Wednesday, September 30, 2020

जुल्म शायरी

हज़ारों ज़ुल्म हों मज़लूम पर तो चुप रहे दुनिया 
अगर मज़लूम कुछ बोले तो दहशत-गर्द कहती है 
-ज़मीर अतरौलवी


ज़ुल्म सहना भी तो ज़ालिम की हिमायत ठहरा 
ख़ामुशी भी तो हुई पुश्त-पनाही की तरह 
-परवीन शाकिर


कुछ ज़ुल्म ओ सितम सहने की आदत भी है हम को 
कुछ ये है कि दरबार में सुनवाई भी कम है 
-ज़िया ज़मीर

बे-वज्ह ज़ुल्म सहने की आदत नहीं रही 
अब हम को दुश्मनों की ज़रूरत नहीं रही 
- सलमान अख़्तर

मुख़्तसर सी ज़िंदगी में बस ख़िलिश गिनते रहे।

मुख़्तसर सी ज़िंदगी में बस ख़िलिश गिनते रहे।
अच्छे दिन थे फिर भी गर्दिश गिनते रहे।।

चाहता है यह पागल प्यार,अनोखा एक नया संसार!

चाहता है यह पागल प्यार,
अनोखा एक नया संसार!

कलियों के उच्छवास शून्य में तानें एक वितान,
#तुहिन-कणों पर मृदु कंपन से सेज बिछा दें गान;

जहां सपने हों पहरेदार,
अनोखा एक नया संसार !

करते हों आलोक जहां बुझ बुझ कर कोमल प्राण,
जलने में विश्राम जहां मिटने में हों निर्वाण;

वेदना मधु मदिरा की धार,
अनोखा एक नया संसार !


मिल जावे उस पार क्षितिज के सीमा सीमाहीन,
गर्वीले नक्षत्र धरा पर लोटें होकर दीन !

उदधि हो नभ का शयनगार,
अनोखा एक नया संसार !
जीवन की अनुभूति तुला पर अरमानों से तोल,
यह अबोध मन मूक व्यथा से ले पागलपन मोल !

करें दृग आँसू का व्यापार,
अनोखा एक नया संसार! 

-महादेवी वर्मा 

तुहिन - 1. हिम; तुषार 2. ओस कण 3. ज्योत्स्ना; चाँदनी, शीत; ठंडक।  

Tuesday, September 29, 2020

मुश्किल वक़्त तो अब आया है

सब आसान हुआ जाता है 
मुश्किल वक़्त तो अब आया है 

जिस दिन से वो जुदा हुआ है 
मैं ने जिस्म नहीं पहना है 

कोई दराड़ नहीं है शब में 
फिर ये उजाला सा कैसा है 


बरसों का बछड़ा हुआ साया 
अब आहट ले कर लौटा है 

अपने आप से डरने वाला 
किस पे भरोसा कर सकता है 

एक महाज़ पे हारे हैं हम 
ये रिश्ता क्या कम रिश्ता है 


क़ुर्ब का लम्हा तो यारों को 
चुप करने में गुज़र जाता है 

सूरज से शर्तें रखता हूँ 
घर में चराग़ नहीं जलता है 

दुख की बात तो ये है 'दोस्त' 
उस का वहम भी सच निकला है 

तेरी जुदाई से मेरे सीने में जलन है

तेरी जुदाई से मेरे सीने में जलन है,
पहना मैंने ग़मों का कफन है।
जल गया मेरी खुशियों का बाग़,
जो बचा बस तन्हाई का चमन है।
इश्क-ओ-मुहब्बत के लिए सब बेचैन है,
कौन समझाए इन्हें इसमें ना सुकून ना चैन है।
एक पल में बदल जाती है दिल की दुनिया,
जब होता नयन का नयन से चयन है।
ये दरिया, ये समंदर, ये रवानी ये जवानी,
ना संभाली जाए, बंद कर तूफान चले पवन है।
जो होश ग़वा बैठे हैं सनम बेवफा के लिए,
 उन्हीं के दामन में गमों का आगमन है।

कभी हम महक जाते है, कभी बहक जाते हैं!

