यूनान, मिस्र, रोमा सब मिट गए जहां से,
बाकी मगर अभी तक नामों निशां हमारा,
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़मां हमारा...
-अल्लामा इकबाल
आशु तो कुछ भी नहीं आसूँ के सिवा, जाने क्यों लोग इसे पलकों पे बैठा लेते हैं।
यूनान, मिस्र, रोमा सब मिट गए जहां से,
बाकी मगर अभी तक नामों निशां हमारा,
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़मां हमारा...
-अल्लामा इकबाल
तेरे क़रीब आ के बड़ी उलझनों में हूँ
मैं दुश्मनों में हूँ कि तिरे दोस्तों में हूँ
मुझ से गुरेज़-पा है तो हर रास्ता बदल
मैं संग-ए-राह हूँ तो सभी रास्तों में हूँ
तू आ चुका है सत्ह पे कब से ख़बर नहीं
बेदर्द मैं अभी उन्हीं गहराइयों में हूँ
ऐ यार-ए-ख़ुश-दयार तुझे क्या ख़बर कि मैं
कब से उदासियों के घने जंगलों में हूँ
तू लूट कर भी अहल-ए-तमन्ना को ख़ुश नहीं
याँ लुट के भी वफ़ा के इन्ही क़ाफ़िलों में हूँ
बदला न मेरे बाद भी मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू
मैं जा चुका हूँ फिर भी तिरी महफ़िलों में हूँ
मुझ से बिछड़ के तू भी तो रोएगा उम्र भर
ये सोच ले कि मैं भी तिरी ख़्वाहिशों में हूँ
तू हँस रहा है मुझ पे मिरा हाल देख कर
और फिर भी मैं शरीक तिरे क़हक़हों में हूँ
ख़ुद ही मिसाल-ए-लाला-ए-सेहरा लहू लहू
और ख़ुद 'फ़राज़' अपने तमाशाइयों में हूँ
- अहमद फ़राज़
माना की हमारे बिच बोहोत सी दूरियां हैं
लेकिन फिर भी तुम दिल के सबसे करीब हो
माना की रात की ख़ामोशी मुझे डरा देती है
लेकिन अगली सुबह की वो खिलती हुई धूप की तुम उम्मीद हो
माना की हमें कुछ मांगना नहीं आता है रब से
पर मेरी हर दुआ में कांपते हाथों की तुम लकीर हो
माना की हम कोई कलाकार तो नहीं हैं
पर मेरी कला की तुम खूबसूरत तस्वीर हो
तुम दिल के सबसे करीब हो....
हमारी आंख का पानी हो तुम
बहुत खूबसूरत कहानी हो तुम
अंगूठियां तो कब की लापता हैं मगर
उंगलियों पे पड़ी निशानी हो तुम
बहुत खूबसूरत कहानी हो तुम
जिसमे लगते थे सजर रौनकों के
उन्हीं महफिलों की वीरानी हो तुम
बहुत खूबसूरत कहानी हो तुम
आहटों का सिलसिला थमेगा नहीं
खुशबुओं में रात की रानी हो तुम
बहुत खूबसूरत कहानी हो तुम
तुमको भुलाना जैसे मुमकिन नहीं
उम्र भर जो रहेगी वो निशानी हो तुम
बहुत खूबसूरत कहानी हो तुम....
