Sunday, September 1, 2024

अश्रु छलक कर आज हमारे

 अश्रु छलक कर आज हमारे, जो गालों पर ठहरे हैं।

प्रतिनिधि हैं ये विरह व्यथा के, घाव बड़े ही गहरे हैं॥

अहरह अब नव घात हृदय पर, बेकल सुधियाँ करती हैं
एहसासों की लुटी चिंदिया, दीप द्वार नित धरती हैं।
हुआ स्वप्न में स्वप्न विखंडित, निलय प्रीति का सूना है।
पीड़ातप उपहार मिला जो, बढ़ता निशि-दिन दूना है॥

सूखे अधर नाम के तेरे, पढ़ते सतत ककहरे हैं।
अश्रु छलक कर आज हमारे, जो गालों पर ठहरे हैं॥

विगत चुंबनों के अंकन नित, सुमिरे हृदय वीथिका है।
अधराधर जो रच डाली थी, वो लयहीन गीतिका है॥
रोम-रोम पर विह्वल हो जो, छंद प्रणय थे रच डाले।
अश्रु बूँद हो व्याकुल उनको, स्मृतियों में खंगाले॥

अब तक अंकित वह मानस पर, सारे चित्र सुनहरे हैं।
अश्रु छलक कर आज हमारे, जो गालों पर ठहरे हैं॥

अटल हुई पीड़ा पर्वत सम, टूटे क्यों अनुबंध सभी।
दृश्य हुए सारे वह झूठे, जो देखे थे साथ कभी॥
श्वासें सारी तुझे समर्पित, कर दूँ गलियों हाटों में।
करूँ प्रीति का तर्पण जाकर, फिर गंगा के घाटों में॥

इन्द्रिय के सब तंतु रसायन, तुम बिन गूँंगे बहरे हैं।
अश्रु छलक कर आज हमारे, जो गालों पर ठहरे हैं॥


अनामिका सिंह 'अना'





तुमको निहारता हूँ सुबह से

 तुमको निहारता हूँ सुबह से ऋतम्बरा, 

अब शाम हो रही है मगर मन नहीं भरा। 

ख़रगोश बन के दौड़ रहे हैं तमाम ख़्वाब, 
फिरता है चाँदनी में कोई सच डरा-डरा। 

पौधे झुलस गए हैं मगर एक बात है, 
मेरी नज़र में अब भी चमन है हरा-भरा। 

लंबी सुरंग-सी है तेरी ज़िंदगी तो बोल, 
मैं जिस जगह खड़ा हूँ वहाँ है कोई सिरा। 

माथे पे रखके हाथ बहुत सोचते हो तुम, 
गंगा क़सम बताओ हमें क्या है माजरा। 

दुष्यंत क़ुमार

Friday, August 30, 2024

हम दीवानों की क्या हस्ती

हम दीवानों की क्या हस्ती, 

हैं आज यहाँ, कल वहाँ चले, 
मस्ती का आलम साथ चला, 
हम धूल उड़ाते जहाँ चले। 

आए बनकर उल्लास अभी, 
आँसू बनकर बह चले अभी, 
सब कहते ही रह गए, अरे, 
तुम कैसे आए, कहाँ चले? 

किस ओर चले? यह मत पूछो, 
चलना है, बस इसलिए चले, 
जग से उसका कुछ लिए चले, 
जग को अपना कुछ दिए चले, 

दो बात कही, दो बात सुनी; 
कुछ हँसे और फिर कुछ रोए। 
छककर सुख-दु:ख के घूँटों को 
हम एक भाव से पिए चले। 

हम भिखमंगों की दुनिया में, 
स्वच्छंद लुटाकर प्यार चले, 
हम एक निसानी-सी उर पर, 
ले असफलता का भार चले। 

अब अपना और पराया क्या? 
आबाद रहें रुकने वाले! 
हम स्वयं बँधे थे और स्वयं 
हम अपने बंधन तोड़ चले। 


Bhagwaticharan Verma 

इस जगह प्यार करना मना है

लिख दिया अपने दर पे किसी ने इस जगह प्यार करना मना है
प्यार अगर हो भी जाए किसी को उस का इज़हार करना मना है

उन की महफ़िल में जब कोई जाए पहले नज़रें वो अपनी झुकाए
वो सनम जो ख़ुदा बन गए हैं उन का दीदार करना मना है

जाग उट्ठे तो आहें भरेंगे हुस्न वालों को रुस्वा करेंगे
सो गए हैं जो फ़ुर्क़त के मारे उन को बेदार करना मना है

हम ने की अर्ज़ ऐ बंदा-पर्वर क्यूँ सितम ढा रहे हो यूँ हम पर
बात सुन कर हमारी वो बोले हम से तकरार करना मना है

सामने जो खुला है झरोका खा न जाना 'क़तील' उन का धोका
अब भी अपने लिए उस गली में शौक़-ए-दीदार करना मना है
क़तील शिफाई

Wednesday, July 31, 2024

बच्चों को छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो

बच्चों को  छोटे  हाथों  को  चाँद  सितारे  छूने  दो,

चार किताबों  पढ़  कर  ये  भी  हम  जैसे  हो  जायेंगे.