मिलावट है तेरे ईश्क में इत्र और शराब की, 
कभी हम महक जाते है, कभी बहक जाते हैं! 

मेरे उम्र का बेहतरीन हिस्सा है

मेरे रोने का जिस में क़िस्सा है
उम्र का बेहतरीन हिस्सा है
- जोश मलीहाबादी

बेहतर दिनों की आस लगाते हुए 'हबीब'
हम बेहतरीन दिन भी गँवाते चले गए
- हबीब अमरोहवी

जब आ जाती है दुनिया घूम फिर कर अपने मरकज़ पर 
तो वापस लौट कर गुज़रे ज़माने क्यूँ नहीं आते 
- इबरत मछलीशहरी

सब कुछ तो है क्या ढूँडती रहती हैं निगाहें 
क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नहीं जाता 
- निदा फ़ाज़ली

दर्द को दिल में जगह दो अकबर 
इल्म से शायरी नहीं होती 
-अकबर इलाहाबादी 

फ़लक देता है जिन को ऐश उन को ग़म भी होते हैं 
जहाँ बजते हैं नक़्क़ारे वहीं मातम भी होते हैं 
-दाग़ देहलवी  

लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले 
अपनी ख़ुशी न आए न अपनी ख़ुशी चले 
-शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

मता-ए-लौह-ओ-क़लम छिन गई तो क्या ग़म है 
कि ख़ून-ए-दिल में डुबो ली हैं उँगलियाँ मैं ने 
-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

घर लौट के रोएँगे माँ बाप अकेले में 
मिट्टी के खिलौने भी सस्ते न थे मेले में 
-क़ैसर-उल जाफ़री

लहू न हो तो क़लम तर्जुमाँ नहीं होता 
हमारे दौर में आँसू ज़बाँ नहीं होता 
-वसीम बरेलवी

मिलाते हो उसी को ख़ाक में जो दिल से मिलता है 
मिरी जाँ चाहने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है 
- दाग़ देहलवी

'वसीम' सदियों की आँखों से देखिए मुझ को
वो लफ़्ज़ हूँ जो कभी दास्ताँ नहीं होता
-वसीम बरेलवी

तुम मुख़ातिब भी हो क़रीब भी हो 
तुम को देखें कि तुम से बात करें 
- फ़िराक़ गोरखपुरी

ग़ैरों से कहा तुम ने ग़ैरों से सुना तुम ने 
कुछ हम से कहा होता कुछ हम से सुना होता 
- चराग़ हसन हसरत

Monday, September 28, 2020

मैं बेकसूर हूं इल्ज़ाम थोपा गया है

मैं बेकसूर हूं इल्ज़ाम थोपा गया है
दिले गुलिस्तान में बबूल रोपा गया है

मैं तो जुगनू हूं मुझे अंधेरों से प्यार है
मुझपर दावा ए आफताब ठोका गया है

लहू के रंग से जाहिर है हम सब एक हैं
जाने क्यों खंजर ए नफरत घोंपा गया है

ग़म की घड़ी को भी ख़ुशी से गुज़ार दे &..

उन्हें ये फिक्र है हर दम नई तर्ज़ ऐ जफा क्या है, 
हमें ये शौक है देखें सितम की इम्तिहाँ क्या है! 
-भगत सिंह 

दिल दे तो इस मिज़ाज का परवरदिगार दे 
जो ग़म की घड़ी को भी ख़ुशी से गुज़ार दे 
-दाग़ देहलवी

सजाकर मैयते उम्मीद नाकामी के फूलों से 
किसी बेदर्द ने रख दी मेरे टूटे हुए दिल में 


छेड़ ना ऐ फरिश्ते तू ज़िक्रे ग़मे जानाना
क्यूं याद दिलाते हो भूला हुआ अफ़साना 
 
नशा पिला के गिराना तो सबको आता है
मज़ा तो जबकि गिरतों को थाम ले साक़ी
- ग़ालिब 


कहूं किससे मैं कि क्या है, शबे ग़म बुरी बला है 
मुझे क्या बुरा था मरना, अगर एक बार होता 
- ग़ालिब

