रस्ते भर रो रो के हमसे पूछा पाँव के छालोँ ने,
Tuesday, June 17, 2025
बस्ती कितनी दुर बसा ली दिल मेँ बसने वालोँ ने
मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से
इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ
हम तिरे सर की क़सम झूट ही खाने लग जाएँ
इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब
सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ
चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही
हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ
हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो
ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ
ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे
जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ
मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से
ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ
-महशर आफ़रीदी
दुनिया के जो मज़े हैं हरगिज़ वो कम न होंगे
दुनिया के जो मज़े हैं हरगिज़ वो कम न होंगे
चर्चे यही रहेंगे अफ़्सोस हम न होंगे
आग़ाज़-ए-इश्क़ ही में शिकवा बुतों का ऐ दिल
दुख सब्र अभी तो क्या क्या सितम न होंगे
बुलबुल के दर्द-ए-दिल को मुमकिन नहीं मुदावा
गुलचीं के हाथ दोनों जब तक क़लम न होंगे
याद-ए-गुज़िश्तगाँ पर क्या रोएँ अब 'तरक़्क़ी'
क्या हम रवाना सू-ए-मुल्क-ए-अदम न होंगे
-आग़ा मोहम्मद तक़ी ख़ान तरक़्क़ी
अपने होंटों पर सजाना चाहता हूँ
अपने होंटों पर सजाना चाहता हूँ
आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ
कोई आँसू तेरे दामन पर गिरा कर
बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ
थक गया मैं करते करते याद तुझ को
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ
छा रहा है सारी बस्ती में अँधेरा
रौशनी को, घर जलाना चाहता हूँ
आख़री हिचकी तिरे ज़ानू पे आए
मौत भी मैं शाइ'राना चाहता हूँ
-क़तील शिफ़ाई
बशीर बद्र '25
*
हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए
चराग़ों की तरह आँखें जलें जब शाम हो जाए
कभी तो आसमाँ से चाँद उतरे जाम हो जाए
तुम्हारे नाम की इक ख़ूब-सूरत शाम हो जाए
अजब हालात थे यूँ दिल का सौदा हो गया आख़िर
मोहब्बत की हवेली जिस तरह नीलाम हो जाए
समुंदर के सफ़र में इस तरह आवाज़ दे हम को
हवाएँ तेज़ हों और कश्तियों में शाम हो जाए
मुझे मालूम है उस का ठिकाना फिर कहाँ होगा
परिंदा आसमाँ छूने में जब नाकाम हो जाए
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
मुस्कुराना तो इख़्तियार में है
एक पत्थर कि दस्त-ए-यार में है
फूल बनने के इंतिज़ार में है
अपनी नाकामियों पे आख़िर-ए-कार
मुस्कुराना तो इख़्तियार में है
हम सितारों की तरह डूब गए
दिन क़यामत के इंतिज़ार में है
अपनी तस्वीर खींचता हूँ मैं
और आईना इंतिज़ार में है
कुछ सितारे हैं और हम हैं 'जमील'
रौशनी जिन से रहगुज़ार में है
-क़मर जमील
मुनव्वर राणा /राना '25
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हम नहीं थे तो क्या कमी थी यहाँ
हम न होंगे तो क्या कमी होगी
तेरी आँखों में हम ने क्या देखा
दिल के दीवार-ओ-दर पे क्या देखा
बस तिरा नाम ही लिखा देखा
तेरी आँखों में हम ने क्या देखा
कभी क़ातिल कभी ख़ुदा देखा
अपनी सूरत लगी पराई सी
जब कभी हम ने आईना देखा
हाए अंदाज़ तेरे रुकने का
वक़्त को भी रुका रुका देखा
तेरे जाने में और आने में
हम ने सदियों का फ़ासला देखा
फिर न आया ख़याल जन्नत काजब तिरे घर का रास्ता देखा-सुदर्शन फ़ाकिर
Thursday, June 5, 2025
दाग़ देहलवी (शायरी, शेर)
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ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं
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ये तो नहीं कि तुम सा जहाँ में हसीं नहीं
इस दिल को क्या करूँ ये बहलता कहीं नहीं
Thursday, May 29, 2025
तरस रही थीं ये आँखें किसी की सूरत को
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तरस रही थीं ये आँखें किसी की सूरत को
सो हम भी दश्त में आब-ए-रवाँ उठा लाए
सालिम सलीम
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फूल खिले हैं गुलशन गुलशन
लेकिन अपना अपना दामन
जिगर मुरादाबादी
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आँखें खुलीं तो जाग उठीं हसरतें तमाम
उस को भी खो दिया जिसे पाया था ख़्वाब में
सिराज लखनवी
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मुसीबत और लम्बी ज़िंदगानी
बुज़ुर्गों की दुआ ने मार डाला
मुज़्तर ख़ैराबादी