Monday, November 30, 2020

जिसकी जैसी नियत

जिसकी जैसी नीयत है, 
वो वैसी कहानी रखता है! 
कोई परिंदों के लिए बंदूक, 
तो कोई पानी रखता है! 

कुछ तो दूरी हमने भी बढ़ाई होगी

कुछ तो दूरी हमने भी बढ़ाई होगी,
वरना ये जुदाई ना होती।
कुछ तो कमी हमारी वफ़ा में भी रही होगी,
वरना इतनी बेवफाई ना होती।
हमने भी ज़रूर अपने किस्से सुनाए होंगे लोगों से,
वरना इतनी रुसवाई ना होती।
कैसे कह दूँ कि सारी खता मेरी है,
कुछ बात तो उसने भी बढ़ाई होगी।
दर्द तो हुआ मुझे बहुत पर,
दूर होकर मुझसे वो भी तो कुछ रोई होगी।
क्या हुआ जो उसे मेरा साथ पसंद नहीं?
ये रिश्ते हैं प्यार के जबरदस्ती के नहीं,
कोई और ऊपर वाले ने मेरे लिये भी बनाई होगी. 

मेरी नज़रों से गुज़र कर दिल-ओ-जां तक आओ

काम अब कोई न आएगा बस इक दिल के सिवा
रास्ते बंद हैं सब कूचा-ए-क़ातिल के सिवा


मैं जहां तुम को बुलाता हूं वहां तक आओ
मेरी नज़रों से गुज़र कर दिल-ओ-जां तक आओ


अब आ गया है जहां में तो मुस्कुराता जा
चमन के फूल दिलों के कंवल खिलाता जा


मय है तेरी आंखों में और मुझ पे नशा सा तारी है
नींद है तेरी पलकों में और ख़्वाब मुझे दिखलाए है


आंधियां चलती रहें अफ़्लाक थर्राते रहे
अपना परचम हम भी तूफ़ानों में लहराते रहे


सुब्ह हर उजाले पे रात का गुमां क्यूं है
जल रही है क्या धरती अर्श पे धुआं क्यूं है

इश्क़ का नग़्मा जुनूं के साज़ पर गाते हैं हम
अपने ग़म की आंच से पत्थर को पिघलाते हैं हम


सितारों के पयाम आए बहारों के सलाम आए
हज़ारों नामा-हा-ए-शौक़ अहल-ए-दिल के काम आए

न जाने छलकाए जाम कितने न जाने कितने सुबू उछाले
मगर मिरी तिश्नगी कि अब भी तिरी नज़र से शिकायतें हैं


ताकि दुनिया पे खुले उन का फ़रेब-ए-इंसाफ़
बे-ख़ता हो के ख़ताओं की सज़ा मांगते हैं

Saturday, November 28, 2020

जिंदगी शायरी

बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं 
तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं 

- फ़िराक़ गोरखपुरी

ज़िंदगी शायद इसी का नाम है 
दूरियाँ मजबूरियाँ तन्हाइयाँ 

- कैफ़ भोपाली

जो गुज़ारी न जा सकी हम से 
हम ने वो ज़िंदगी गुज़ारी है 

- जौन एलिया
अब भी इक उम्र पे जीने का न अंदाज़ आया 
ज़िंदगी छोड़ दे पीछा मिरा मैं बाज़ आया 

- शाद अज़ीमाबादी
चला जाता हूँ हँसता खेलता मौज-ए-हवादिस से 
अगर आसानियाँ हों ज़िंदगी दुश्वार हो जाए 

- असग़र गोंडवी

Thursday, November 26, 2020

सूखी सी अधखिली कली है


सूखी सी अधखिली कली है
परिमल नहीं, पराग नहीं।
किंतु कुटिल भौंरों के चुंबन
का है इन पर दाग नहीं॥

तेरी अतुल कृपा का बदला
नहीं चुकाने आई हूँ।
केवल पूजा में ये कलियाँ
भक्ति-भाव से लाई हूँ॥

प्रणय-जल्पना चिन्त्य-कल्पना
मधुर वासनाएं प्यारी।
मृदु-अभिलाषा, विजयी आशा
सजा रहीं थीं फुलवारी॥


किंतु गर्व का झोंका आया
यदपि गर्व वह था तेरा।
उजड़ गई फुलवारी सारी
बिगड़ गया सब कुछ मेरा॥

बची हुई स्मृति की ये कलियाँ
मैं समेट कर लाई हूँ।
तुझे सुझाने, तुझे रिझाने
तुझे मनाने आई हूँ॥

प्रेम-भाव से हो अथवा हो
दया-भाव से ही स्वीकार।
ठुकराना मत, इसे जानकर
मेरा छोटा सा उपहार॥

सुभद्राकुमारी चौहान

परिमल - 1. कुमकुम, चंदन आदि के मर्दन से उत्पन्न सुगंधि 2. कुमकुम, चंदन आदि को मलना 3. सुगंध; सुवास 4.विद्वानों की सभा

