Saturday, January 9, 2021

एक उम्र बीती मगर दिल वही बच्चा निकला।

 जख्म मरहम से भी अच्छा निकला, 

कम से कम दर्द तो सच्चा निकला। 

तुम्हारी बेबसी का सबब मालूम है हमको, 
एक उम्र बीती मगर दिल वही बच्चा निकला। 

तेरी आवाज की खनक सुन के कलियां चटखें, 
कच्ची बातों में भी किरदार वो सच्चा निकला। 

कभी उसकी वफ़ा के हिसाब लगाने बैठो, 
सिरहाने ख्वाब सुबह का भी सच्चा निकला। 

हाशिया तो रहा हरदम तेरा मुरीद हमदम, 
तेरा ईमान, तेरे इश्क़ से कच्चा निकला। 

Thursday, January 7, 2021

क्यों मानें सपना कोई साकार नहीं होता

फूलों का अपना कोई परिवार नहीं होता 
खुशबू का अपना कोई घर-द्वार नहीं होता 

हम गुज़रे कल की आंखों का सपना ही तो हैं 
क्यों मानें सपना कोई साकार नहीं होता 

इस दुनिया में अच्छे लोगों का ही तो बहुमत है 
ऐसा अगर न होता ये संसार नहीं होता 

कितने ही अच्छे हों काग़ज़ पानी के रिश्ते 
काग़ज़ की नावों से दरिया पार नहीं होता 

हिम्मत हारे तो सब कुछ नामुमकिन लगता है 
हिम्मत कर लें तो कुछ भी दुश्वार नहीं होता 

वे दीवारें घर जैसा सम्मान नहीं पातीं 
जिनमें कोई खिड़की कोई द्वार नहीं होता 

Wednesday, January 6, 2021

हम अधूरे अधूरा हमारा सृजन

हम अधूरे अधूरा हमारा सृजन, 

पूर्ण तो एक बस प्रेम ही है यहां

कांच से ही न नजरे मिलाती रहो, 

बिम्ब को मूक प्रतिबिम्ब छल जायेगा

Tuesday, January 5, 2021

गोपाल दास नीरज के 5 गीत

हम तो मस्त फकीर, हमारा कोई नहीं ठिकाना रे
हम तो मस्त फकीर, हमारा कोई नहीं ठिकाना रे।
जैसा अपना आना प्यारे, वैसा अपना जाना रे।

रामघाट पर सुबह गुजारी
प्रेमघाट पर रात कटी
बिना छावनी बिना छपरिया
अपनी हर बरसात कटी
देखे कितने महल दुमहले, उनमें ठहरा तो समझा
कोई घर हो, भीतर से तो हर घर है वीराना रे।

औरों का धन सोना चांदी
अपना धन तो प्यार रहा
दिल से जो दिल का होता है
वो अपना व्यापार रहा
हानि लाभ की वो सोचें, जिनकी मंजिल धन दौलत हो!
हमें सुबह की ओस सरीखा लगा नफ़ा-नुकसाना रे।

कांटे फूल मिले जितने भी
स्वीकारे पूरे मन से
मान और अपमान हमें सब
दौर लगे पागलपन के
कौन गरीबा कौन अमीरा हमने सोचा नहीं कभी
सबका एक ठिकान लेकिन अलग अलग है जाना रे।

सबसे पीछे रहकर भी हम
सबसे आगे रहे सदा
बड़े बड़े आघात समय के
बड़े मजे से सहे सदा!
दुनिया की चालों से बिल्कुल, उलटी अपनी चाल रही
जो सबका सिरहाना है रे! वो अपना पैताना रे!


दो गुलाब के फूल छू गए जब से होठ अपावन मेरे
दो गुलाब के फूल छू गए जब से होठ अपावन मेरे
ऐसी गंध बसी है मन में सारा जग मधुबन लगता है।

रोम-रोम में खिले चमेली
सांस-सांस में महके बेला,
पोर-पोर से झरे मालती
अंग-अंग जुड़े जूही का मेला
पग-पग लहरे मानसरोवर, डगर-डगर छाया कदम्ब की
तुम जब से मिल गए उमर का खंडहर राजभवन लगता है।
दो गुलाब के फूल...

छिन-छिन ऐसा लगे कि कोई
बिना रंग के खेले होली,
यूं मदमाएं प्राण कि जैसे
नई बहू की चंदन डोली
जेठ लगे सावन मनभावन और दुपहरी सांझ बसंती
ऐसा मौसम फिरा धूल का ढेला एक रतन लगता है।
दो गुलाब के फूल...

जाने क्या हो गया कि हरदम
बिना दिये के रहे उजाला,
चमके टाट बिछावन जैसे
तारों वाला नील दुशाला
हस्तामलक हुए सुख सारे दुख के ऐसे ढहे कगारे
व्यंग्य-वचन लगता था जो कल वह अब अभिनन्दन लगता है।
दो गुलाब के फूल...