न पूछ 'इक़बाल' का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की 
कहीं सर-ए-राहगुज़ार बैठा सितम-कश-ए-इंतिज़ार होगा 
- अल्लामा इक़बा

रहेगी आबोहवा में ख़याल की बिजली
ये मुश्त ख़ाक है फ़ानी रहे रहे न रहे ।
-बृज नारायण चकबस्त

ख़ुदा के आशिक़ तो हैं हज़ारों बनों में फिरते हैं मारे मारे 
मैं उस का बंदा बनूँगा जिस को ख़ुदा के बंदों से प्यार होगा 
-अल्लामा इक़बाल

मैं वो चिराग हूं जिसको फरोगेहस्ती में 
करीब सुबह रौशन किया, बुझा भी दिया 

औरों का है पयाम और मेरा पयाम और है 
इश्क़ के दर्द-मंद का तर्ज़-ए-कलाम और है 
- अल्लामा इक़बाल

तुझे शाख-ए-गुल से तोड़ें ज़हे-नशीब तेरे
तड़पते रह गए गुलज़ार में रक़ीब तेरे

जाते हुए कहते हो क़यामत को मिलेंगे 
क्या ख़ूब क़यामत का है गोया कोई दिन और 
-मिर्ज़ा ग़ालिब

वहीं बैठे रहो, बस दूर ही से बात करते हैं 
जफ़ा कैसी, वफ़ा से भी तुम्हारी हम तो डरते हैं

दैर नहीं हरम नहीं दर नहीं आस्ताँ नहीं 
बैठे हैं रहगुज़र पे हम ग़ैर हमें उठाए क्यूँ 
-मिर्ज़ा ग़ालिब

आह करूं तो जग जले, और जंगल भी जल जाए 
पापी जियरा न जले जिसमें आह समाए 

आज क्यों परवा नहीं अपने असीरों की तुझे 
कल तलक तेरा भी दिल महरो वफ़ा का बाब था 

बेटी शायरी

मुस्कुराता देख बेटी को मैंने पूछ लिया?
कहने लगी पापा ने मुझको बेटा कहा है.

“महक, मोहब्बत और बेटियाँ
कब वहाँ रूकती जहाँ वो पलती हैं
घर में संगीत बजता है हर पल
बेटियाँ पाज़ेब पहनकर चलती हैं
रौनक़ घर में बेटियों से ही होती है
मौजूदगी से वो घरों को रोशन करती हैं

खुद की बहन-बेटी को इज्जत से देखने वाले,
दूसरों के बहन-बेटियों की इज्जत के बनों रखवाले।

हर परिवार के कुल को बढ़ाती है बेटियां,
फिर भी पैरों तले कुचल दी जाती है बेटियां।

ना जाने ये कैसे लोग है
जो बेटियों को कोख में ही मरवाते है,
ऐसा लगता है ऐसे गिरे हुए लोग
किसी पुरूष की कोख से जन्म लेकर आते है.

माँ-बाप की एक आह पर छुप-छुप कर रोती है बेटियां,
फिर भी आज के दौर में गर्भ में जान खोती है बेटियां।

वो लड़के अपनी पुरषार्थ को क्या दिखा पाएंगे,
जो लड़कियों को इज्जत से नहीं देख पाएंगे।

खिलती हुई कलियाँ हैं बेटियाँ,
माँ-बाप का दर्द समझती हैं बेटियाँ,
घर को रोशन करती हैं बेटियाँ,
लड़के आज हैं तो आने वाला कल हैं बेटियाँ.

बेटी भार नही है आधार,
जीवन हैं उसका अधिकार,
शिक्षा हैं उसका हथियार
बढ़ाओ कदम, करो स्वीकार.

बेटे भाग्य से होते हैं
पर बेटियाँ सौभाग्य से होती हैं.

