Saturday, January 17, 2026

दर्द भी अपना है और दर्द देने वाला भी

मलाल नहीं दर्द की इन्तेहाँ से ,

दर्द भी अपना है और दर्द देने वाला भी ...


तुम ने देखा एक नज़र और दिल तम्हारा हो गया

हम ने पाला मुद्दतों पहलू में, हम कुछ भी नहीं

तुम ने देखा एक नज़र और दिल तम्हारा हो गया

आसी राम नगरी

आंखों की झील में जो उतरे नहीं कभी

गहरे समंदरों की भला क्या खबर उन्हें..

आंखों की झील में जो उतरे नहीं कभी ।।

Friday, January 16, 2026

किताबों में नहीं था वो सबक सिखाया ज़माने ने

पन्नों की तरह दिन बदलते जा रहे हैं,

खबर नहीं है कि आ रहे हैं या जा रहे हैं । 

बहुत कुछ सिखाया जिंदगी ने अनजाने में,

किताबों में नहीं था वो सबक सिखाया ज़माने ने। 

Friday, January 9, 2026

कुछ पल साथ में बहने दो तुम

ज़रा से फासले रहने दो तुम।

बात दिल की कहने दो तुम।

माना दो किनारों की तरह है

कुछ पल साथ में बहने दो तुम।

इश्क़ किया है तो दर्द तो होगा

थोड़ा इसको ज़रा सहने दो तुम।

आंसू,आंहे और टूटे हुए ख्वाब

मोहब्बत के मुझे गहने दो तुम।

सजना संवरना तेरा बिजली गिरा गया

सजना संवरना तेरा ,बिजली गिरा गया।

रूप तेरा सलौना ,मेरे दिल को भा गया।

ढूंढे से भी नहीं मिलता ,चैन मेरे दिल को
ढूंढूं ग़र दिल ,तो भी जाने कहां गया।

बार बार पलकों को तेरा गिरा कर उठाना,
दीवाने को ये और दीवाना बना‌ गया ।

जुल्फों का लहराना जैसै काली घटा छाये
दिल मेरा ,तेरा होकर कर मुझसे दगा गया

जाते हुये मुड़ मुड़ कर वो देखना तेरा
बोलूं तो दो बोतल का कर वो नशा गया।

Saturday, December 27, 2025

सीमा नहीं बना करतीं हैं काग़ज़ खींची लकीरों से

“सीमा नहीं बना करतीं हैं काग़ज़ खींची लकीरों से,

ये घटती-बढ़ती रहती हैं वीरों की शमशीरों से.

(कवि बलवीर सिंह करुण) 


सीमा नहीं बना करतीं हैं काग़ज़ खींची लकीरों से,

ये घटती-बढ़ती रहती हैं वीरों की शमशीरों से।

Wednesday, December 24, 2025

उन्हें अब शायद याद कुछ आती नहीं मेरी

उन्हें अब शायद याद कुछ आती नहीं मेरी।

लगता है चाहत के दिन अब पूरे हो चले।

Thursday, December 11, 2025

मन समर्पित तन समर्पित और यह जीवन समर्पित


मन समर्पित तन समर्पित और यह जीवन समर्पित

चाहता हूँ देश की धरती तुझे अभी कुछ और भी दूँ

माँ तुम्हारा ऋण बहुत है मैं अकिंचन
किन्तु इतना कर रहा फिर भी निवेदन
थाल में लाऊँ सजाकर भाल जब
स्वीकार कर लेना दयाकर यह समर्पण
गान अर्पित प्राण अर्पित रक्त का कण-कण समर्पित

माँज दो तलवार को लाओ न देरी
बाँध दो कसकर कमर पर ढाल मेरी
भाल पर मल दो चरण की धूल थोड़ी
शीष पर आशीष की छाया घनेरी
स्वप्न अर्पित प्रश्न अर्पित आयु का क्षण-क्षण समर्पित

तोड़ता हूँ मोह का बन्धन क्षमा दो
गाँव मेरा द्वार घर आँगन क्षमा दो
आज सीधे हाथ में तलवार दे दो
और बाएँ हाथ में ध्वज को थमा दो
ये सुमन लो ये चमन लो नीड़ का तृण-तृण समर्पित.

- रामावतार त्यागी 

Saturday, November 22, 2025

तेरे नखरे भी कमाल हैं जिंदगी

तेरे नखरे भी कमाल हैं जिंदगी

बिना बात के बवाल‌ है जिंदगी।

कुरबतें हो हमसफ़र से अगर

फिर तो बस धमाल है ‌जिंदगी।

हर अदा जिंदगी की कातिलना

अनसुलझा सवाल‌ है जिंदगी।

आखिरी मंजिल तो मौत ही है

क्यूं फिर इक जंजाल है जिंदगी।

ठहर जाए ग़म जब आकर यहां

मानो बात बस पामाल है जिंदगी।