Thursday, November 9, 2023

मैं साथ लिये जाता हूँ

 दास्ताने ज़िन्दगी, मैं साथ लिये जाता हूँ !

टूते हुए दिल को, मैं साथ लिये जाता हूँ !


मांग लेना जान भी गर ज़रूरत हो तुझको,

जो बची है ज़रा सी, मैं साथ लिये जाता हूँ !


धूप खिलती रहे सदा ही बस चेहरे पर तेरे,

गमों का हर बादल, मैं साथ लिये जाता हूँ !


निकाल देना यादों को मेरी दिल से अपने,

ये यादों का ज़खीरा, मैं साथ लिये जाता हूँ !


'मिश्र' भुगतूँगा उम्रभर मोहब्बत की सजाएँ,

तेरे प्यार की अदाएं, मैं साथ लिये जाता हूँ !

एक उम्मीद बार बार आ कर

 बीते रिश्ते तलाश करती है

ख़ुशबू ग़ुंचे तलाश करती है


जब गुज़रती है उस गली से सबा

ख़त के पुर्ज़े तलाश करती है


अपने माज़ी की जुस्तुजू में बहार

पीले पत्ते तलाश करती है


एक उम्मीद बार बार आ कर

अपने टुकड़े तलाश करती है


बूढ़ी पगडंडी शहर तक आ कर

अपने बेटे तलाश करती है


Gulzar

ज़िंदगी आईने के जैसी है

 मुस्कुराओ तो मुस्कुराती है ।

ज़िंदगी आईने के जैसी है ।।

एक नयी दुनिया बसाऊं बहारों के पल लिए

एक पहल मन से गुलाब की ओर

हर कदम बढ़ता उसकी खुशबू की ओर

मन को है पता कांटे भी साथ मिलेंगे

पर भरोसा है खुशी के बीज साथ चलेंगे

एक बात है ज़रा कहूं अगर हो इजाजत

शम्स बिना गुलाब की अधूरी इबादत

उसकी ये तबस्सुम ये सुर्खियां हैं पहचान

चुन न ले आधी खिली कलियां कहीं बाग़बान

कभी खयाल जी में उठता कि उसके लिए

एक नयी दुनिया बसाऊं बहारों के पल लिए

मगर चाहत की ओर ये पहल एक मन में है

और खुशबू बिखरी हुई हर तरफ गगन में है

ये कदम बढ़ता है अजब है इश्क की डोर

बंधी महक-ओ-सुर्खी से चले गुलाब की ओर

साथ में जी लो

 एक अंकुर बोला ,

बड़ा होकर पेड़ बनूंगा।

साथ हँसेगे साथ रोए गे,

सब के साथ मे खेलूंगा ।


ज्यो-ज्यो बड़ा हुआ,

त्यों-त्यों पत्ते आये ।

नए-नए सदस्यो को,

देखकर वह मुस्काए ।


पेड़ के सारे पत्ते झगड़ने लगे,

मे ऊँचा मे ऊँचा, मे बड़ा सबसे ।

तू नीचा तू नीचा, तू छोटा सबसे,

तभी एक-एक टूटने लगे तूफां से ।


उसको याद न था की,

सब चार दिना को आये ।

तूफानों मे एक दूजे से,

टकराता और गिर जाए ।


पुराने पत्ते टूट रहे थे,

नए-नए पत्ते उग रहे थे ।

कभी पत्तो के संग डाली गिरती,

उसके सपने धीरे से टूट रहे थे ।


कहती है प्रकृति,जब तक साथ मिला ।

न बेर किसी से, दिल मे रख मेला।

क्या पता कौन पत्ता कब गिर जाए ,

कौन मंजिल से पहले छोड़ चला जाए ।

इतना हमने भी न पढ़ा है खुद को

 इतना हमने भी न पढ़ा है खुद को ।

जितना लफ्ज़ों में लिखा है तुम को ।।

Saturday, November 4, 2023

खुला है झूट का बाज़ार आओ सच बोलें

खुला है झूट का बाज़ार आओ सच बोलें

न हो बला से ख़रीदार आओ सच बोलें


सुकूत छाया है इंसानियत की क़द्रों पर

यही है मौक़ा-ए-इज़हार आओ सच बोलें


हमें गवाह बनाया है वक़्त ने अपना

ब-नाम-ए-अज़्मत-ए-किरदार आओ सच बोलें


सुना है वक़्त का हाकिम बड़ा ही मुंसिफ़ है

पुकार कर सर-ए-दरबार आओ सच बोलें


तमाम शहर में क्या एक भी नहीं मंसूर

कहेंगे क्या रसन-ओ-दार आओ सच बोलें


बजा कि ख़ू-ए-वफ़ा एक भी हसीं में नहीं

कहाँ के हम भी वफ़ादार आओ सच बोलें


जो वस्फ़ हम में नहीं क्यूँ करें किसी में तलाश

अगर ज़मीर है बेदार आओ सच बोलें


छुपाए से कहीं छुपते हैं दाग़ चेहरे के

नज़र है आइना-बरदार आओ सच बोलें


'क़तील' जिन पे सदा पत्थरों को प्यार आया

किधर गए वो गुनहगार आओ सच बोलें


-Qateel Shifai

मुझे ये फूल न दे तुझ को दिलबरी की क़सम

मुझे ये फूल न दे तुझ को दिलबरी की क़सम

ये कुछ नहीं तिरे होंठों की ताज़गी की क़सम


नज़र हसीं हो तो जल्वे हसीन लगते हैं

मैं कुछ नहीं हूँ मुझे मेरे हुस्न ही की क़सम


तू एक साज़ है छेड़ा नहीं किसी ने जिसे

तिरे बदन में छुपी नर्म रागनी की क़सम


ये रागनी तिरे दिल में है मेरे तन में नहीं

परखने वाले मुझे तेरी सादगी की क़सम


ग़ज़ल का लोच है तू नज़्म का शबाब है तू

यक़ीन कर मुझे मेरी ही शायरी की क़सम


-Sahir Ludhianvi

बात मेरी कभी सुनी ही नहीं

 बात मेरी कभी सुनी ही नहीं 

जानते वो बुरी भली ही नहीं 


दिल-लगी उन की दिल-लगी ही नहीं 

रंज भी है फ़क़त हँसी ही नहीं 


लुत्फ़-ए-मय तुझ से क्या कहूँ ज़ाहिद 

हाए कम-बख़्त तू ने पी ही नहीं 


उड़ गई यूँ वफ़ा ज़माने से 

कभी गोया किसी में थी ही नहीं 


जान क्या दूँ कि जानता हूँ मैं 

तुम ने ये चीज़ ले के दी ही नहीं 


हम तो दुश्मन को दोस्त कर लेते 

पर करें क्या तिरी ख़ुशी ही नहीं 


-Dagh Dehalvi

Friday, November 3, 2023

तुम तो ख़ामोशियां भी सुनते थे

​कितनी आवाज़ दी तुम्हें हमने ।

तुम तो ख़ामोशियां भी सुनते थे ।।