इस शहर में दिल को लगाना क्या

इंशाजी उठो अब कूच करो इस शहर में दिल को लगाना क्या।
वहशी को सुकूं से क्या मतलब जोगी का शहर में ठिकाना क्या॥

इस दिल के दरीदा[1] दामन को देखो तो सही सोचो तो सही।
जिस झोली में सौ छेद हुए उस झोली को फैलाना क्या॥

शब बीती चाँद भी डूब गया ज़ंजीर पड़ी दरवाज़े में।
क्यूँ देर गए घर आए हो सजनी से करोगे बहाना क्या॥

फिर हिज्र की लम्बी रात मियाँ संजोग की तो यही एक घड़ी।
जो दिल में है लब पर आने दो शर्माना क्या घबराना क्या॥
 
उस रोज़ जो उनको देखा है अब ख़्वाब का आलम लगता है।
उस रोज़ जो उनसे बात हुई वो बात भी थी अफ़साना क्या॥
 
उस हुस्न के सच्चे मोती को हम देख सकें पर छू न सकें।
जिसे देख सकें पर छू न सकें वो दौलत क्या वो ख़ज़ाना क्या॥
 
उसको भी जला दुखते हुए मन एक शोला लाल भभूका बन।
यूं आंसू बन बह जाना क्या यूं माटी में मिल जाना क्या॥
 
जब शहर के लोग न रस्ता दें क्यूं बन में न जा बिसराम करें।
दीवानों की सी न बात करे तो और करे दीवाना क्या॥

अर्थ : 1. फटा-पुराना 

Wednesday, November 25, 2020

पहले दोस्त ढूँढ लूँ

दुश्मन तो मिल ही जायेंगे,
ताज रखते ही सिर का. 
पहले दोस्त ढूँढ लूँ,
लिबास पहन फकीरी का. 

कोई उम्मीद नहीं करते।

कोई उम्मीद हम नहीं करते।
आप अहदे वफ़ा नहीं करते।
गर ज़रूरी थे ज़िन्दगी के लिए,
आप खुद से जुदा नहीं करते।
मेरा होना अज़ीज़ है शायद,
आप इतनी दुआ नहीं करते।
फैसला छोड़ते मुकद्दर पे,
आप रस्मे अदा नहीं करते।

Tuesday, November 24, 2020

हम तो समझे थे कि इक ज़ख़्म है भर जाएगा

मैं सच कहूंगी मगर फिर भी हार जाऊंगी
वो झूट बोलेगा और ला-जवाब कर देगा

वो न आएगा हमें मालूम था इस शाम भी
इंतिज़ार उस का मगर कुछ सोच कर करते रहे

कैसे कह दूं कि मुझे छोड़ दिया है उस ने
बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की


अब तो इस राह से वो शख़्स गुज़रता भी नहीं
अब किस उम्मीद पे दरवाज़े से झाँके कोई

हम तो समझे थे कि इक ज़ख़्म है भर जाएगा
क्या ख़बर थी कि रग-ए-जां में उतर जाएगा


वो मुझ को छोड़ के जिस आदमी के पास गया
बराबरी का भी होता तो सब्र आ जाता

यूं बिछड़ना भी बहुत आसां न था उस से मगर
जाते जाते उस का वो मुड़ कर दोबारा देखना


कांप उठती हूँ मैं ये सोच के तन्हाई में
मेरे चेहरे पे तिरा नाम न पढ़ ले कोई

उस के यूं तर्क-ए-मोहब्बत का सबब होगा कोई
जी नहीं ये मानता वो बेवफ़ा पहले से था


हाथ मेरे भूल बैठे दस्तकें देने का फ़न
बंद मुझ पर जब से उस के घर का दरवाज़ा हुआ

ज़िंदगी किस तरह बसर होगी दिल नहीं लग रहा मोहब्बत में

सर ही अब फोड़िए नदामत में
नींद आने लगी है फ़ुर्क़त में

हैं दलीलें तिरे ख़िलाफ़ मगर
सोचता हूँ तिरी हिमायत में

रूह ने इश्क़ का फ़रेब दिया
जिस्म को जिस्म की अदावत में

अब फ़क़त आदतों की वर्ज़िश है
रूह शामिल नहीं शिकायत में

इश्क़ को दरमियाँ न लाओ कि मैं
चीख़ता हूँ बदन की उसरत में

ये कुछ आसान तो नहीं है कि हम
रूठते अब भी हैं मुरव्वत में

वो जो ता'मीर होने वाली थी
लग गई आग उस इमारत में

ज़िंदगी किस तरह बसर होगी
दिल नहीं लग रहा मोहब्बत में

फिर बनाया ख़ुदा ने आदम को
अपनी सूरत पे ऐसी सूरत में

ऐ ख़ुदा जो कहीं नहीं मौजूद
क्या लिखा है हमारी क़िस्मत में