Wednesday, April 7, 2021

पीना उसी का है जो पिए बेखुदी के साथ!

गिन गिन के जिसने जाम पिए उसने क्या पिए, 
पीना उसी का है जो पिए बेखुदी के साथ! 

Friday, April 2, 2021

बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर

 बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर

जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियां उड़ जाएं
- राहत इंदौरी


ये ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता
में जब तक घर न लौटूं मेरी मां सज्दे में रहती है
- मुनव्वर राना 

मैं वो पल था जो खा गया सदियां
सब ज़माने गुज़र गए मुझ में
- अम्मार इक़बाल


हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं
उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में
- बशीर बद्र


कैसे कह दूं कि मुझे छोड़ दिया है उस ने
बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की
- परवीन शाकिर 


तेरी बातें ही सुनाने आए
दोस्त भी दिल ही दुखाने आए
- अहमद 


उसी को जीने का हक़ है जो इस ज़माने में


इधर का लगता रहे और उधर का हो जाए 
- वसीम बरेलवी 
 

कितनी दिलकश हो तुम कितना दिल-जू हूं मैं


क्या सितम है कि हम लोग मर जाएंगे 
- जौन एलिया 












Wednesday, March 31, 2021

ख़ुद चराग़ बन के जल वक़्त के अंधेरे में

ख़ुद चराग़ बन के जल वक़्त के अंधेरे में
भीक के उजालों से रौशनी नहीं होती

~ हस्तीमल हस्ती


शायरी है सरमाया ख़ुश-नसीब लोगों का 
बाँस की हर इक टहनी बाँसुरी नहीं होती 

खेल ज़िंदगी के तुम खेलते रहो यारो 
हार जीत कोई भी आख़िरी नहीं होती 

हस्तीमल हस्ती

दिल में जो मोहब्बत की रौशनी नहीं होती 
इतनी ख़ूबसूरत ये ज़िंदगी नहीं होती 

दोस्त पे करम करना और हिसाब भी रखना 
कारोबार होता है दोस्ती नहीं होती 

ख़ुद चराग़ बन के जल वक़्त के अंधेरे में 
भीक के उजालों से रौशनी नहीं होती 

हस्तीमल हस्ती

छोड़ो अब उस चराग़ का चर्चा बहुत हुआ
अपना तो सब के हाथों ख़सारा बहुत हुआ

क्या बे-सबब किसी से कहीं ऊबते हैं लोग
बावर करो कि ज़िक्र तुम्हारा बहुत हुआ

मिलने दिया न उस से हमें जिस ख़याल ने
सोचा तो इस ख़याल से सदमा बहुत हुआ

#अहमद_महफ़ूज़

ये कौन मेरी तिश्नगी बढ़ा बढ़ा के चल दिया
कि लौ चिराग़-ए-दर्द की बढ़ा बढ़ा के चल दिया

न दीद की उमीद अब न लुत्फ़-ए-नग़्मा-ए-विसाल
कि लय वो साज़-ए-हिज्र की बढ़ा बढ़ा के चल दिया

वो आया 'अकबर' इस अदा से आज मेरे सामने
कि इक झलक सी ख़्वाब की दिखा दिखा के चल दिया

अकबर हैदराबादी

मुझे सहल हो गईं मंज़िलें वो हवा के रुख भी बदल गए
तेरा हाथ हाथ में आ गया कि चिराग राह में जल गए !!
अज्ञात

शीशे के मुक़द्दर में बदल क्यूँ नहीं होता
इन पत्थरों की आँख में जल क्यूँ नहीं होता

क़ुदरत के उसूलों में बदल क्यूँ नहीं होता
जो आज हुआ है वही कल क्यूँ नहीं होता

हर गाँव में मुम्ताज़ जनम क्यूँ नहीं लेती
हर मोड़ पे इक ताज-महल क्यूँ नहीं होता

हस्तीमल हस्ती



Monday, March 29, 2021

रंग / होली शायरी

रंग चेहरे का ज़ाफ़रानी है
आशिक़ी की यही निशानी है
- अज्ञात

हवा में नश्शा ही नश्शा फ़ज़ा में रंग ही रंग
ये किस ने पैरहन अपना उछाल रक्खा है
- अहमद फ़राज़ 

