तुम मिले हो तो लगता है,
उम्र थम गई है और...
साल गुजर रहे हैं यूँ ही।
कुछ कलियाँ हैं अधखिलीं,
कोई महक बरकरार है यूँ ही।
उन बारिशों के पानी को,
कैद कर लिया था इन आँखों ने...
छलकने को है बेताब ये चश्म-ए-नम यूँ ही।
आशु तो कुछ भी नहीं आसूँ के सिवा, जाने क्यों लोग इसे पलकों पे बैठा लेते हैं।
तुम मिले हो तो लगता है,
उम्र थम गई है और...
साल गुजर रहे हैं यूँ ही।
कुछ कलियाँ हैं अधखिलीं,
कोई महक बरकरार है यूँ ही।
उन बारिशों के पानी को,
कैद कर लिया था इन आँखों ने...
छलकने को है बेताब ये चश्म-ए-नम यूँ ही।
वो माथे का मतला हो कि होंठों के दो मिसरे
बचपन की ग़ज़ल ही मेरी महबूब रही है
हम दिल्ली भी हो आये हैं लाहौर भी घूमे
ऐ यार मगर तेरी गली तेरी गली है
~ बशीर बद्र
कभी महक की तरह हम गुलों से उड़ते हैं,
कभी धुएं की तरह पर्बतों से उड़ते हैं....
ये कैंचियां हमें उड़ने से खाक रोकेंगी,
के हम परों से नहीं हौंसलों से उड़ते हैं!
हमदर्द की तलाश में हरदम,
हमको सिर्फ दर्द मिला है...
कोई बढ़ा न पाया हमारे साथ कदम,
क्योंकि सब को हमारी शख़्सियत पर,
अच्छाईयों का गर्द मिला है...!
भीगी हुई आँखों का ये मंजर ना मिलेगा,घर छोड़कर मत जाओ कहीं घर ना मिलेगा,फिर याद बहुत आएगी जुल्फों की घनी छांव,जब धूप में शाया कोई सर पर ना मिलेगा,आँसू को कभी ओस का कतरा ना समझना ऐसा तुम्हें चाहत का समंदर ना मिलेगा!
वो अता करे तो शुक्र उसका
न दे तो मलाल नहीं
मेरे रब के फ़ैसले कमाल हैं
उन फ़ैसलों पे सवाल नहीं!
न आज लुत्फ़ कर इतना कि कल गुज़र न सके
वो रात जो कि तिरे गेसुओं की रात नहीं
ये आरज़ू भी बड़ी चीज़ है मगर हमदम
विसाल-ए-यार फ़क़त आरज़ू की बात नहीं
जिनसे मोहब्बत हो,
उनसे लड़ना भी तो होता है..
नोकझोंक और क्या,
प्यार का बढ़ना ही तो होता है।