समस्त भावों को अपने चढ़ाती
मौन स्पंद मेरी तुझे बुलाती।
जो तुम आए ना इस बार
दहकेगी वेदना क्षुब्ध प्यास।
सृष्टि के कन कन का कंपन
रुक जाएगा आदि अनंत स्फुरण।
विराम विश्राम लगेगा जीवन पर
मिटेगी संवेदना जल थल पर।
नियति नृत्य करेगी कहरों से
डूबेगी धरा अश्रु लहरों से।
पिघल गिरि गिर बहेगा पार
जगती ज्वाला की कंचन धार।
ढलती रातों में आलोक तिमिर
चीत्कारेगी क्रंदन करती पीर।
प्रकट हो जाएगा जर्जर विकार
बचेगा ना कोई उर्वर उपसंहार।
जन्म मृत्यु की भयावह संसृति
बिखरेगी अंत आरंभ की नीति।
जड़ - चेतन का सुदृढ़ बंधन
शांत हो जाएगा मृदु स्पंदन।
जुनून-ए-शौक़ अब भी कम नहीं है
मगर वो आज भी बरहम नहीं है
बहुत मुश्किल है दुनिया का सँवरना
तिरी ज़ुल्फ़ों का पेच-ओ-ख़म नहीं है
बहुत कुछ और भी है इस जहाँ में
ये दुनिया महज़ ग़म ही ग़म नहीं है
तक़ाज़े क्यूँ करूँ पैहम न साक़ी
किसे याँ फ़िक्र-ए-बेश-ओ-कम नहीं है
उधर मश्कूक है मेरी सदाक़त
इधर भी बद-गुमानी कम नहीं है
मिरी बर्बादियों का हम-नशीनो
तुम्हें क्या ख़ुद मुझे भी ग़म नहीं है
अभी बज़्म-ए-तरब से क्या उठूँ मैं
अभी तो आँख भी पुर-नम नहीं है
ब-ईं सैल-ए-ग़म ओ सैल-ए-हवादिस
मिरा सर है कि अब भी ख़म नहीं है
'मजाज़' इक बादा-कश तो है यक़ीनन
जो हम सुनते थे वो आलम नहीं है
उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ
अब क्या कहें ये क़िस्सा पुराना बहुत हुआ
ढलती न थी किसी भी जतन से शब-ए-फ़िराक़
ऐ मर्ग-ए-ना-गहाँ तिरा आना बहुत हुआ
हम ख़ुल्द से निकल तो गए हैं पर ऐ ख़ुदा
इतने से वाक़िए का फ़साना बहुत हुआ
अब हम हैं और सारे ज़माने की दुश्मनी
उस से ज़रा सा रब्त बढ़ाना बहुत हुआ
अब क्यूँ न ज़िंदगी पे मोहब्बत को वार दें
इस आशिक़ी में जान से जाना बहुत हुआ
अब तक तो दिल का दिल से तआ'रुफ़ न हो सका
माना कि उस से मिलना मिलाना बहुत हुआ
क्या क्या न हम ख़राब हुए हैं मगर ये दिल
ऐ याद-ए-यार तेरा ठिकाना बहुत हुआ
कहता था नासेहों से मिरे मुँह न आइयो
फिर क्या था एक हू का बहाना बहुत हुआ
लो फिर तिरे लबों पे उसी बेवफ़ा का ज़िक्र
अहमद-'फ़राज़' तुझ से कहा ना बहुत हुआ
ये जिंदगी बहुत कुछ सिखाती है
कभी हंसाती कभी रुलाती है
लगाती है ठहाके मेरी हालत पर
कभी रोती कभी गुनगुनाती है
बहती है जिंदगी निर्झर की भांति
ख़ुद बेरंग होकर सारे रंग दिखाती है
कहती है मुझसे चल तू मेरे संग
ना चले तो कर दूंगी बेरंग
कहती हूं मैं ठहर तू एक पल
जाना कहां है अब चलेंगे कल
थके कदम अभी थके नहीं की
जिंदगी ने हाथ खींचा
कहा दूर है मंजिल अब भी
संघर्ष ही मेरा नाम है दूजा
लड़खड़ाते कदम और गिर पड़ी मैं
जिंदगी ने साथ छोड़ा
वक्त की जंजीर टूटी
सामने आजाद खड़ी मैं
सामने आजाद खड़ी मैं।
मोती हो कि शीशा जाम कि दुर
जो टूट गया सो टूट गया
कब अश्कों से जुड़ सकता है
