Saturday, April 8, 2023

मन मस्त हुआ

​आदि से अनूप हूँ मैं, तेरा ही स्वरूप हूँ मैं

मेरी भी कथाएँ हैं अनन्त मेरे राम जी 
लागी वो लगन तुझसे कि मन मस्त हुआ 
दृग में समा गया दिगन्त मेरे राम जी 
सपनों में आ के कल बोले मेरी बुढ़िया से 
बाल-ब्रह्मचारी हनुमन्त मेरे राम जी 
लेता है धरा पे अवतार जाके सदियों में 
‘अल्हड़’ सरीखा कोई सन्त मेरे राम जी 

अल्हड़ बीकानेरी

अधूरे हैं हम तुम बिन

​धरती बिन आकाश के

बाती बिना प्रकाश के 
बदली नीर बिना जैसे 
फाग अबीर बिना वैसे 
आधे सब एक दूजे बिन 
वैसे ही अधूरे हैं हम तुम बिन 

अधरों पर बुझी हँसी क्यों है 
आँखें इतनी तरसी क्यों हैं 
सावन बैरी मोरा बन बैठा 
घर आँगन भी रूठा ऐंठा 
प्यासा ज्यों पपीहा स्वाति बिन 
वैसे ही अधूरे हैं हम तुम बिन 

बन प्रेम दीवानी बाट निहारूँ 
पलकन से नित द्वार बुहारूँ 
कौन घड़ी लौटें चितवन सुख 
कौन घड़ी हर लें विरहा दुख 
ज्यों सावन आधा बरखा बिन 
वैसे ही अधूरे हैं हम तुम बिन 

मिलन संदेसा कोयल लावे 
बेला शुभ घर आँगन आवे 
सोलह सब श्रृंगार करूँ मैं 
धरा गगन रंग प्रीत रचूं मैं 
भोर अधूरी ज्यों सविता बिन 
वैसे ही अधूरे हैं हम तुम बिन 

प्रीत अल्पना द्वार सजाऊँ 
पिय पिय धुन दिन रैन मैं गाऊँ 
कण कण अनुरागी हो जाये 
क्षण क्षण हिमपागी हो जाये 
रहे अधूरा न कोई तन मन 
पूर्ण सकल ये जग हो जाये 

जीता है सिर्फ़ तेरे लिए कौन मर के देख

​जीता है सिर्फ़ तेरे लिए कौन मर के देख 

इक रोज़ मेरी जान ये हरकत भी कर के देख 

मंज़िल यहीं है आम के पेड़ों की छाँव में 
ऐ शहसवार घोड़े से नीचे उतर के देख 

टूटे पड़े हैं कितने उजालों के उस्तुख़्वाँ 
साया-नुमा अँधेरे के अंदर उतर के देख 

फूलों की तंग-दामनी का तज़्किरा न कर 
ख़ुशबू की तरह मौज-ए-सबा में बिखर के देख 

तुझ पर खुलेंगे मौत की सरहद के रास्ते 
हिम्मत अगर है उस की गली से गुज़र के देख 

दरिया की वुसअतों से उसे नापते नहीं 
तन्हाई कितनी गहरी है इक जाम भर के देख 

Friday, April 7, 2023

मुस्कुराने का हुनर

​मुफ्त में नहीं सीखा उदासी में भी मुस्कुराने का हुनर,

बदले में जिन्दगी की हर खुशी तबाह की है ।।

Wednesday, April 5, 2023

दिल में किसी के राह किए जा रहा हूँ मैं

​दिल में किसी के राह किए जा रहा हूँ मैं 

कितना हसीं गुनाह किए जा रहा हूँ मैं 

दुनिया-ए-दिल तबाह किए जा रहा हूँ मैं 
सर्फ़-ए-निगाह-ओ-आह किए जा रहा हूँ मैं 

फ़र्द-ए-अमल सियाह किए जा रहा हूँ मैं 
रहमत को बे-पनाह किए जा रहा हूँ मैं 

ऐसी भी इक निगाह किए जा रहा हूँ मैं 
ज़र्रों को मेहर-ओ-माह किए जा रहा हूँ मैं 

मुझ से लगे हैं इश्क़ की अज़्मत को चार चाँद 
ख़ुद हुस्न को गवाह किए जा रहा हूँ मैं 

