हक़ीक़त सभी ख़्वाब होते कहां हैं ।
मौसम के जैसे हम बदलते कहां हैं ।।
बिछड़े जो तुमसे बिछड़ने ना देना ।
बिछड़ते हैं जो वो मिलते कहां हैं ।।
आशु तो कुछ भी नहीं आसूँ के सिवा, जाने क्यों लोग इसे पलकों पे बैठा लेते हैं।
हक़ीक़त सभी ख़्वाब होते कहां हैं ।
मौसम के जैसे हम बदलते कहां हैं ।।
बिछड़े जो तुमसे बिछड़ने ना देना ।
बिछड़ते हैं जो वो मिलते कहां हैं ।।
भले दिनों की बात है
भली सी एक शक्ल थी
न ये कि हुस्न-ए-ताम हो
न देखने में आम सी
न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे
मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे
कोई भी रुत हो उस की छब
फ़ज़ा का रंग-रूप थी
वो गर्मियों की छाँव थी
वो सर्दियों की धूप थी
न मुद्दतों जुदा रहे
न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो
न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद
न ये कि इज़्न-ए-आम हो
न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ
कि सादगी गिला करे
न इतनी बे-तकल्लुफ़ी
कि आइना हया करे
न इख़्तिलात में वो रम
कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें
न इस क़दर सुपुर्दगी
कि ज़च करें नवाज़िशें
न आशिक़ी जुनून की
कि ज़िंदगी अज़ाब हो
न इस क़दर कठोर-पन
कि दोस्ती ख़राब हो
कभी तो बात भी ख़फ़ी
कभी सुकूत भी सुख़न
कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ
कभी उदासियों का बन
सुना है एक उम्र है
मुआमलात-ए-दिल की भी
विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या
फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी
सो एक रोज़ क्या हुआ
वफ़ा पे बहस छिड़ गई
मैं इश्क़ को अमर कहूँ
वो मेरी ज़िद से चिड़ गई
मैं इश्क़ का असीर था
वो इश्क़ को क़फ़स कहे
कि उम्र भर के साथ को
वो बद-तर-अज़-हवस कहे
शजर हजर नहीं कि हम
हमेशा पा-ब-गिल रहें
न ढोर हैं कि रस्सियाँ
गले में मुस्तक़िल रहें
मोहब्बतों की वुसअतें
हमारे दस्त-ओ-पा में हैं
बस एक दर से निस्बतें
सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं
मैं कोई पेंटिंग नहीं
कि इक फ़्रेम में रहूँ
वही जो मन का मीत हो
उसी के प्रेम में रहूँ
तुम्हारी सोच जो भी हो
मैं उस मिज़ाज की नहीं
मुझे वफ़ा से बैर है
ये बात आज की नहीं
न उस को मुझ पे मान था
न मुझ को उस पे ज़ोम ही
जो अहद ही कोई न हो
तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी
सो अपना अपना रास्ता
हँसी-ख़ुशी बदल दिया
वो अपनी राह चल पड़ी
मैं अपनी राह चल दिया
भली सी एक शक्ल थी
भली सी उस की दोस्ती
अब उस की याद रात दिन
नहीं, मगर कभी कभीAhmad Faraz
जिसका शांति पूर्ण व्यवहार और वाणी में मधुरता,
क्षमा याचना जिसने सीखी और सीखी समरसता,
विनम्रता के साथ सदा ही औरों से जो पेस आता है ,
आदर सम्मान करता कभी ठेस नहीं पहुंचाता है।
कृतज्ञ पूर्ण व्यवहार है जिसका शुक्रिया अदा करता है,
अपनी गलती होने पर उसको स्वीकार जो करता है।
सबको खुश रखने का उसके पास ही संयंत्र होता है,
दिल जीतने का जग में सच में यही मूलमंत्र होता है।
तेरे संग नज़रों का ,यूँ झुक जाना,
मोहब्बत के धागे में,
पिरो जाता है।
जन्मों के बंधन का ,
दिलाकर एहसास,
यूँ ही खयालों में ,खिंच जाता हूँ ।
ख़ुद की नज़रों से ,होकर ओझल,
तेरे हुस्न का दिवाना ,बन जाता हूँ ।
जब से हुए है रूबरू तुमसे,
एक सनाम सा रिश्ता ,बन गया है हमारा।
तेरे आने की जब ख़बर महके
दर्द दुनिया भर का सीने में लिए जाते हैं हम
ज़िंदगी जीने की मजबूरी जिए जाते हैं हम
अपने दामन से छुड़ा अब कहते ग़ैरों का हुआ
बे-ख़ता दोहरी सज़ाएँ भी पिए जाते हैं हम
यूँ तो ये बाज़ार महफ़िल पर सभी वीरान हैं
फिर भी वीराने में आवाज़ें दिए जाते हैं हमबह रही हैं हर ज़बाँ पर उन की ज़ालिम दास्ताँ
फिर भी कुछ ऐसा कि होंटों को सिए जाते हैं हम
एक ताज़ा चोट यूँ बरसी की पहली धुल गई
इस तरह से ग़म ग़लत ग़म से किए जाते हैं हमरामदरश मिश्र
आग ही आग है गुलशन ये कोई क्या जाने
किस ने फूँका है नशेमन ये कोई क्या जाने
न कहीं सोज़न-ओ-रिश्ता न कहीं बख़िया-गरी
सर-ब-सर चाक है दामन ये कोई क्या जाने
देखते फिरते हैं लोग आईने सय्यारों के
दिल का गोशा भी है दर्पन ये कोई क्या जाने
हुस्न हर हाल में है हुस्न परागंदा नक़ाब
कोई पर्दा है न चिलमन ये कोई क्या जाने
'अर्श' ऊँचा था सर-ए-फ़न कभी या फ़ख़्र ओ ग़ुरूर
अब तह-ए-तेग़ है गर्दन ये कोई क्या जाने
अर्श मलसियानी
महफ़िल से उठ जाने वालो तुम लोगों पर क्या इल्ज़ाम
तुम आबाद घरों के बासी मैं आवारा और बदनाम