जो टूट गया सो छूट गया
तुम नाहक़ टुकड़े चुन चुन कर
दामन में छुपाए बैठे हो
शीशों का मसीहा कोई नहीं
क्या आस लगाए बैठे हो
शायद कि इन्हीं टुकड़ों में कहीं
वो साग़र-ए-दिल है जिस में कभी
सद-नाज़ से उतरा करती थी
सहबा-ए-ग़म-ए-जानाँ की परी
फिर दुनिया वालों ने तुम से
ये साग़र ले कर फोड़ दिया
जो मय थी बहा दी मिट्टी में
मेहमान का शहपर तोड़ दिया
ये रंगीं रेज़े हैं शायद
उन शोख़ बिलोरीं सपनों के
तुम मस्त जवानी में जिन से
ख़ल्वत को सजाया करते थे
नादारी दफ़्तर भूक और ग़म
उन सपनों से टकराते रहे
बे-रहम था चौमुख पथराओ
ये काँच के ढाँचे क्या करते
या शायद इन ज़र्रों में कहीं
मोती है तुम्हारी इज़्ज़त का
वो जिस से तुम्हारे इज्ज़ पे भी
शमशाद-क़दों ने रश्क किया
इस माल की धुन में फिरते थे
ताजिर भी बहुत रहज़न भी कई
है चोर-नगर याँ मुफ़लिस की
गर जान बची तो आन गई
ये साग़र शीशे लाल-ओ-गुहर
सालिम हों तो क़ीमत पाते हैं
यूँ टुकड़े टुकड़े हों तो फ़क़त
चुभते हैं लहू रुलवाते हैं
तुम नाहक़ शीशे चुन चुन कर
दामन में छुपाए बैठे हो
शीशों का मसीहा कोई नहीं
क्या आस लगाए बैठे हो
यादों के गिरेबानों के रफ़ू
पर दिल की गुज़र कब होती है
इक बख़िया उधेड़ा एक सिया
यूँ उम्र बसर कब होती है
इस कार-गह-ए-हस्ती में जहाँ
ये साग़र शीशे ढलते हैं
हर शय का बदल मिल सकता है
सब दामन पुर हो सकते हैं
जो हाथ बढ़े यावर है यहाँ
जो आँख उठे वो बख़्तावर
याँ धन-दौलत का अंत नहीं
हों घात में डाकू लाख मगर
कब लूट-झपट से हस्ती की
दूकानें ख़ाली होती हैं
याँ परबत-परबत हीरे हैं
याँ सागर सागर मोती हैं
कुछ लोग हैं जो इस दौलत पर
पर्दे लटकाते फिरते हैं
हर पर्बत को हर सागर को
नीलाम चढ़ाते फिरते हैं
कुछ वो भी हैं जो लड़ भिड़ कर
ये पर्दे नोच गिराते हैं
हस्ती के उठाई-गीरों की
हर चाल उलझाए जाते हैं
इन दोनों में रन पड़ता है
नित बस्ती-बस्ती नगर-नगर
हर बस्ते घर के सीने में
हर चलती राह के माथे पर
ये कालक भरते फिरते हैं
वो जोत जगाते रहते हैं
ये आग लगाते फिरते हैं
वो आग बुझाते रहते हैं
सब साग़र शीशे लाल-ओ-गुहर
इस बाज़ी में बद जाते हैं
उट्ठो सब ख़ाली हाथों को
इस रन से बुलावे आते हैं
चलो एक दीया,
फिर से जलाएं।
अंधेरे को धरा से,
मार भगाएं।
रहे जिनकी जिंदगी में,
सदा हैं अंधेरे।
उजाले न आए,
कभी न देखे सबेरे।
उन्हें आके फिर से,
सजाएं-संवारें।
चलो एक दीया
फिर से जलाएं।
अंधेरे को धरा से
मार भगाएं।
निशा बन गई,
जिनकी जिंदगी की।
कहानी,
हमेशा है देखी।
दुख और परेशानी,
उनके दर्द और घावों,
पर मरहम लगाएं।
चलो एक दीया,
फिर से जलाएं।
तिमिर है घना,
रात्रि न कटने वाली।
पता कब फिर से,
आएगी जीवन मे दिवाली।
चलो उनके जीवन मे ,
सूरज बनके आएं।
उनके अंधकारपूर्ण जीवन मे ,
चांदनी बिखराएं।
चलो एक दीया,
फिर से जलाएं।
अंधेरे को धरा से,
मार भगाएं।