबार था
उसमें भट्ठे का ज्वालामुखी बो दिया
रात दिन अब धधकता धरा का हिया
चिमनी माहौल में जहर घोलती है
फिर भी डाल कदम्ब की डोलती है । सखि.


हमने सोचा था अबकी फसल जो कटी
जाके कंगन तुम्हारे छुड़ा लाऊंगा
और कपड़े नये सबको सिलवाऊंगा
मां को काशी प्रयाग करा लाऊंगा
और छप्पर नया घर पे डलवाऊंगा।

लेकिन बादल जो आये तो अफसर बने ।
जीप पर तन के आये औ' चलते बने
उनके बंगलों में फूहड़ चमन है खिला
आग में भुन रहा है कि सारा जिला
आप कीजेगा जाकर के किससे गिला
बेरुखी का बड़ा लम्बा है सिलसिला ।
बेरुखी के कुतंत्र को तोड़ती है
जो ये डाल कदम्ब की डोलती है । सखि.
आग का, ध्वंस का यह महाज्वार है
क्या अजब युद्ध है मूसलों मार है
धर्म अब एक महामार हथियार है
जाति की एक कुटिल धार तलवार है
भाई भाई को खाने को तैयार है
दायें बाजू का बायें पे ये वार है
ऐसा खुदकुश समां - वक्त दुश्वार है।

और महलों में बैठा गुनहगार है
जिसकी दुर्नीति का भेद खोलती है । सखि.
किन्तु इतिहास के दौर में जब कभी
सभ्यता शक्ति अपनी बटोरती है
सोती चेतना की झकझोरती है,
न्याय का सूर्य होता उदय है तभी,
मुक्ति मिलती है सारी कुरूपता से,
सूखती पतझरी शाख पर जब कभी
एक कोंपल सुनहरी-सी फूटती हैं। सखि

कदंब- 1. कदम नामक वृक्ष 2. कदम के फल 3. समूह; झुंड 4. राशि; ढेर।
 

हम पंछी उन्मुक्त गगन के

हम पंछी उन्मुक्त गगन के
पिंजरबद्ध न गा पाएंगे
कनक-तीलियों से टकराकर
पुलकित पंख टूट जाएंगे ।

हम बहता जल पीने वाले
मर जाएंगे भूखे-प्यासे
कहीं भली है कटुक निबोरी
कनक-कटोरी की मैदा से ।

स्वर्ण-श्रृंखला के बंधन में
अपनी गति, उड़ान सब भूले
बस सपनों में देख रहे हैं
तरु की फुनगी पर के झूले ।

ऐसे थे अरमान कि उड़ते
नील गगन की सीमा पाने
लाल किरण-सी चोंच खोल
चुगते तारक-अनार के दाने ।

होती सीमाहीन क्षितिज से
इन पंखों की होड़ा-होड़ी
या तो क्षितिज मिलन बन जाता
या तनती सांसों की डोरी ।
 
नीड़ न दो, चाहे टहनी का
आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो
लेकिन पंख दिए हैं तो
आकुल उड़ान में विघ्न न डालो ।

कनक- 1. स्वर्ण; सोना 2. धतूरा 3. टेसू 4. पलाश; ढाक 5. नागकेसर 6. खजूर 7. गेहूँ का आटा 8. अनाज।