Monday, April 22, 2024

रात भर मैं तुझे बस सोचता रहूँ

​रात भर मैं तुझे बस सोचता रहूँ

बात जो दिल में छुपी ना किसी से कहूँ
मैने देखी है हर पल राह बस तेरी
राह हर राही से तेरी पूछता रहूँ ।
नींद आती नहीं अब रात भर मुझे
चेहरा तेरा कहे बस प्यार कर मुझे
छूना चाहूँ मैं जब भी तू दूर हो जाए
हाथ दोनों मेरे मजबूर हो जाएं
ऐसा पागल हुआ हूँ मैं प्यार में तेरे
उठ- उठ कर तुझे बस खोजता रहूँ
रात भर मैं तुझे बस सोचता रहूँ ।
याद मेरी तुझे जब भी आ जाएगी
बदलियां पलकों पर तेरी भी छा जाएंगी
तू पुकारेगा जब भी याद करके मुझे
मैं मिलूंगा खड़ा उसी राह पर तुझे
हम मिले थे जहाँ पहली मुलाकात में
मैं वहीं हूँ खड़ा तन्हा बरसात में
तू आए ना जब तक दिलबर मेरे
आंसुओं को मेरे बस पोंछता रहूँ
रात भर मैं तुझे बस सोचता यहाँ ।

आँखों में ही रख लो

 अब दिल में रहना,

गंवारा नहीं !!

आँखों में ही रख लो,

मुझको कहीं !!


पहले से ही दिल में,

हैं लफड़े बड़े !!

कुछ हैं खड़े कुछ,

इधर पड़े कुछ उधर पड़े !!

दिक्कत है बहुत,

बहुत है परेशानी !!

पलकों में ही रख लो,

तुम मुझको कहीं !!


लाखों हैं चाहने वाले तेरे,

सब दिल में ही रहते..

हैं लफड़े बड़े !!

दिल तेरा बना है

यारा धर्मशाला !!

मुझको भी ठहरा दे,

आज की रात कहीं !!

कुछ ना कहूँगा मैं

किसी से..कर ले यकीं !!

Tuesday, April 16, 2024

ज़िंदगी ये तो नहीं तुझ को सँवारा ही न हो

​ज़िंदगी ये तो नहीं तुझ को सँवारा ही न हो 

कुछ न कुछ हम ने तिरा क़र्ज़ उतारा ही न हो 

दिल को छू जाती है यूँ रात की आवाज़ कभी 
चौंक उठता हूँ कहीं तू ने पुकारा ही न हो 

कभी पलकों पे चमकती है जो अश्कों की लकीर 
सोचता हूँ तिरे आँचल का किनारा ही न हो 

ज़िंदगी एक ख़लिश दे के न रह जा मुझ को 
दर्द वो दे जो किसी तरह गवारा ही न हो 

शर्म आती है कि उस शहर में हम हैं कि जहाँ 
न मिले भीक तो लाखों का गुज़ारा ही न हो 

Jaan Nisar Akhtar

उस को सोचा ही नहीं जिस से मोहब्बत नहीं की

​वहाँ महफ़िल न सजाई जहाँ ख़ल्वत नहीं की 

उस को सोचा ही नहीं जिस से मोहब्बत नहीं की 

अब के भी तेरे लिए जाँ से गुज़र जाएँगे हम 
हम ने पहले भी मोहब्बत में सियासत नहीं की 

तुम से क्या वादा-ख़िलाफ़ी की शिकायत करते 
तुम ने तो लौट के आने की भी ज़हमत नहीं की 

धड़कनें सीने से आँखों में सिमट आई थीं 
वो भी ख़ामोश था हम ने भी वज़ाहत नहीं की 

रात को रात ही इस बार कहा है हम ने 
हम ने इस बार भी तौहीन-ए-अदालत नहीं की 

गर्द-ए-आईना हटाई है कि सच्चाई खुले 
वर्ना तुम जानते हो हम ने बग़ावत नहीं की 
बस हमें इश्क़ की आशुफ़्ता-सरी खींचती है 
रिज़्क़ के वास्ते हम ने कभी हिजरत नहीं की 

आ ज़रा देख लें दुनिया को भी किस हाल में है 
कई दिन हो गए दुश्मन की ज़ियारत नहीं की 

तुम ने सब कुछ किया इंसान की इज़्ज़त नहीं की 
क्या हुआ वक़्त ने जो तुम से रिआयत नहीं की 

Saleem Kausar

तेरे आ जाने से

​वक्त बदल जाता है

तेरे आ जाने आने से
उदास मन भी खिल जाता है
तेरे आ जाने से 
वक्त बदल जाता है...
बहकने लगता है मेरा मन
तेरे आ जाने से
खिल उठता है मेरा आंगन 
तेरे आ जाने से 
वक्त बदल जाता है.....
बढ़ती है धड़कन थम जाते हैं कदम 
तेरे आ जाने से 
वक्त बदल जाता है......