दफ़्तर है एक मानी-ए-बे-लफ़्ज़-ओ-सौत का 
सादा सी जो निगाह किए जा रहा हूँ मैं 

आगे क़दम बढ़ाएँ जिन्हें सूझता नहीं 
रौशन चराग़-ए-राह किए जा रहा हूँ मैं 

मासूमी-ए-जमाल को भी जिन पे रश्क है 
ऐसे भी कुछ गुनाह किए जा रहा हूँ मैं 

तन्क़ीद-ए-हुस्न मस्लहत-ए-ख़ास-ए-इश्क़ है 
ये जुर्म गाह गाह किए जा रहा हूँ मैं 

उठती नहीं है आँख मगर उस के रू-ब-रू 
नादीदा इक निगाह किए जा रहा हूँ मैं 

गुलशन-परस्त हूँ मुझे गुल ही नहीं अज़ीज़ 
काँटों से भी निबाह किए जा रहा हूँ मैं 

यूँ ज़िंदगी गुज़ार रहा हूँ तिरे बग़ैर 
जैसे कोई गुनाह किए जा रहा हूँ मैं 

मुझ से अदा हुआ है 'जिगर' जुस्तुजू का हक़ 
हर ज़र्रे को गवाह किए जा रहा हूँ मैं 

Jigar Muradabadi


Friday, March 31, 2023

हम रुह में उतरने को मोहब्बत कहते हैं


वो जिस्म के छूने को मोहब्बत कहते हैं
और हम रुह में उतरने को मोहब्बत कहते हैं 

वो दिलबर को बाहों में भरने को राहत कहते हैं 
और हम तो उनके दिदार को ही राहत कहते हैं 

बेचैनियां तो जिस्म के मिलते ही खत्म हो जाएगी 
तसव्वुर में भी जो सुकून दे हम उसको चाहत कहते हैं 

अब तो इबादत के लिए खुदा भी नहीं चाहिए 
उनकी यादों में खोए रहने को हम इबादत कहते है। 

चलते हुए राह में वो गर ग़लती से भी देख लें तो 
हम अपनी जिंदगी में उसको ही इनायत कहते हैं।

Thursday, March 30, 2023

वो जो हमेशा मेरे ख्यालों में रहता है

​वो जो हमेशा मेरे ख्यालों में रहता है,


आज कल वो बिखरा बिखरा रहता है 

उसके दोस्तों को देखता हूं हंसते हुए, 
वो उनके साथ भी रहकर चुप रहता है, 

मैं उसे हंसाने के लिए खुद हंसता हूं, 
फिर भी उसका चेहरा उतरा रहता है, 

बात क्या है पूछने पर बताता भी नहीं, 
लगता है किसी बात से बिगड़ा रहता है, 

मन करता है मनाऊं उसे किसी तरह, 
क्या करूं पास होकर भी दूर रहता है, 

क्या हो गई ' मुझसे ' से दुश्मनी उसकी, 
वो भी महीनों से उजड़ा उजड़ा रहता है

अब तुम्हारा प्यार भी - गोपालदास 'नीरज'

​अब तुम्हारा प्यार भी मुझको नहीं स्वीकार प्रेयसि !

चाहता था जब हृदय बनना तुम्हारा ही पुजारी,
छीनकर सर्वस्व मेरा तब कहा तुमने भिखारी,
आँसुओं से रात दिन मैंने चरण धोये तुम्हारे,
पर न भीगी एक क्षण भी चिर निठुर चितवन तुम्हारी,
जब तरस कर आज पूजा-भावना ही मर चुकी है,
तुम चलीं मुझको दिखाने भावमय संसार प्रेयसि !
अब तुम्हारा प्यार भी मुझको नहीं स्वीकार प्रेयसि !

भावना ही जब नहीं तो व्यर्थ पूजन और अर्चन,
व्यर्थ है फिर देवता भी, व्यर्थ फिर मन का समर्पण,
सत्य तो यह है कि जग में पूज्य केवल भावना ही,
देवता तो भावना की तृप्ति का बस एक साधन,
तृप्ति का वरदान दोनों के परे जो-वह समय है,
जब समय ही वह न तो फिर व्यर्थ सब आधार प्रेयसि !
अब तुम्हारा प्यार भी मुझको नहीं स्वीकार प्रेयसि !
 

अब मचलते हैं न नयनों में कभी रंगीन सपने,
हैं गये भर से थे जो हृदय में घाव तुमने,
कल्पना में अब परी बनकर उतर पाती नहीं तुम,
पास जो थे हैं स्वयं तुमने मिटाये चिह्न अपने,
दग्ध मन में जब तुम्हारी याद ही बाक़ी न कोई,
फिर कहाँ से मैं करूँ आरम्भ यह व्यापार प्रेयसि !
अब तुम्हारा प्यार भी मुझको नहीं स्वीकार प्रेयसि !
 

अश्रु-सी है आज तिरती याद उस दिन की नजर में,
थी पड़ी जब नाव अपनी काल तूफ़ानी भँवर में,
कूल पर तब हो खड़ीं तुम व्यंग मुझ पर कर रही थीं,
पा सका था पार मैं खुद डूबकर सागर-लहर में,
हर लहर ही आज जब लगने लगी है पार मुझको,
तुम चलीं देने मुझे तब एक जड़ पतवार प्रेयसि !
अब तुम्हारा प्यार भी मुझको नहीं स्वीकार प्रेयसि !

