दुख, शोक, जब जो आ पड़े, सो धैर्यपूर्वक सब सहो।
होगी सफलता क्यों नहीं, कर्तव्य पथ पर दृढ़ रहो।
- मैथिलीशरण गुप्त
आशु तो कुछ भी नहीं आसूँ के सिवा, जाने क्यों लोग इसे पलकों पे बैठा लेते हैं।
दुख, शोक, जब जो आ पड़े, सो धैर्यपूर्वक सब सहो।
होगी सफलता क्यों नहीं, कर्तव्य पथ पर दृढ़ रहो।
- मैथिलीशरण गुप्त
इतनी अदाएं कम थीं जो एक और शामिल है,
कातिल सूरत पहले ही थी अब तो तेरी नजर भी कातिल है.
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कातिल सूरत पहले ही थी, अब तो कयामत ढा रही है,
तेरी सादगी भी अब, दिल पर खंजर चला रही है।मलाल नहीं दर्द की इन्तेहाँ से ,
दर्द भी अपना है और दर्द देने वाला भी ...
हम ने पाला मुद्दतों पहलू में, हम कुछ भी नहीं
तुम ने देखा एक नज़र और दिल तम्हारा हो गया
आसी राम नगरी
गहरे समंदरों की भला क्या खबर उन्हें..
आंखों की झील में जो उतरे नहीं कभी ।।
पन्नों की तरह दिन बदलते जा रहे हैं,
खबर नहीं है कि आ रहे हैं या जा रहे हैं ।
बहुत कुछ सिखाया जिंदगी ने अनजाने में,
किताबों में नहीं था वो सबक सिखाया ज़माने ने।
ज़रा से फासले रहने दो तुम।
बात दिल की कहने दो तुम।
माना दो किनारों की तरह है
कुछ पल साथ में बहने दो तुम।
इश्क़ किया है तो दर्द तो होगा
थोड़ा इसको ज़रा सहने दो तुम।
आंसू,आंहे और टूटे हुए ख्वाब
मोहब्बत के मुझे गहने दो तुम।
सजना संवरना तेरा ,बिजली गिरा गया।
रूप तेरा सलौना ,मेरे दिल को भा गया।
ढूंढे से भी नहीं मिलता ,चैन मेरे दिल को
ढूंढूं ग़र दिल ,तो भी जाने कहां गया।
बार बार पलकों को तेरा गिरा कर उठाना,
दीवाने को ये और दीवाना बना गया ।
जुल्फों का लहराना जैसै काली घटा छाये
दिल मेरा ,तेरा होकर कर मुझसे दगा गया
जाते हुये मुड़ मुड़ कर वो देखना तेरा
बोलूं तो दो बोतल का कर वो नशा गया।
“सीमा नहीं बना करतीं हैं काग़ज़ खींची लकीरों से,
ये घटती-बढ़ती रहती हैं वीरों की शमशीरों से.
(कवि बलवीर सिंह करुण)
सीमा नहीं बना करतीं हैं काग़ज़ खींची लकीरों से,
ये घटती-बढ़ती रहती हैं वीरों की शमशीरों से।
उन्हें अब शायद याद कुछ आती नहीं मेरी।
लगता है चाहत के दिन अब पूरे हो चले।