Friday, May 12, 2023

दिल में ऐसे ठहर गए हैं ग़म,

​

दिल में ऐसे ठहर गए हैं ग़म, 

जैसे जंगल में शाम के साए


जाते जाते सहम के रुक जाएँ 
मर के देखें उदास राहों पर 
कैसे बुझते हुए उजालों में 
दूर तक धूल ही धूल उड़ती है! 

Gulzar

तुझ से कुछ मिलते ही वो बेबाक हो जाना मिरा

​तुझ से कुछ मिलते ही वो बेबाक हो जाना मिरा

और तिरा दाँतों में वो उँगली दबाना याद है 


भुलाता लाख हूँ लेकिन बराबर याद आते हैं
इलाही तर्क-ए-उल्फ़त पर वो क्यूँकर याद आते हैं  

देखो तो चश्म-ए-यार की जादू-निगाहियाँ
बेहोश इक नज़र में हुई अंजुमन तमाम 

अजब क्या जो है बद-गुमाँ सब से वाइज़
बुरा सुनते सुनते बुरा कहते कहते 

याद हर हाल में रहे वो मुझे
अल-ग़रज़ बात रह गई दिल की 


निगाह-ए-यार जिसे आश्ना-ए-राज़ करे
वो अपनी ख़ूबी-ए-क़िस्मत पे क्यूँ न नाज़ करे 

शाम हो या कि सहर याद उन्हीं की रखनी
दिन हो या रात हमें ज़िक्र उन्हीं का करना 


बरसात के आते ही तौबा न रही बाक़ी
बादल जो नज़र आए बदली मेरी नीयत भी 

तुम ने बाल अपने जो फूलों में बसा रक्खे हैं
शौक़ को और भी दीवाना बना रक्खा है 


कोशिशें हम ने कीं हज़ार मगर
इश्क़ में एक मो'तबर न हुई 

ये भी आदाब-ए-मोहब्बत ने गवारा न किया
उन की तस्वीर भी आँखों से लगाई न गई 


'हसरत' बहुत है मर्तबा-ए-आशिक़ी बुलंद
तुझ को तो मुफ़्त लोगों ने मशहूर कर दिया 


हसरत मोहानी 

मैं और तुम

​नदी ,किनारा

सांझ की नम 
जैसे कि 
प्रेम ,मैं और तुम 
चाय की प्याली 
बारिश का मौसम 
जैसे कि 
प्रेम ,मैं और तुम 
चांदनी रात 
चांद ,सितारों में गुम 
जैसे कि 
प्रेम ,मैं और तुम 
हकीकत,ख्वाब 
बिन शब्दों की धुन 
जैसे कि 
प्रेम ,मैं और तुम 
दो आत्माऔं का 
एक सार मिलन से हम 
जैसे कि 
प्रेम ,मैं और तुम 
आंखें बोलती सी 
शांत से स्वर 
होंठ पहली मुलाकात की भांति चुप 
जैसे कि 
प्रेम ,मैं और तुम 
एक दूसरे मे गुम 
जैसे कि 
प्रेम ,मैं और तुम , 
एक दूजे के होते से 
मैं और तुम 
मैं और तुम 
मैं और तुम  

मेरी तरह उसे भी किताबों का शौक़ है

​तितली से दोस्ती न गुलाबों का शौक़ है

मेरी तरह उसे भी किताबों का शौक़ है 

वर्ना तो नींद से भी नहीं कोई ख़ास रब्त 
आँखों को सिर्फ़ आप के ख़्वाबों का शौक़ है 

हम आशिक़-ए-ग़ज़ल हैं तो मग़रूर क्यों न हों 
आख़िर ये शौक़ भी तो नवाबों का शौक़ है 
उस शख़्स के फ़रेब से वाक़िफ़ हैं हम मगर 
कुछ अपनी प्यास को ही सराबों का शौक़ है 