गुलज़ार की नज़्म

​(1)

जब भी यह दिल उदास होता है
जाने कौन आस-पास होता है

होंठ चुपचाप बोलते हों जब
सांस कुछ तेज़-तेज़ चलती हो
आंखें जब दे रही हों आवाज़ें
ठंडी आहों में सांस जलती हो

आँख में तैरती हैं तसवीरें
तेरा चेहरा तेरा ख़याल लिए
आईना देखता है जब मुझको
एक मासूम सा सवाल लिए

कोई वादा नहीं किया लेकिन
क्यों तेरा इंतजार रहता है
बेवजह जब क़रार मिल जाए
दिल बड़ा बेकरार रहता है

जब भी यह दिल उदास होता है
जाने कौन आस-पास होता है
 

(2)
हाल-चाल ठीक-ठाक है
सब कुछ ठीक-ठाक है
बी.ए. किया है, एम.ए. किया
लगता है वह भी ऐंवे किया
काम नहीं है वरना यहाँ
आपकी दुआ से सब ठीक-ठाक है

आबो-हवा देश की बहुत साफ़ है
क़ायदा है, क़ानून है, इंसाफ़ है
अल्लाह-मियाँ जाने कोई जिए या मरे
आदमी को खून-वून सब माफ़ है

और क्या कहूं?
छोटी-मोटी चोरी, रिश्वतखोरी
देती है अपा गुजारा यहाँ
आपकी दुआ से बाक़ी ठीक-ठाक है
 

गोल-मोल रोटी का पहिया चला
पीछे-पीछे चाँदी का रुपैया चला
रोटी को बेचारी को चील ले गई
चाँदी ले के मुँह काला कौवा चला

और क्या कहूं?
मौत का तमाशा, चला है बेतहाशा
जीने की फुरसत नहीं है यहाँ
आपकी दुआ से बाक़ी ठीक-ठाक है
हाल-चाल ठीक-ठाक है
 

(3)
अ-आ, इ-ई, अ-आ, इ-ई
मास्टर जी की आ गई चिट्ठी
चिट्ठी में से निकली बिल्ली
बिल्ली खाए जर्दा-पान
काला चश्मा पीले कान
कान में झुमका, नाक में बत्ती
हाथ में जलती अगरबत्ती
अगर हो बत्ती कछुआ छाप
आग में बैठा पानी ताप
ताप चढ़े तो कम्बल तान
वी.आई.पी. अंडरवियर-बनियान
 

अ-आ, इ-ई, अ-आ, इ-ई
मास्टर जी की आ गई चिट्ठी
चिट्ठी में से निकला मच्छर
मच्छर की दो लंबी मूँछें
मूँछ पे बाँधे दो-दो पत्थर
पत्थर पे इक आम का झाड़
पूंछ पे लेके चले पहाड़
पहाड़ पे बैठा बूढ़ा जोगी
जोगी की इक जोगन होगी
-गठरी में लागा चोर
मुसाफिर देख चाँद की ओर
 

पहाड़ पै बैठा बूढ़ा जोगी
जोगी की एक जोगन होगी
जोगन कूटे कच्चा धान
वी.आई.पी. अंडरवियर बनियान

अ-आ, इ-ई, अ-आ, इ-ई
मास्टर जी की आ गई चिट्ठी
चिट्ठी में से निकला चीता
थोड़ा काला थोड़ा पीला
चीता निकला है शर्मीला
घूँघट डालके चलता है
मांग में सेंदुर भरता है
माथे रोज लगाए बिंदी
इंगलिश बोले मतलब हिंदी
‘इफ’ अगर ‘इज’ है, ‘बट’ पर
‘व्हॉट’ माने क्या
इंगलिश में अलजेब्रा छान
वी.आई.पी. अंडरवियर-बनियान

कुछ इस तरह मिल जाना..

​बस आखिरी बार

कुछ इस तरह मिल जाना.. 
नजरों को झलक दिखाकर 
तन्हाइयों का गहरा ज़ख्म सील जाना... 
मुझको खुद में रख लेना या तुम 
मुझमे रह जाना... 
बात कुछ चुभे भी तो सह जाना.. 
हंस कर कालियो सा खिल जाना.. 
बस आखिरी बार कुछ 
इस तरह मिल जाना............ 

सजोए हैं कितनी मुद्दत से 
आशा के आसूं... 
पलक से गिरकर मोती सा बन जाना... 
दूर जाकर भी एहसासों मंजर 
रख जाना.... 
मुस्कुराकर ये दिल समंदर सा 
भर जाना... 
बस आखिरी बार 
कुछ इस तरह मिल जाना..