Thursday, March 16, 2023

अभी तो लबों का लरजना बाकी है

​जमी है जो बर्फ पिघलना बाकी है

जमीं से आसमां का मिलना बाकी है 

अभी अभी तो थूका है गुस्सा उसने 
अभी तो सीने से लिपटना बाकी है 

कल तो उठा रखा था आसमां सर पे 
अभी तो बाहों में सिमटना बाकी है 

लाया हूं गजरा उसके जूड़े के लिए 
रात को चमेली महकना बाकी है 

लेके शिकायत उन होठों पे हजार 
अभी तो लबों का लरजना बाकी है 

इतनी आसानी से ना मानेंगे वो 
अभी तो हमारा तरसना बाकी है 

करके वार तेरे सीने पे सागर 
अभी तो उसका सिसकना बाकी है 

अपने खुबसूरत सपनों को

​अपने खुबसूरत सपनों को

सच करने की कोशिश में हूं 

मंजिलें हैं आकाश से ऊंची 
सर करने की कोशिश में हूं 

माना कि , कुछ घाव नहीं भरते 
मगर भरने की कोशिश में हूं 

बहुत कुछ बना रहें हैं लोग 
मैं,इंसान बन रहने की कोशिश में हूं।। 

सिर्फ तेरी खुशी मांगी

​मेरे इश्क़ की

कुनकुनी नरमी में खोना ही था, 
प्रेम तो होना ही था, 
अलग अलग रास्तों पे चल दिए 
बिछड़ के सदा के लिए, 
कोई रास्ता फिर को जगह 
आ मिलना ही था.... 
तुमने शोहरतें कई ढूंढी, 
मैंने बस दिवानगी चुनी, 
दुनियां की रंगीनियों से, 
मन कभी तो भरना ही था... 
मैने तो सजदे में 
सिर्फ तेरी खुशी मांगी, 
अपने लिए तेरे आंसू, 
तेरे गमों की तपिश मांगी, 
तेरी खुशियों को फिर 
तुझ से आन मिलना ही था.... 

सरकारी दफ़्तर का हाल और कविताओं का कमाल

​इक्कीस दिनों से

पिताजी के पेंशन की फ़ाइल
सरकारी दफ्तर की
धूल फाँक रही थी।
मैं रोज पिताजी के साथ
दफतर के चक्कर
काट रहा था
पर बात नहीं बन पा रही थी।
“आज बड़े बाबू नहीं
आए हैं
तो आज कर्मचारी
छुट्टी पर हैं,
हो जाएगा
किस बात की इतनी
हड़बड़ है।”
मैं समझ गया
यहाँ कुछ और ही गड़बड़ है।

मैंने पिताजी को
अंदर की बात समझाई,
पर पिताजी के सिद्धान्तों को
मेरी सीधी बात
समझ नहीं आई।
उन्होंने कहा-
“हम गाँधीवादी हैं
भ्रष्टाचार के सांप को
दूध नहीं पिलाएँगें,
सत्य और अहिंसा के बल पर
अपना काम करवाएँगे।”
पिताजी के सिद्धांत के अनुसार
काम करवाना
मुझे तो कुछ
समझ नहीं आ रहा था।
दिमाग़ का हर तार
उलझता जा रहा था।
 

तभी मेरे दिमाग़ में
एक आइडिया सूझा
जिससे काम भी हो जाए
और पिताजी की
बात भी रह जाए।
मैं अगले दिन
पिताजी के साथ
दफ़्तर आया
और साथ
अपनी कविताओं की
डायरी भी लाया।
और बड़े बाबू के आगे
पालथी मारकर बैठ गया
कि इसे आज अपनी
सभी कविताएं सुनाऊंगा
और जब तक
मेरा काम नहीं होता
इसका दिमाग़ खाऊँगा।
 

आठ गजलों के बाद
मैंने उसे सात गीत सुनाया
और जैसे ही
मैं व्यंग्य पर आया।
उसका दिमाग़ चकराया
और ऊँट
पहाड़ के नीचे आया।
बोला-
“अब और नहीं
सुन सकता हूँ
तुम पाँच मिनट रुको
अभी तुम्हारा काम करता हूँ।”
उस दिन ये राज़ समझ आया
कि ये कविताएँ
केवल शब्दों का जाल नहीं हैं
ये तो हथियार है
किसी का
दिमाग़ चाट जाती हैं,
किसी के दिल में उतर जाती हैं.

दिनेश देवघरिया 


Monday, March 13, 2023

ठान लेने से भला क्या नहीं होता

​ठान लेने से भला क्या नहीं होता

वह भी होता है जो न मंजूरे खुदा होता है। 
कौन सोचा था चाँद तारों पर कोई जा भी पायेगा। 
कौन सोंचा होगा दूरी तारों की भी कोई लगा पायेगा। 
पृथ्वी चक्कर भी लगाती है भला कौन बतला पायेगा । 
ठान लिया तो सब हो गया । 
दूर कितना भी रहो, पास ही दिखोगे रूबरू। 
कोई जादू नहीं सच है ये 
बातें भी करोगे रूबरू । 
हृदय निकाल कर सच मे रख देते हैं। 
कटे अंग भी जोड़ दिए जाते हैं। 
पुराणों की कही एक एक बात सच साबित हुई है । 
बस ठान जो लिया। 
वक़्त को बांध भी लेंगे। 
कल को कैद कर लेंगे । 
जीवन अमर हो जाएगा । 
जीवन होगा, उमर खत्म हो जाएगी । 
जीवन होगा, उमर खत्म हो जाएगी । 