तुम्हें चूमने का गुनाह कर
ऐसा पुण्य कर गई माटी
जनम-जनम के लिए हरी
हो गई प्राण की बंजर घाटी
पाप-पुण्य की बात न छेड़ों स्वर्ग-नर्क की करो न चर्चा
याद किसी की मन में हो तो मगहर वृन्दावन लगता है।
दो गुलाब के फूल...

तुम्हें देख क्या लिया कि कोई
सूरत दिखती नहीं पराई
तुमने क्या छू दिया, बन गई
महाकाव्य कोई चौपाई
कौन करे अब मठ में पूजा, कौन फिराए हाथ सुमरिनी
जीना हमें भजन लगता है, मरना हमें हवन लगता है।
दो गुलाब के फूल...


कारवां गुज़र गया
स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पांव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पात-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क़ बन गए,
छंद हो दफ़न गए,
साथ के सभी दिऐ धुआँ-धुआँ पहन गये,
और हम झुके-झुके,
मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आइना मचल उठा
इस तरफ जमीन और आसमां उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गयी कली-कली कि घुट गयी गली-गली,
और हम लुटे-लुटे,
वक्त से पिटे-पिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ़ चांद की संवार दूं,
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूं,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूं,
और सांस यूं कि स्वर्ग भूमि पर उतार दूं,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गये किले बिखर-बिखर,
और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

मांग भर चली कि एक, जब नई-नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरण-चरण,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गांव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन-नयन,
पर तभी ज़हर भरी,
ग़ाज एक वह गिरी,
पुंछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी,
और हम अजान से,
दूर के मकान से,
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।
मानव कवि बन जाता है
तब मानव कवि बन जाता है!
जब उसको संसार रुलाता,
वह अपनों के समीप जाता,
पर जब वे भी ठुकरा देते
वह निज मन के सम्मुख आता,
पर उसकी दुर्बलता पर जब मन भी उसका मुस्काता है!
तब मानव कवि बन जाता है!
जीवन कटना था कट गया
जीवन कटना था, कट गया
अच्छा कटा, बुरा कटा
यह तुम जानो
मैं तो यह समझता हूं
कपड़ा पुराना एक फटना था, फट गया
जीवन कटना था कट गया।

रीता है क्या कुछ
बीता है क्या कुछ
यह हिसाब तुम करो
मैं तो यह कहता हूं
परदा भरम का जो हटना था, हट गया
जीवन कटना था कट गया।

क्या होगा चुकने के बाद
बूंद-बूंद रिसने के बाद
यह चिंता तुम करो
मैं तो यह कहता हूं
करजा जो मिटटी का पटना था, पट गया
जीवन कटना था कट गया।

बंधा हूं कि खुला हूं
मैला हूं कि धुला हूं
यह विचार तुम करो
मैं तो यह सुनता हूं
घट-घट का अंतर जो घटना था, घट गया
जीवन कटना था कट गया।


वफा शायरी

उस की वफ़ा न मेरी वफ़ा का सवाल था
दोनों ही चुप थे सिर्फ़ अना का सवाल था
- अब्बास दाना


है वफ़ा तुझ में तो पाबंद-ए-वफ़ा हूँ मैं भी
मुझ से मिल बैठ मोहब्बत की फ़ज़ा हूँ मैं भी
- सबिहा ख़ान


काश होती वफ़ा ज़माने में
पर हक़ीक़त कहां फ़साने में
- अदील शाकिर


की वफ़ा यार से एक एक जफ़ा के बदले
हम ने गिन गिन के लिए ख़ून-ए-वफ़ा के बदले
- फ़ानी बदायूंनी


दार-ओ-मदार-ए-इश्क़ वफ़ा पर है हम-नशीं
वो क्या करे कि जिस से वफ़ा भी न हो सके
- मख़मूर जालंधरी


सितम करना करम करना वफ़ा करना जफ़ा करना
मगर जो अहद कर लेना वो आख़िर तक वफ़ा करना
- सय्यद नज़ीर हसन सख़ा देहलवी

हज़ारों बार कह कर बेवफ़ा को बा-वफ़ा मैं ने
बताया है ज़माने को वफ़ा का रास्ता मैं ने
- दिवाकर राही


आरज़ू है वफ़ा करे कोई
जी न चाहे तो क्या करे कोई
- दाग़ देहलवी

वफ़ा के बराबर जफ़ा चाहता हूं
तिरा हौसला देखना चाहता हूं
- जिगर जालंधरी


वफ़ा करते उसे देखा नहीं है
मगर वो बेवफ़ा लगता नहीं है
- नाज़िम नक़वी

इश्क में यार ग़र वफा न करे, 
 क्या करे कोई और क्या न करे. 

