Sunday, July 9, 2023

चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ

चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ

जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए 
बस अश्क कहूँ तो एक आँसू 
तेरे गोरे गाल को धो जाए 
मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए 
मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे 
मेरे शाने पर सर रक्खे तू 
मैं नींद कहूँ तू सो जाए 
मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ 
तेरे होंठों पर मुस्कान आए 
मैं दिल लिक्खूँ तू दिल थामे 
मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए 
तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से 
फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ 
कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँ 
कुछ सीधा उल्टा हो जाए 
मैं आह लिखूँ तू हाय करे 
बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू 
फिर बेचैन का बे काटूँ 
तुझे चैन ज़रा सा हो जाए 
अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे 
फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े 
जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो 
मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

फिर दिल से आ रही है सदा उस गली में चल

फिर दिल से आ रही है सदा उस गली में चल

शायद मिले ग़ज़ल का पता उस गली में चल 

कब से नहीं हुआ है कोई शेर काम का 
ये शेर की नहीं है फ़ज़ा उस गली में चल 

वो बाम ओ दर वो लोग वो रुस्वाइयों के ज़ख़्म 
हैं सब के सब अज़ीज़ जुदा उस गली में चल 

उस फूल के बग़ैर बहुत जी उदास है 
मुझ को भी साथ ले के सबा उस गली में चल 

दुनिया तो चाहती है यूँही फ़ासले रहें 
दुनिया के मशवरों पे न जा उस गली में चल 

बे-नूर ओ बे-असर है यहाँ की सदा-ए-साज़ 
था उस सुकूत में भी मज़ा उस गली में चल 

'जालिब' पुकारती हैं वो शोला-नवाइयाँ 
ये सर्द रुत ये सर्द हवा उस गली में चल 

ज़ख़्मों के नए फूल खिलाने के लिए

ज़ख़्मों के नए फूल खिलाने के लिए,

फिर मौसम-ए-गुल याद दिलाने के लिए आ 

मस्ती लिए आँखों में बिखेरे हुए ज़ुल्फ़ें 
आ फिर मुझे दीवाना बनाने के लिए आ 

अब लुत्फ़ इसी में है मज़ा है तो इसी में 
आ ऐ मिरे महबूब सताने के लिए आ 

आ रख दहन-ए-ज़ख़्म पे फिर उँगलियाँ अपनी 
दिल बाँसुरी तेरी है बजाने के लिए आ 

हाँ कुछ भी तो देरीना मोहब्बत का भरम रख 
दिल से न आ दुनिया को दिखाने के लिए आ 

माना कि मिरे घर से अदावत ही तुझे है 
रहने को न आ आग लगाने के लिए आ 

प्यारे तिरी सूरत से भी अच्छी है जो तस्वीर 
मैं ने तुझे रक्खी है दिखाने के लिए, आ 

आशुफ़्ता कहे है कोई दीवाना कहे है 
मैं कौन हूँ दुनिया को बताने के लिए आ 

कुछ रोज़ से हम शहर में रुस्वा न हुए हैं 
आ फिर कोई इल्ज़ाम लगाने के लिए आ 

अब के जो वो आ जाए तो 'दोस्त' उसे ले कर 
महफ़िल में ग़ज़ल अपनी सुनाने के लिए आ

Thursday, July 6, 2023

मंजिल यूँ ही नहीं मिलती राही को

मंजिल यूँ ही नहीं मिलती राही को,

जूनून सा दिल में जगाना पड़ता है.

पूछा चिड़िया कोकि घोंसला कैसे बनता है,

बोलीतिनका तिनका उठाना पड़ता है.

Monday, July 3, 2023

तुम कहते हो कि तुम कुछ भी नहीं

तुम कहते हो कि तुम कुछ भी नहीं

क्यूँ तुमसे नजर मिलते ही जुगनू से चमक जाते हैं मेरी बुझी बुझी सी आँखों में 
क्यूँ तुम्हें अपने पास महसूस कर तितलियाँ सी उड़ने लगती हैं सारे बदन में 
क्यूँ तुम्हारे साथ जिये हुये वो अंतहीन लम्हे भर जाते हैं एक समंदर सा ज्वार 
तुम्हारे तन की खुश्बू क्यूँ चिपट कर रह जाती है मुझसे मेरे आँचल की तरह 
मेरे मलिन मुखड़े पर टाँक जाती है गुलाब की रंगत एक लजीली दुल्हन सी 
संदली हवा बनकर आना और फिर मेरे इर्द गिर्द ही ठहर कर रह जाना तेरा। 
गिरा कर लाज का घूंघट मेरा चुपके से, मुझ पर सोलहवाँ बसन्त बिखरा जाना 
करा जाता है एहसास तेरे होने का मुझमें या फिर मैं ही तिल तिल कर घुल रही तुझमें 
मैं जड़ हो गयी जिन्दगी को फिर से घसीट कर चल पड़ती हूँ तेरी परछाँई को थाम हौले से। 
कुछ तो है तुम में सबसे अलग 
और तुम कहते हो कि तुम कुछ भी नहीं। 

