Friday, October 6, 2023

इस रास्ते के नाम लिखो एक शाम और

​            इस रास्ते के नाम लिखो एक शाम और

या इस में रौशनी का करो इंतिज़ाम और

आँधी में सिर्फ़ हम ही उखड़ कर नहीं गिरे

हम से जुड़ा हुआ था कोई एक नाम और

मरघट में भीड़ है या मज़ारों पे भीड़ है

अब गुल खिला रहा है तुम्हारा निज़ाम और

घुटनों पे रख के हाथ खड़े थे नमाज़ में

आ जा रहे थे लोग ज़ेहन में तमाम और

हम ने भी पहली बार चखी तो बुरी लगी

कड़वी तुम्हें लगेगी मगर एक जाम और

हैराँ थे अपने अक्स पे घर के तमाम लोग

शीशा चटख़ गया तो हुआ एक काम और

उन का कहीं जहाँ में ठिकाना नहीं रहा

हम को तो मिल गया है अदब में मक़ाम और


दुष्यंत कुमार

न ख़फ़ा है न मुझसे रूठा है

​आईने सा,

ये दिल टूटा है
मेरी क़िस्मत ने
मुझको लूटा है
ज़िंदगी तुझसे
क्या-क्या छूटा है
नींद टूटी है
ख़्वाब टूटा है
उसका अंदाज़ है
जुदा सबसे
न ख़फ़ा है
न मुझसे रूठा है!

Thursday, October 5, 2023

क्या कही कुछ खो गया है कुछ नही

​अपना अपना रास्ता है कुछ नही,

क्या भला है क्या बुरा है कुछ नही ! 


जुस्तजू है एक मुसलसल जुस्तजू,

क्या कही कुछ खो गया है कुछ नही ! 

मोहर मेरे नाम की हर शय पे है,

मेरे घर मे मेरा क्या है कुछ नही ! 


कहने वाले अपनी अपनी कह गए,

मुझसे पुछ क्या सुना है कुछ नही !


कोई दरवाजे पे है तो क्या हुआ,

आप से कुछ मांगता है कुछ नही !! 


(अख्तर नाझमी )

कुछ ज़ब्त भी कमाल है

​कुछ ज़ब्त भी कमाल है ।

कुछ दर्द भी बे'मिसाल है ।।
कुछ जिस्म की है ज़रूरतें ।
कुछ रुह का भी सवाल है ।।
कुछ ख़्वाहिशों की है बेबसी ।
कुछ दिल का भी ख्याल है ।।
कुछ खुद में हम अधूरे से ।
कुछ ज़िंदगी भी सवाल है ।।
कुछ तुझे हैं मुझसे शिकायतें ।
कुछ मुझे भी तुझसे मलाल है ।।
कुछ ज़ब्त भी कमाल है ।
कुछ दर्द भी बे'मिसाल है ।।

Tuesday, October 3, 2023

चलने वाले मुसाफ़िर संभल के चल

​चलने वाले मुसाफ़िर संभल के चल

जिंदगीे के सुर-ताल में ढल के चल

तू भूल जा बीते लम्हों को
नये लम्हों से मिलके चल
न याद कर,गम की रातों को
सुबह के साथ,खिलके चल

बुराई को दिल से निकाल
भलाई से मिलकर चल
मौसम बदला ,हवायें बदली
खुद को भी बदल के चल

जिंदगी की राह बहुत मुश्किल है
तो मुश्किलों को गले लगाके चल
चलने वाले मुसाफ़िर संभल के चल
जिंदगीे के सुर-ताल में ढल के चल

पढ़ रहा हूं प्रेम

​जाने कौन से कल की तलाश में

आज जाग जाग कर पढ़ रहा हूं
प्रेम की कविताएं।

दूसरों की व्यथाएं जानकर
उसे अपना ही साथी मानकर
जीना चाहता हूं अतीत
मन है बहुत व्यथित
फीकी हो चुकी है
प्रेम की धानी चुनरिया
ना जाने किस स्वरूप में
है वो पतली कमरिया।

फिर भी पढ़ रहा हूं
कुछ वादे
हरश्रृंगार से महकते
और कुछ इरादे
अंगार से दहकते।

पढ़ रहा हूं मिलन के गीत
चुभन के साथ
पढ़ रहा हूं जिस्म का पिघलना
पहली छूअन के साथ।

पढ़ रहा हूं कुछ प्रेमपत्र
फिर सिसलेवार
पढ़ रहा हूं कब हुई प्रीत
कब उठा ऐतबार।

पढ़ रहा हूं कि फिर उठी है
प्रेम पढ़ने की भूख
पढ़ रहा हूं कि फिर उठी है
तुझे पाने की हूक।