Saturday, November 5, 2011

दोस्ती

मुहब्ब्तों में दिखावे की दोस्ती न मिला
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला

राह

अभी राह में कई मोड़ हैं कोई आयेगा कोई जायेगा
तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया उसे भूलने की दुआ करो

दुआ का असर

वो बड़ा रहीमो-करीम है मुझे ये सिफ़त भी अता करे
तुम्हें भूलनी की दुआ करूँ तो मेरी दुआ में असर न हो

Shayari

मैं शकील दिल का हूँ तर्जुमां के मुहब्बतों का हूँ राज़दां.
मुझे फ़ख़्र है मेरी शायरी मेरी ज़िन्दगी से जुदा नहीं..
-शकील बदायुनी


I, Shakil, translate what hearts feel
And am privy to the secrets of lovers
I am proud that my poetry is not
divorced from my life's reality

Silsila

आरज़ुओं का सिलसिला कब ख़त्म होगा ऐ दोस्त,
खिल गये गुल तो कलियाँ और पैदा हो गयीं..

Sunday, July 24, 2011

ओ वासंती पवन हमारे घर आना।

बहुत दिनों के बाद खिड़कियां खोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना।
जडे़ हुए थे ताले सारे कमरों में
धूल-भरे थे आले सारे कमरों में।
उलझन और तनावों के रेशों वाले
पुरे हुए थे जाले सारे कमरों में।
बहुत दिनों के बाद संकलें डोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना।
एक थकन-सी थी नव भाव-तरंगों में
मौन उदासी थी वाचाल उमंगों में
लेकिन आज समर्पण की भाषा वाले
मोहक-मोहक प्यारे-प्यारे रंगों में
बहुत दिनों के बाद खुशबुएं घोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना।
पतझर ही पतझर था मन के मधुवन में
गहरा सन्नाटा सा था अन्तर्मन में
लेकिन अब गीतों की स्वच्छ मुंडेरी पर
चिंतन की छत पर भावों के आंगन में
बहुत दिनों के बाद चिरइयां बोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना।

-
डॉ. कुंअर बेचैन

Sunday, April 17, 2011

बढ़े चलो

वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो

साथ में ध्वजा रहे
बाल दल सजा रहे
ध्वज कभी झुके नहीं
दल कभी रुके नहीं

सामने पहाड़ हो
सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर,हटो नहीं
तुम निडर,डटो वहीं

वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो

प्रात हो कि रात हो
संग हो न साथ हो
सूर्य से बढ़े चलो
चन्द्र से बढ़े चलो

वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो

- द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी

Thursday, April 7, 2011

कितने रावण

‘किस रावण की काटूँ बाहें, किस लंका में आग लगाऊँ।
दर-दर रावण, दर-दर लंका, इतने राम कहाँ से लाऊँ।’

Monday, September 27, 2010

गमे जुदाई

गमे जुदाई में इतनी राहत फिर भी निकल आती है।
कि हवाएँ, जो आती हैं तुमे छूकर, मुझे भी छू जाती है।।

Monday, August 16, 2010

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है


वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है


करता नहीं क्यूँ दूसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है


रहबरे राहे मुहब्बत, रह न जाना राह में
लज्जते-सेहरा न वर्दी दूरिए-मंजिल में है


अब न अगले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़
एक मिट जाने की हसरत अब दिले-बिस्मिल में है ।


ए शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरी हिम्मत का चरचा गैर की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


खैंच कर लायी है सब को कत्ल होने की उम्मीद,
आशिकों का आज जमघट कूचा-ए-कातिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


है लिये हथियार दुशमन ताक में बैठा उधर,
और हम तैय्यार हैं सीना लिये अपना इधर,
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


हाथ जिन में हो जुनून कटते नही तलवार से,
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से,
और भड़केगा जो शोला-सा हमारे दिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


हम तो घर से निकले ही थे बाँधकर सर पे कफ़न,
जान हथेली पर लिये लो बढ चले हैं ये कदम.
जिन्दगी तो अपनी मेहमान मौत की महफ़िल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


यूँ खड़ा मकतल में कातिल कह रहा है बार-बार,
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इन्कलाब,
होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें कोई रोको ना आज
दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंज़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमें ना हो खून-ए-जुनून
तूफ़ानों से क्या लड़े जो कश्ती-ए-साहिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है |

- राम प्रसाद बिस्मिल