बारिश पानी शायरी

किस ने भीगे हुए बालों से ये झटका पानी
झूम के आई घटा टूट के बरसा पानी
आरज़ू लखनवी

अगर फ़ुर्सत मिले पानी की तहरीरों को पढ़ लेना
हर इक दरिया हज़ारों साल का अफ़्साना लिखता है
बशीर बद्र

मैंने अपनी ख़ुश्क आंखों से लहू छलका दिया
इक समुंदर कह रहा था मुझ को पानी चाहिए
राहत इंदौरी

हम इंतेज़ार करें हम को इतनी ताब नहीं
पिला दो तुम हमें पानी अगर शराब नहीं
नूह नारवी

ये पानी ख़ामुशी से बह रहा है
इसे देखें कि इस में डूब जाएं
अहमद मुश्ताक़

हंसता पानी रोता पानी
मुझ को आवाज़ें देता था
नासिर काज़मी

हैरान मत हो तैरती मछली को देख कर
पानी में रौशनी को उतरते हुए भी देख
मुहम्मद अल्वी

क़िस्से से तेरे मेरी कहानी से ज्‍़यादा
पानी में है क्या और भी पानी से ज्‍़यादा
अबरार अहमद 

तेरे क़रीब आ के बड़ी उलझनों में हूं

तेरे क़रीब आ के बड़ी उलझनों में हूं
मैं दुश्मनों में हूं कि तिरे दोस्तों में हूं

मुझ से गुरेज़-पा है तो हर रास्ता बदल
मैं संग-ए-राह हूं तो सभी रास्तों में हूं

तू आ चुका है सत्ह पे कब से ख़बर नहीं
बेदर्द मैं अभी उन्हीं गहराइयों में हूं

ऐ यार-ए-ख़ुश-दयार तुझे क्या ख़बर कि मैं
कब से उदासियों के घने जंगलों में हूं

तू लूट कर भी अहल-ए-तमन्ना को ख़ुश नहीं
याँ लुट के भी वफ़ा के इन्ही क़ाफ़िलों में हू

बदला न मेरे बाद भी मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू
मैं जा चुका हूं फिर भी तिरी महफ़िलों में हूं

मुझ से बिछड़ के तू भी तो रोएगा उम्र भर
ये सोच ले कि मैं भी तिरी ख़्वाहिशों में हूं

तू हंस रहा है मुझ पे मिरा हाल देख कर
और फिर भी मैं शरीक तिरे क़हक़हों में हूं

ख़ुद ही मिसाल-ए-लाला-ए-सेहरा लहू लहू
और ख़ुद 'फ़राज़' अपने तमाशाइयों में हूं

कुछ ख़्वाब मिरे ऐन-जवानी में मरे हैं

बहती हुई आंखों की रवानी में मरे हैं
कुछ ख़्वाब मिरे ऐन-जवानी में मरे हैं

रोता हूं मैं उन लफ़्ज़ों की क़ब्रों पे कई बार
जो लफ़्ज़ मिरी शोला-बयानी में मरे हैं

कुछ तुझ से ये दूरी भी मुझे मार गई है
कुछ जज़्बे मिरे नक़्ल-ए-मकानी में मरे हैं

क़ब्रों में नहीं हम को किताबों में उतारो
हम लोग मोहब्बत की कहानी में मरे हैं

इस इश्क़ ने आख़िर हमें बरबाद किया है
हम लोग इसी खौलते पानी में मरे हैं

कुछ हद से ज़ियादा था हमें शौक़-ए-मोहब्बत
और हम ही मोहब्बत की गिरानी में मरे हैं

ज़रा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है

ज़रा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है
समुंदरों ही के लहजे में बात करता है

खुली छतों के दिए कब के बुझ गए होते
कोई तो है जो हवाओं के पर कतरता है

शराफ़तों की यहां कोई अहमियत ही नहीं
किसी का कुछ न बिगाड़ो तो कौन डरता है

ये देखना है कि सहरा भी है समुंदर भी
वो मेरी तिश्ना-लबी किस के नाम करता है

तुम आ गए हो तो कुछ चांदनी सी बातें हों
ज़मीं पे चांद कहां रोज़ रोज़ उतरता है

ज़मीं की कैसी वकालत हो फिर नहीं चलती
जब आसमां से कोई फ़ैसला उतरता है

Saturday, January 2, 2021

खुदा करे कि नया साल सब को रास आए !

तू नया है तो दिखा सुब्ह नई शाम नई 
वर्ना इन आँखों ने देखे हैं नए साल कई 
~ फ़ैज़ लुधियानवी

कौन सी बात नई ऐ दिल-ए-नाकाम हुई
शाम से सुब्ह हुई सुब्ह से फिर शाम हुई

शाद अज़ीमाबादी

नई सुब्ह पर नज़र है मगर आह ये भी डर है
ये सहर भी रफ़्ता रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुँचे

शकील बदायुनी

ना कोई रंज का लम्हा किसी के पास आए
खुदा करे कि नया साल सब को रास आए ! 

#अज्ञात