वो रंग रंग के छींटे पड़े कि उस के बाद
कभी न फिर नए कपड़े पहन के निकला मैं
- अनवर शऊर

रंग बातें करें और बातों से ख़ुश्बू आए
दर्द फूलों की तरह महके अगर तू आए
- ज़िया जालंधरी

अंग अंग से रंग रंग के फूल बरसते देखे कौन
रंग रंग से शोले बरसे कैसे बरसे सोचे कौन
- अहमद ज़फ़र


मुख़्तलिफ़ हैं मिरी बहार के रंग
कुछ मिरे अपने कुछ उधार के रंग
- नीना सहर

कौन सा रंग इख़्तियार करें?
ख़ुद को चाहें कि तुझ से प्यार करें?
- शबनम रूमानी

रंग ख़ुशियों के कल बदलते ही
ग़म ने थामा मुझे फिसलते ही
- अनीता मौर्या अनुश्री

समझ लेना कि होली है

महा कवि नीरज की कविता..

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करें जब पाँव खुद नर्तन, समझ लेना कि होली है
 हिलोरें ले रहा हो मन, समझ लेना कि होली है

 किसी को याद करते ही अगर बजते सुनाई दें 
 कहीं घुँघरू कहीं कंगन, समझ लेना कि होली है 

 कभी खोलो अचानक , आप अपने घर का दरवाजा 
 खड़े देहरी पे हों साजन, समझ लेना कि होली है 

 तरसती जिसके हों दीदार तक को आपकी आंखें 
 उसे छूने का आये क्षण, समझ लेना कि होली है 

 हमारी ज़िन्दगी यूँ तो है इक काँटों भरा जंगल 
 अगर लगने लगे मधुबन, समझ लेना कि होली है 

 बुलाये जब तुझे वो गीत गा कर ताल पर ढफ की 
 जिसे माना किये दुश्मन, समझ लेना कि होली है 

 अगर महसूस हो तुमको, कभी जब सांस लो 'नीरज' 
 हवाओं में घुला चन्दन, समझ लेना कि होली है

बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूं करें हम

नया इक रिश्ता पैदा क्यूं करें हम
बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूं करें हम

ख़मोशी से अदा हो रस्म-ए-दूरी
कोई हंगामा बरपा क्यूं करें हम

ये काफ़ी है कि हम दुश्मन नहीं हैं
वफ़ा-दारी का दावा क्यूं करें हम

वफ़ा इख़्लास क़ुर्बानी मोहब्बत
अब इन लफ़्ज़ों का पीछा क्यूं करें हम

हमारी ही तमन्ना क्यूं करो तुम
तुम्हारी ही तमन्ना क्यूं करें हम

किया था अहद जब लम्हों में हम ने
तो सारी उम्र ईफ़ा क्यूं करें हम

नहीं दुनिया को जब पर्वा हमारी
तो फिर दुनिया की पर्वा क्यूं करें हम

Thursday, March 25, 2021

हो भी आराम तो कह दूँ मुझे आराम नहीं

हाथ रख कर जो वो पूछे दिल-ए-बेताब का हाल
हो भी आराम तो कह दूँ मुझे आराम नहीं
~ दाग़ देहलवी

वो आके पहलू में ऐसे बैठे के 
शाम रंगीन हो गई है ;  
ज़रा ज़रा सी खिली तबीयत ज़रा सी 
ग़मगीन हो गई है ....!!💥
#गुलज़ार

आए थे दिल की प्यास बुझाने के वास्ते 
इक आग सी वो और लगा कर चले गए 
जिगर मुरादाबादी

आप पहलू में जो बैठें तो सँभल कर बैठें 
दिल-ए-बेताब को आदत है मचल जाने की

दिले-बेताब को आराम तो है पर चैन कहाँ ,
वो आए भी अगर है तो जाने के लिए -'
दामन' भोपाली