गिरने दो ख़ुद सँभलने दो ऐसे ही चलने दो 
ये तो 'चराग़' ख़ाना-ख़राबों का शौक़ है

Charag Sharma 

जुनूँ से गुज़रने को जी चाहता है

​जुनूँ से गुज़रने को जी चाहता है 

हँसी ज़ब्त करने को जी चाहता है 

जहाँ इश्क़ में डूब कर रह गए हैं 
वहीं फिर उभरने को जी चाहता है 

वो हम से ख़फ़ा हैं हम उन से ख़फ़ा हैं 
मगर बात करने को जी चाहता है 

है मुद्दत से बे-रंग नक़्श-ए-मोहब्बत 
कोई रंग भरने को जी चाहता है 

ब-ईं ख़ुद-सरी वो ग़ुरूर-ए-मोहब्बत 
उन्हें सज्दा करने को जी चाहता है 

क़ज़ा मुज़्दा-ए-ज़िंदगी ले के आए 
कुछ इस तरह मरने को जी चाहता है 

निज़ाम-ए-दो-आलम की हो ख़ैर या-रब 
फिर इक आह करने को जी चाहता है 

गुनाह-ए-मुकर्रर 'शकील' अल्लाह अल्लाह 
बिगड़ कर सँवरने को जी चाहता है 


Shakeel Badayuni

वो मिला है मुझको इस तरह

​मेरी आंखों का कोई ख़्वाब सा 

मेरी ख़वाहिशों का कोई जवाब सा  
वो मिला है मुझको इस तरह  
मेरी नेकियों का कोई सवाब सा  

Thursday, May 11, 2023

मुझ को संभाल हद से गुज़रने लगा हूँ मैं

​ऐ दर्द-ए-इश्क़ तुझ से मुकरने लगा हूँ मैं 

मुझ को संभाल हद से गुज़रने लगा हूँ मैं 

पहले हक़ीक़तों ही से मतलब था और अब 
एक आध बात फ़र्ज़ भी करने लगा हूँ मैं 

हर आन टूटते ये अक़ीदों के सिलसिले 
लगता है जैसे आज बिखरने लगा हूँ मैं 

ऐ चश्म-ए-यार मेरा सुधरना मुहाल था 
तेरा कमाल है कि सुधरने लगा हूँ मैं 

ये मेहर-ओ-माह अर्ज़-ओ-समा मुझ में खो गए 
इक काएनात बन के उभरने लगा हूँ मैं 

इतनों का प्यार मुझ से सँभाला न जाएगा 
लोगो तुम्हारे प्यार से डरने लगा हूँ मैं 

दिल्ली कहाँ गईं तिरे कूचों की रौनक़ें 
गलियों से सर झुका के गुज़रने लगा हूँ मैं

जाँ निसार अख़्तर 

ख़्वाब होते हैं देखने के लिए

​इतने ख़ामोश भी रहा न करो 

ग़म जुदाई में यूँ किया न करो 

ख़्वाब होते हैं देखने के लिए 
उन में जा कर मगर रहा न करो 

कुछ न होगा गिला भी करने से 
ज़ालिमों से गिला किया न करो 

उन से निकलें हिकायतें शायद 
हर्फ़ लिख कर मिटा दिया न करो 

अपने रुत्बे का कुछ लिहाज़ 'मुनीर' 
यार सब को बना लिया न करो 

Muneer Niyazi

Monday, May 8, 2023

हजारों ख्यालों की महफ़िल में इक चराग़ ए दुरुस्त ख्याल तेरा है

​हजारों ख्यालों की महफ़िल में

एक चराग़ ए दुरुस्त ख्याल तेरा है


खाली है दिल, फकत जज्बात से

फिर क्यूँ हरसू फितूर तेरा है


कहीं तबस्सुम कहीं खुशबु कहीं तसव्वुर

कितनी अदाओं का हिजाब तेरा है


बैठे हैं खाली जाम लिए दिवाने कई 

इस महफ़िल में जाम ए इकराम तेरा है.

Monday, May 1, 2023

भूल गये थे सारा जहान उनके ख़ातिर..

​वो किसी गैर/और की ख़ातिर हमें भूल गये तो कोई बात नही,

 हम भी तो भूल गये थे सारा जहान उनके ख़ातिर..!!