जरूरी नही रौशनी चिरागों से ही हो,
बेटियाँ भी घर में उजाला करती हैं.

जिस घर मे होती है बेटियां
रौशनी हरपल रहती है वहां
हरदम सुख ही बरसे उस घर
मुस्कान बिखेरे बेटियां जहाँ.

सब ने पूछा बहु दहेज़ में क्या-क्या ले आई,
किसी ने ना पूछा बेटी क्या-क्या छोड़ आई.

एक मीठी सी मुस्कान हैं बेटी,
यह सच है कि मेहमान हैं बेटी,
उस घर की पहचान बनने चली
जिस घर से अनजान हैं बेटी.

बिटिया मेरी कहती बाहें पसार
उसको चाहिए बस प्यार-दुलार,
उसकी अनदेखी करते हैं सब
क्यों इतना निष्ठुर ये संसार.

ख़ुश्बू बिखेरती फूल है बेटी,
इंद्रधनुष का सुंदर रूप है बेटी,
सुरों को सुंदर बनाने वाली साज है बेटी
हकीकत में इस धरती का ताज है बेटी।

बिन बिटिया के कैसे बसेगा घर-परिवार
कैसे आएगी खुशियाँ कैसे बढेगा संसार
गर्भ से लेकर यौवन तक बस उस पर
लटक रही है हरदम तलवार.

मातृशक्ति यदि नही बची तो
बाकी यहाँ रहेगा कौन?
प्रसव वेदना, लालन-पालन
सब दुःख-दर्द सहेगा कौन?
मानव हो तो दानवता को
त्यागो फिर ये उत्तर दो इस
नन्ही से जान के दुश्मन को
इंसान कहेगा कौन?

बेटा अंश हैं तो बेटी वंश हैं,
बेटा आन हैं तो बेटी शान हैं.

लक्ष्मी का वरदान हैं बेटी,
धरती पर भगवान हैं बेटी.

माँ-बाप के जीवन में ये दिन भी आता हैं,
जिगर का टुकड़ा ही एक दिन दूर हो जाता हैं.

बेटी बचाओ और जीवन सजाओ,
बेटी पढ़ाओ और ख़ुशहाली बढ़ाओ.

किस्मत वाले है वो लोग
जिन्हें बेटियां नसीब होती है
ये सच है कि उन लोगों को
रब की मोहब्बत नसीब होती है.

धन पराया होकर भी
बेटी होती नहीं पराई
इसीलिए बिन रोये माँ-बाप
बेटी की करते नहीं विदाई.

बेटियाँ सब के मुक़द्दर में कहाँ होती हैं,
घर खुदा को जो पसंद आये वहाँ होती हैं.

हर शख़्स मुझे जिंदगी जीने का
सलीका सिखाता है,
कैसे कहूँ इक ख़्वाब अधूरा है मेरा
वरना जीना तो मुझे भी आता है.

हमेशा खुद को मजबूत दिखाते है पापा,
बिदाई के समय ऐसा लगा जैसे
जी भर कर रोना चाहते है पापा।

बेटी हूँ आपकी अब पत्नी का
फर्ज निभाने जा रही हूँ मैं,
एक अंजान रिश्तें के ख़ातिर
आपका दामन छोड़ कर जा रही हूँ मैं.

तकलीफ़ कितनी भी हो उफ़ नहीं कहती,
ऐसा दर्द तो केवल बेटी ही है सहती.

बेटी को मत समझो भार,
जीवन का हैं ये आधार.

बेटी है कुदरत का उपहार,
जीने का इसको दो अधिकार.

बेटे अक्सर चले जाते हैं माँ-बाप का दिल तोड़कर,
बेटियाँ तो गुजारा कर लेती हैं टूटी पायल जोड़कर.

हर बेटी की यही कहानी है,
शादी के बाद कई नये रिश्तें निभानी है.

पराया होकर भी कभी पराई नही होती,
शायद इसलिए
कभी पिता से हँसकर बेटी की बिदाई नही होती.