न कोई शिकवा शिकायत है

​प्रेम में कोई गिला नहीं न कोई शिकवा शिकायत है,

ये दो दिलों को खुदा की नेमत से मिली ईनायत है। 
अगर कोई जान पाए इसको खुदा की इबारत है, 
जो समझे तो जाने वरना ताजमहल भी इमारत है ।। 

चले जब प्रेम का तीर दिल चीर के रख देता है, 
यूं ही नहीं कोई सब खोकर प्रेम का फकीर होता है। 
है दो दिलों का गजब मेल तभी कोई अकेला रोता है, 
दिन भर का थका हारा अपनों की खातिर भूखा सोता है।। 

प्रेम की प्यास बुझाए बुझती नहीं तपन बढ़ती जाती है, 
जमाने में हो जोर बारिश फिर भी गर्मी नजर आती है । 
मिले जब हमराही ज्येष्ठ में सावन की फुहार नजर आती है, 
मझधार में डूबती नैया भी बिना केवट पार नजर आती है

अंदर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए

​अंदर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए 

कितने शरीफ़ लोग थे सब खुल के आ गए 

सूरज से जंग जीतने निकले थे बेवक़ूफ़ 
सारे सिपाही मोम के थे घुल के आ गए 

मस्जिद में दूर दूर कोई दूसरा न था 
हम आज अपने आप से मिल-जुल के आ गए 
 

नींदों से जंग होती रहेगी तमाम उम्र 
आँखों में बंद ख़्वाब अगर खुल के आ गए 
 

सूरज ने अपनी शक्ल भी देखी थी पहली बार 
आईने को मज़े भी तक़ाबुल के आ गए 
 

अनजाने साए फिरने लगे हैं इधर उधर 
मौसम हमारे शहर में काबुल के आ गए 

राहत इन्दौरी

ऐ इश्क़ ये सब दुनिया वाले बे-कार की बातें करते हैं

​ऐ इश्क़ ये सब दुनिया वाले बे-कार की बातें करते हैं

पायल के ग़मों का इल्म नहीं झंकार की बातें करते है.

हर दिल में छुपा है तीर कोई हर पांव में है ज़ंजीर कोई
पूछे कोई इन से ग़म के मज़े जो प्यार की बातें करते हैं
 

उल्फ़त के नए दीवानों को किस तरह से कोई समझाए
नज़रों पे लगी है पाबंदी दीदार की बातें करते हैं
 

भंवरे हैं अगर मदहोश तो क्या परवाने भी हैं ख़ामोश तो क्या
सब प्यार के नग़्मे गाते हैं सब यार की बातें करते हैं

शकील बदायूंनी 

जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे

​वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा संभालो,

चट्टानों की छाती से दूध निकालो, 

है रुकी जहाँ भी धार, शिलाएँ तोड़ो, 
पीयूष चन्द्रमाओं का पकड़ निचोड़ो। 

चढ़ तुँग शैल शिखरों पर सोम पियो रे! 
योगियों नहीं विजयी के सदृश जियो रे! 

जब कुपित काल धीरता त्याग जलता है, 
चिनगी बन फूलों का पराग जलता है, 
सौन्दर्य बोध बन नई आग जलता है, 
ऊँचा उठकर कामार्त्त राग जलता है। 

अम्बर पर अपनी विभा प्रबुद्ध करो रे! 
गरजे कृशानु तब कँचन शुद्ध करो रे! 

जिनकी बाँहें बलमयी ललाट अरुण है, 
भामिनी वही तरुणी, नर वही तरुण है, 
है वही प्रेम जिसकी तरँग उच्छल है, 
वारुणी धार में मिश्रित जहाँ गरल है। 

उद्दाम प्रीति बलिदान बीज बोती है, 
तलवार प्रेम से और तेज होती है! 

छोड़ो मत अपनी आन, सीस कट जाए, 
मत झुको अनय पर भले व्योम फट जाए, 
दो बार नहीं यमराज कण्ठ धरता है, 
मरता है जो एक ही बार मरता है। 

तुम स्वयं मृत्यु के मुख पर चरण धरो रे! 
जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे! 

स्वातन्त्रय जाति की लगन व्यक्ति की धुन है, 
बाहरी वस्तु यह नहीं भीतरी गुण है! 
वीरत्व छोड़ पर का मत चरण गहो रे 
जो पड़े आन खुद ही सब आग सहो रे! 

जब कभी अहम पर नियति चोट देती है, 
कुछ चीज़ अहम से बड़ी जन्म लेती है, 
नर पर जब भी भीषण विपत्ति आती है, 
वह उसे और दुर्धुर्ष बना जाती है। 

चोटें खाकर बिफरो, कुछ अधिक तनो रे! 
धधको स्फुलिंग में बढ़ अंगार बनो रे! 

उद्देश्य जन्म का नहीं कीर्ति या धन है, 
सुख नहीं धर्म भी नहीं, न तो दर्शन है, 
विज्ञान ज्ञान बल नहीं, न तो चिन्तन है, 
जीवन का अन्तिम ध्येय स्वयं जीवन है। 

सबसे स्वतंत्र रस जो भी अनघ पिएगा! 
पूरा जीवन केवल वह वीर जिएगा!

रामधारी सिंह दिनकर

Friday, March 10, 2023

तो ज़ख़्मों को मरहम की ज़रूरत नहीं होती

​दो लफ़्ज़ मोहब्बत के असर करते जो इतना,

तो ज़ख़्मों को मरहम की ज़रूरत नहीं होती ।