मेरे होठों के करीब है होंठ तेरे,
ऐसे में शराफ़त का सवाल कहाँ,
करने दे जी भर के गुस्ताखियाँ
कि अब इजाजत का सवाल कहाँ.
आशु तो कुछ भी नहीं आसूँ के सिवा, जाने क्यों लोग इसे पलकों पे बैठा लेते हैं।
मेरे होठों के करीब है होंठ तेरे,
ऐसे में शराफ़त का सवाल कहाँ,
करने दे जी भर के गुस्ताखियाँ
कि अब इजाजत का सवाल कहाँ.
बहता छोड़ दिया है
खुद को तेरे इश्क़ के समंदर में
अब तेरी मर्ज़ी
हाथ थाम ले या डूब जाने दे।
एक तमन्ना थी मेरी जो हसरत बन कर रह गई,
कभी दोस्ती थी तुमसे अब मोहब्बत बन कर रह गई,दीवानगी का रिश्ता हर रिश्ते से जुदा होता है।
आशिकी के आलम में इश्क ही खुदा होता है।।
कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया
वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे
जो इश्क़ को काम समझते थे
या काम से आशिक़ी करते थे
हम जीते-जी मसरूफ़ रहे
कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया
काम इश्क़ के आड़े आता रहा
और इश्क़ से काम उलझता रहा
फिर आख़िर तंग आ कर हम ने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया
सुना है वो हमें भुलाने लगे हैं
तो क्या हम उन्हें याद आने लगे हैं
ये कहना था उनसे मुहब्ब्त हो मुझको
ये कहने मे मुझको ज़माने लगे हैं
मेरी फ़ुर्सत शिकायत कर रही है,
बहुत मसरूफ़ होते जा रहे हो!
मुझे तो कॉल भी करते नहीं तुम,
किसी को फूल तक भिजवा रहे हो!
उन्हें कबसे यही समझा रहा हूँ,
मुझे बेकार में समझा रहे हो!
Aks Samastipuri
इक तुम्हारी याद जैसा क़ाफ़िला कोई न था।
बस तुम्हें यूँ छोड़कर अब रास्ता कोई न था।
साथ पल दो पल दिया और कुछ चले भी दूर तक,
पर घने इन गेसुओं सा आसरा कोई न था।
बेकसी थी ज़िंदगी में और उदासी थी बढ़ी,
पर हसीं वो दूसरा तो सिलसिला कोई न था।
दूर हमसे ख़ुद रहे तुम वक्त का था खेल सब,
दो दिलो में वैसे तो अब फ़ासला कोई न था।
क्यों किसी पे भी लुटा दे यूँ सुधा इस जान को,
दिल को मेरे समझे तुम सा हमनवा कोई न था।
हया से सर झुका लेना अदा से मुस्कुरा देना
हसीनों को भी कितना सहल है बिजली गिरा देना.
ये तर्ज़ एहसान करने का तुम्हीं को ज़ेब देता है
मरज़ में मुब्तला कर के मरीज़ों को दवा देनाबलाएँ लेते हैं उन की हम उन पर जान देते हैं
ये सौदा दीद के क़ाबिल है क्या लेना है क्या देनाख़ुदा की याद में महवियत-ए-दिल बादशाही है
मगर आसाँ नहीं है सारी दुनिया को भुला देना
Akbar Allahabadi