मुझे पापा से ज्यादा शाम अच्छी लगती हैं,
क्योकि पापा तो सिर्फ खिलौने लाते हैं
पर शाम तो पापा को लाती हैं.

बेटियों की बदौलत ही आबाद है घर-परिवार,
अगर न होती बेटियाँ तो थम जाता यह संसार.

ये आंधियां अब मेहरबान नहीं होगी,
दिए की लौ को बढ़ाना होगा,
इससे पहले की सारी कश्तियां
डूब जाएँ बेटियों को बचाना होगा।

अहसासों की सेज सजी है,
यादो का फ़साना है,
अपने घर को छोड़कर
साजन के घर जाना है.

क्या कहती हो ठहरो नारी
संकल्प अश्रु-जल-से-अपने
तुम दान कर चुकी पहले ही
जीवन के सोने-से-सपने।

माँ जन्म देती है,
दादी कहानी सुनाती है,
बहन राखी बांधती है,
पत्नी जीवनभर साथ निभाती है
नारी के बिना जिंदगी कहाँ होती है.

क्यों ऐसे मायूस और कमजोर बनी हुई है,
उठ खड़ी हो नारी, तेरे साथ खड़ी है ये दुनिया सारी।

चेहरे पर आती है एक अलग ही मुस्कान,
जब बेटी बढ़ाती है माता-पिता की शान,
अपनी मंजिल की ओर बढ़ने का मिला तुम्हें सम्मान
तुम से ही बनी रहेगी तुम्हारे माता-पिता की पहचान।

बेटियों के पास भी पंख होते है
कभी उनके अरमान देखों,
एक मौका और थोड़ा सा हौसला दो
फिर उसकी ऊँची उड़ान देखो।

बेटी की हर ख्वाहिश पूरी नहीं होती
फिर भी बेटिया कभी भी अधूरी नहीं होती

जागरूक बनिए, सोच बदलिये और यही है सही.
जो पैसे मांगते है उन्हें भीख दीजिये… बेटी नहीं।

अगर बेटी की शादी न हो उसकी रजा से,
तो बेटी की जिंदगी कम नहीं होती है किसी सजा से.

बेटियां दिल में बसकर धड़कनों को धड़काती है,
और माँ-बाप के जीने की वजह बन जाती हैं.

माँ-बाप का हमेशा ख्याल बेटियां रखती है,
फिर क्यों परी-सी बेटी कोख में ही मरती है.

लड़कियों के अरमानों को चूल्हें में झोकने की,
अब तुम्हारी औकात नहीं होगी इन्हें रोकने की.

बेटी होने का कर्ज चुकाया,
अब बहू होने का फर्ज निभा रही है,
आज भी कहीं किसी कोने में वो
छुपकर अपने सारे ख़्वाब छुपा रही है.

दहेज़ जैसे बुरे रस्मों-रिवाज और यह दुनियादारी,
वरना किस माँ-बाप को अपनी बेटी नहीं होती है प्यारी।

मानवता का खून जो कोख में बहाओगे,
बेटियां नहीं होंगी तो बहू कहाँ से लाओगे।

बेटी हूँ इसलिए गर्भ में ही मेरा कत्ल कर दिया,
ना जाने क्यों खुदा ने तुम्हे माँ बनने का हक दिया।

बेटी हो या बहू अपनी मुस्कान से
घर में उजाला कर देती है,
सारे गमों को अपने दामन में समेट कर
खुशियों से वो आंगन भर देती है.

बेटी के दिल में माँ-बाप के तस्वीर बड़े होते हैं,
क्योंकि हर सुख-दुःख में बेटी के साथ खड़े होते हैं.

कोई नजराना देता है कोई सम्मान देता है,
मगर बेटी का बाप जो कन्यादान देता है,
न कोई दान है ऐसा चाहे कितना भी हो पैसा
इक बेटी का बाबुल तुम्हें अपनी जान देता है.

बेटियों से ही सृष्टि है ये भेष है,
फिर क्यों बेटियों से इतना द्वेष है.