मलाल नहीं दर्द की इन्तेहाँ से ,
दर्द भी अपना है और दर्द देने वाला भी ...
आशु तो कुछ भी नहीं आसूँ के सिवा, जाने क्यों लोग इसे पलकों पे बैठा लेते हैं।
मलाल नहीं दर्द की इन्तेहाँ से ,
दर्द भी अपना है और दर्द देने वाला भी ...
हम ने पाला मुद्दतों पहलू में, हम कुछ भी नहीं
तुम ने देखा एक नज़र और दिल तम्हारा हो गया
आसी राम नगरी
गहरे समंदरों की भला क्या खबर उन्हें..
आंखों की झील में जो उतरे नहीं कभी ।।
पन्नों की तरह दिन बदलते जा रहे हैं,
खबर नहीं है कि आ रहे हैं या जा रहे हैं ।
बहुत कुछ सिखाया जिंदगी ने अनजाने में,
किताबों में नहीं था वो सबक सिखाया ज़माने ने।
ज़रा से फासले रहने दो तुम।
बात दिल की कहने दो तुम।
माना दो किनारों की तरह है
कुछ पल साथ में बहने दो तुम।
इश्क़ किया है तो दर्द तो होगा
थोड़ा इसको ज़रा सहने दो तुम।
आंसू,आंहे और टूटे हुए ख्वाब
मोहब्बत के मुझे गहने दो तुम।
सजना संवरना तेरा ,बिजली गिरा गया।
रूप तेरा सलौना ,मेरे दिल को भा गया।
ढूंढे से भी नहीं मिलता ,चैन मेरे दिल को
ढूंढूं ग़र दिल ,तो भी जाने कहां गया।
बार बार पलकों को तेरा गिरा कर उठाना,
दीवाने को ये और दीवाना बना गया ।
जुल्फों का लहराना जैसै काली घटा छाये
दिल मेरा ,तेरा होकर कर मुझसे दगा गया
जाते हुये मुड़ मुड़ कर वो देखना तेरा
बोलूं तो दो बोतल का कर वो नशा गया।
“सीमा नहीं बना करतीं हैं काग़ज़ खींची लकीरों से,
ये घटती-बढ़ती रहती हैं वीरों की शमशीरों से.
(कवि बलवीर सिंह करुण)
सीमा नहीं बना करतीं हैं काग़ज़ खींची लकीरों से,
ये घटती-बढ़ती रहती हैं वीरों की शमशीरों से।
उन्हें अब शायद याद कुछ आती नहीं मेरी।
लगता है चाहत के दिन अब पूरे हो चले।
मन समर्पित तन समर्पित और यह जीवन समर्पित
चाहता हूँ देश की धरती तुझे अभी कुछ और भी दूँ
माँ तुम्हारा ऋण बहुत है मैं अकिंचन
किन्तु इतना कर रहा फिर भी निवेदन
थाल में लाऊँ सजाकर भाल जब
स्वीकार कर लेना दयाकर यह समर्पण
गान अर्पित प्राण अर्पित रक्त का कण-कण समर्पित
माँज दो तलवार को लाओ न देरी
बाँध दो कसकर कमर पर ढाल मेरी
भाल पर मल दो चरण की धूल थोड़ी
शीष पर आशीष की छाया घनेरी
स्वप्न अर्पित प्रश्न अर्पित आयु का क्षण-क्षण समर्पित
तोड़ता हूँ मोह का बन्धन क्षमा दो
गाँव मेरा द्वार घर आँगन क्षमा दो
आज सीधे हाथ में तलवार दे दो
और बाएँ हाथ में ध्वज को थमा दो
ये सुमन लो ये चमन लो नीड़ का तृण-तृण समर्पित.
- रामावतार त्यागी
तेरे नखरे भी कमाल हैं जिंदगी
बिना बात के बवाल है जिंदगी।
कुरबतें हो हमसफ़र से अगर
फिर तो बस धमाल है जिंदगी।
हर अदा जिंदगी की कातिलना
अनसुलझा सवाल है जिंदगी।
आखिरी मंजिल तो मौत ही है
क्यूं फिर इक जंजाल है जिंदगी।
ठहर जाए ग़म जब आकर यहां
मानो बात बस पामाल है जिंदगी।