अगर अपने दिल-ए-बेताब को समझा लिया मैं ने
तो ये काफ़िर निगाहें कर सकेंगी इंतिज़ाम अपना
जहान-ए-इश्क़ में ऐसे मक़ामों से भी गुज़रा हूँ
कि बाज़-औक़ात ख़ुद करना पड़ा है एहतिराम अपना
#महशर_इनायती

हमें है शौक़ कि बे-पर्दा तुम को देखेंगे,
तुम्हें है शर्म तो आँखों पे हाथ धर लेना..!
~दाग़_देहलवी

लेने नहीं देता किसी करवट मुझे आराम
इक शख़्स हटीला मिरे अंदर कोई मुझ सा
ख़ुर्शीद रिज़वी


आइना देख के कहते हैं सँवरने वाले 
आज बे-मौत मरेंगे मिरे मरने वाले.
- दाग़ देहलवी.

उनकी फरमाइश नई दिन रात है,
और थोड़ी सी मेरी औकात है..।।
~ दाग़ दहेलवी

मैं तो हूँ चाकरी पर इश्क़ की
वो पूछे है तुझे कुछ काम नहीं?
हर आहट पर गए दहलीज़ तक
उसका मगर कोई पयाम नहीं
किश्तों में गुज़ा किया है ख़ुद को
इश्क़ महंगा बहुत है, बे-दाम नहीं


रात भी नींद भी कहानी भी 
हाए क्या चीज़ है जवानी भी 
~ फ़िराक़ गोरखपुरी 🌻🌻



Tuesday, March 16, 2021

आप पहलू में जो बैठें तो सँभल कर बैठें

आप पहलू में जो बैठें तो सँभल कर बैठें 
दिल-ए-बेताब को आदत है मचल जाने की 
~ जलील मानिकपूरी

Monday, March 15, 2021

काहे को ब्याहे बिदेस

काहे को ब्याहे बिदेस, अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस

भैया को दियो बाबुल महले दो-महले
हमको दियो परदेस
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस

हम तो बाबुल तोरे खूंटे की गैया
जित हांके हंक जैहें
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस

हम तो बाबुल तोरे बेले की कलिया
घर-घर मांगे हैं जैहें
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस

कोठे तले से पलकिया जो निकली
बीरन में छाए पछाड़
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस

हम तो हैं बाबुल तोरे पिंजरे की चिड़ियां
भोर भये उड़ जैहें
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस

तारों भरी मैनें गुड़िया जो छोड़ी
छूटा सहेली का साथ
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस

डोली का पर्दा उठा के जो देखा
आया पिया का देस
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस

अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस
अरे, लखिय बाबुल मोरे

अमीर खुसरो 

राही मासूम रज़ा शायरी

रात ने ऐसा पेँच लगाया टूटी हाथ से डोर
आंगन वाले नीम में जा कर अटका होगा चांद

हाए इस परछाइयों के शहर में
दिल सी इक ज़िंदा हक़ीक़त खो गई

ऐ सबा तू तो उधर ही से गुज़रती होगी
उस गली में मिरे पैरों के निशां कैसे हैं

हां उन्हीं लोगों से दुनिया में शिकायत है हमें
वही लोग जो अक्सर हमें याद आए हैं

यादों से बचना मुश्किल है उन को कैसे समझाएं
हिज्र के इस सहरा तक हम को आते हैं समझाने लोग

ऐ आवारा यादो फिर ये फ़ुर्सत के लम्हात कहां
हम ने तो सहरा में बसर की तुम ने गुज़ारी रात कहां

कहानियों की गुज़रगाह पर भी नींद नहीं
ये रात कैसी है ये दर्द जागता क्यूं है

रास्ते अपनी नज़र बदला किए
हम तुम्हारा रास्ता देखा किए

हर तरफ़ सुब्ह ने इक जाल बिछा रक्खा है
ओस की बूंद कहां जाती है दरिया की तरफ़

दिल की खेती सूख रही है कैसी ये बरसात हुई
ख़्वाबों के बादल आते हैं लेकिन आग बरसती है