Saturday, July 1, 2023

मैं नज़र से पी रहा हूँ ये समाँ बदल न जाए

मैं नज़र से पी रहा हूँ ये समाँ बदल न जाए 

न झुकाओ तुम निगाहें कहीं रात ढल न जाए 


मिरे अश्क भी हैं इस में ये शराब उबल न जाए 

मिरा जाम छूने वाले तिरा हाथ जल न जाए 


अभी रात कुछ है बाक़ी न उठा नक़ाब साक़ी 

तिरा रिंद गिरते गिरते कहीं फिर सँभल न जाए 


मिरी ज़िंदगी के मालिक मिरे दिल पे हाथ रखना 

तिरे आने की ख़ुशी में मिरा दम निकल न जाए 


मुझे फूँकने से पहले मिरा दिल निकाल लेना 

ये किसी की है अमानत मिरे साथ जल न जाए 

Friday, June 30, 2023

भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना


भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना! 

साथ देखा था कभी जो एक तारा 
आज भी अपनी डगर का वो सहारा 
आज भी हैं देखते हम तुम उसे पर 
है हमारे बीच गहरी अश्रु-धारा 
नाव चिर जर्जर नहीं पतवार कर में 
किस तरह फिर हो तुम्हारे पास आना। 

भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना! 

सोच लेना पंथ भूला एक राही 
लख तुम्हारे हाथ में लख की सुराही 
एक मधु की बूँद पाने के लिए बस 
रुक गया था भूल जीवन की दिशा ही 
आज फिर पथ ने पुकारा जा रहा वह 
कौन जाने अब कहाँ पर हो ठिकाना। 

भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना! 

चाहता है कौन अपना स्वप्न टूटे? 
चाहता है कौन पथ का साथ छूटे? 
रूप की अठखेलियाँ किसको न भातीं? 
चाहता है कौन मन का मीत रूठे? 
छूटता है साथ सपने टूटते पर 
क्योंकि दुश्मन प्रेमियों का है ज़माना। 

भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना! 

यदि कभी हम फिर मिले जीवन-डगर पर 
मैं लिए आँसू, लिए तुम हास मनहर 
बोलना चाहो नहीं तो बोलना मत 
देख लेना किंतु मेरी ओर क्षण भर 
क्योंकि मेरी राह की मंज़िल तुम्हीं हो 
और जीने का तुम्हीं तो हो बहाना। 

भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना! 

साँझ जब दीपक जलाएगी गगन में 
रात जब सपने सजाएगी नयन में 
पी कहाँ जब-जब पुकारेगा पपीहा 
मुस्कुराएगी कली जब-जब चमन में 
मैं तुम्हारी याद कर रोता रहूँगा 
किंतु मेरी याद कर तुम मुस्कुराना। 

भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना! 

भूल जाना किस तरह संग-संग तुम्हारे 
छाँह बन कर मैं रहा संध्या-सकारे 
सोचना मत किस तरह मैं जी रहा हूँ 
चल रहा हूँ किस तरह सुधि के सहारे 
किंतु इतनी भीख तुमसे माँगता हूँ 
यदि सुनो यह गीत इसको गुनगुनाना। 

भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना! 
गोपालदास नीरज

Thursday, June 29, 2023

फिर मिरे सर पे कड़ी धूप की बौछार गिरी

फिर मिरे सर पे कड़ी धूप की बौछार गिरी

मैं जहाँ जा के छुपा था वहीं दीवार गिरी 

लोग क़िस्तों में मुझे क़त्ल करेंगे शायद 
सब से पहले मिरी आवाज़ पे तलवार गिरी 

और कुछ देर मिरी आस न टूटी होती 
आख़िरी मौज थी जब हाथ से पतवार गिरी 

अगले वक़्तों में सुनेंगे दर-ओ-दीवार मुझे 
मेरी हर चीख़ मिरे अहद के उस पार गिरी 

ख़ुद को अब गर्द के तूफ़ाँ से बचाओ 
तुम बहुत ख़ुश थे कि हम-साए की दीवार गिरी 
Qaisar Ul Jafri

तेरे आने का धोखा सा रहा है

​तेरे आने का धोखा सा रहा है,

दिया सा रात भर जलता रहा है  

अजब है रात से आँखों का आलम  
ये दरिया रात भर चढ़ता रहा है  

सुना है रात भर बरसा है बादल  
मगर वो शहर जो प्यासा रहा है  

वो कोई दोस्त था अच्छे दिनों का  
जो पिछली रात से याद आ रहा है  

किसे ढूँढोगे इन गलियों में 
चलो अब घर चलें दिन जा रहा है  

कितना रखना है अब फासला सोच लो

कोई रंजिश कोई सानेहा सोच लो

अबके लिखना है क्या वाकया सोच लो 

हम भी खामोश हैं तुम भी खामोश हो 
कैसे सुलझेगा ये मस'अला सोच लो 

तुम तो आँखों से दिल में उतर ही गये 
कितना रखना है अब फासला सोच लो 

ज़िंदगी चंद लम्हों की मेहमान है 
अब दवा बे असर है दुआ सोच लो 

इश़्क की रहगुज़र भी कठिन है
प्यार करने से पहले ज़रा सोच लो