Friday, April 12, 2024

अक्सर एक गंधमेरे पास से गुज़र जाती है

​अक्सर एक गंध


मेरे पास से गुज़र जाती है,
अक्सर एक नदी
मेरे सामने भर जाती है,
अक्सर एक नाव
आकर तट से टकराती है,
अक्सर एक लीक
दूर पार से बुलाती है।
मैं जहाँ होता हूँ
वहीं पर बैठ जाता हूँ,
अक्सर एक प्रतिमा
धूल में बन जाती है।
अक्सर चाँद जेब में
पड़ा हुआ मिलता है,
सूरज को गिलहरी
पेड़ पर बैठी खाती है,
अक्सर दुनिया
मटक का दाना हो जाती है,
एक हथेली पर
पूरी बस जाती है।
मैं जहाँ होता हूँ
वहाँ से उठ जाता हूँ,
अक्सर रात चींटी-सी
रेंगती हुई आती है।
अक्सर एक हँसी
ठंडी हवा-सी चलती है,
अक्सर एक दृष्टि
कनटोप-सा लगाती है,
अक्सर एक बात
पर्वत-सी खड़ी होती है,
अक्सर एक ख़ामोशी
मुझे कपड़े पहनाती है।
मैं जहाँ होता हूँ
वहाँ से चल पड़ता हूँ,
अक्सर एक व्यथा
यात्रा बन जाती है।

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 

Thursday, April 11, 2024

तुम खूबसूरत हो अपने नाम की तरह

​किसी समंदर पार उतरी हुई शाम की तरह,

तुम खूबसूरत हो अपने नाम की तरह

जब भी मिलती हो अपनी सी लगती हो

​जब भी मिलती हो अपनी सी लगती हो।

अधूरा रह गया वो सपना सी लगती हो।।

ज़िन्दगी तुम तो रंग बदलती रहती हो।
इसीलिए मुझको बेगाना सी लगती हो।।

वादा करना पलट जाना फ़ितरत है तुम्हारी।
फिर क्यों मुझे जान-ए-जानाॅं सी लगती हो।।

ग़म-ए-उल्फत-ए-जानां में पीने लगा हूं मैं।
तुम्हीं साकी तुम्हीं पैमाना सी लगती हो।।

Tuesday, April 9, 2024

कम्बख़त वो आंसू भी छुपाने नहीं देता

​लड़ना है गर तो ढूंढ बराबर का आदमी

तू क्यों खड़ा है रोक के रस्ता फ़क़ीर का

वो जिस अंदाज़ से आती है चिड़िया मेरे आंगन में
अगर आना मेरे घर में तो उस अंदाज़ से आना

लेता है तलाशी मेरी आँखों की हमेशा
कम्बख़त,वो आंसू भी छुपाने नहीं देता

बस्ती के सारे लोग तो मौजूद हैं मगर
खिड़की से मुझको देखनेवाला चला गया

बैठा है हाथ जोड़े आँखों में एक आंसू
देखा नहीं है मैंने पूजा में यूं किसी को

ज्ञानप्रकाश विवेक

ये सर्द रातें भी बन कर अभी धुआँ उड़ जाएँ

​ये सर्द रातें भी बन कर अभी धुआँ उड़ जाएँ

वो इक लिहाफ़ मैं ओढूँ तो सर्दियाँ उड़ जाएँ

ख़ुदा का शुक्र कि मेरा मकाँ सलामत है
हैं उतनी तेज़ हवाएँ कि बस्तियाँ उड़ जाएँ

ज़मीं से एक तअल्लुक़ ने बाँध रक्खा है
बदन में ख़ून नहीं हो तो हड्डियाँ उड़ जाएँ

बिखर बिखर सी गई है किताब साँसों की
ये काग़ज़ात ख़ुदा जाने कब कहाँ उड़ जाएँ

रहे ख़याल कि मज्ज़ूब-ए-इश्क़ हैं हम लोग
अगर ज़मीन से फूंकें तो आसमाँ उड़ जाएँ

हवाएँ बाज़ कहाँ आती हैं शरारत से
सरों पे हाथ न रक्खें तो पगड़ियाँ उड़ जाएँ

बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर
जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जाए

राहतइन्दौरी