उड़ने  दो  परिंदो  को  अभी  शोख  हवा  में ,

फिर  लौट  के  बचपन  के  ज़माने  नहीं आते। 


मेरे रोने का जिस में किस्सा है,

उम्र का बेहतरीन हिस्सा है। 


मेरा बचपन भी साथ ले आया,

गांव से जब भी आ गया कोई। 


फ़रिश्ते आकर उनके जिस्म पर खुशबू लगाते हैं,

वो बच्चे रेल के डिब्बों में जो झाड़ू लगाते है। 


दुआएं याद करा दी गई थी बचपन में,

सो ज़ख्म खाते रहे और दुआ दिए गए हम। 


किताबों से निकल कर तितलियाँ ग़ज़लें सुनाती है,

टिफिन रखती ही मेरी माँ तो बस्ता मुस्कुराता है। 


हर शहर से है प्यारा वो शहर मुझ को,

जहाँ से देखा था पहली बार आसमान मैंने। 


हम तो बचपन में भी अकेले थे,

सिर्फ दिल की गली में खेले थे। 


जिंदगी एक फन है

जिंदगी एक फन है लम्हों को,  

अपने अंदाज़ से गवांने का। 


तेरे आने की जब खबर महके,

तेरी खुशबू से सारा घर महके। 


जाने कितने लोग शामिल थे मेरी तख़लीक़ में,

मैं तो बस अल्फ़ाज़ में था शायरी में कौन था। 


अपने होने का कुछ एहसास न होने से हुआ,

खुद से मिलना मेरा एक शख्स के खोने से हुआ। 






मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी

 कहाँ आँसुओं की ये सौग़ात होगी

नए लोग होंगे नई बात होगी

मैं हर हाल में मुस्कुराता रहूँगा
तुम्हारी मोहब्बत अगर साथ होगी

चराग़ों को आँखों में महफ़ूज़ रखना
बड़ी दूर तक रात ही रात होगी

परेशाँ हो तुम भी परेशाँ हूँ मैं भी
चलो मय-कदे में वहीं बात होगी

चराग़ों की लौ से सितारों की ज़ौ तक
तुम्हें मैं मिलूँगा जहाँ रात होगी 

जहाँ वादियों में नए फूल आए
हमारी तुम्हारी मुलाक़ात होगी 

सदाओं को अल्फ़ाज़ मिलने न पाएँ 
न बादल घिरेंगे न बरसात होगी 

मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी 
Bashir Badra

Tuesday, July 23, 2024

वो चुप-चाप आँसू बहाने की रातें


वो चुप-चाप आँसू बहाने की रातें
वो इक शख़्स के याद आने की रातें

शब-ए-मह की वो ठंडी आँचें वो शबनम
तिरे हुस्न के रस्मसाने की रातें

जवानी की दोशीज़गी का तबस्सुम
गुल-ए-ज़ार के वो खिलाने की रातें

फुवारें सी नग़्मों की पड़ती हों जैसे
कुछ उस लब के सुनने-सुनाने की रातें

मुझे याद है तेरी हर सुब्ह-ए-रुख़्सत
मुझे याद हैं तेरे आने की रातें

पुर-असरार सी मेरी अर्ज़-ए-तमन्ना
वो कुछ ज़ेर-ए-लब मुस्कुराने की रातें

सर-ए-शाम से रतजगा के वो सामाँ
वो पिछले पहर नींद आने की रातें

सर-ए-शाम से ता-सहर क़ुर्ब-ए-जानाँ
न जाने वो थीं किस ज़माने की रातें

सर-ए-मय-कदा तिश्नगी की वो क़स्में
वो साक़ी से बातें बनाने की रातें

हम-आग़ोशियाँ शाहिद-ए-मेहरबाँ की
ज़माने के ग़म भूल जाने की रातें

'फ़िराक़' अपनी क़िस्मत में शायद नहीं थे
ठिकाने के दिन या ठिकाने की रातें


फ़िराक़ गोरखपुरी

Wednesday, July 10, 2024

अब हमारा साथ जीवनभर निभाना है तुम्हें

अब हमारा साथ जीवनभर निभाना है तुम्हें


प्रीत  का  साया  बनोगी,  हाँ  यही वादा करो
प्रेम  की  काया  बनोगी,  हाँ  यही  वादा करो
जब हमारा तन दुखों की धूप में ले सिसकियाँ
सिर्फ़  तुम  छाया  बनोगी, हाँ यही वादा करो

प्रेम का, सद्भावना का, पुल बनाना है तुम्हें ।

प्यार की  अठखेलियों से,  मुँह कभी मत मोड़ना
जो क़सम खाई मिलन की, वो कभी मत तोड़ना
घोर   तम   की  यामिनी  यदि  राह  में घेरे कभी
छोड़  दे  दुनिया  हमारा  साथ, तुम मत छोड़ना

भाल पर सम्मान का कुंकुम लगाना है तुम्हें ।

हम तुम्हें  उम्मीद  से  बढ़कर  निभाते  जायंगे
हर समस्या को प्रणय की सेज पर सुलझायंगे
नींद  जब  देगी  निमंत्रण  नैन  में आकर तुम्हें
हम  तुम्हारे  कुंतलों  को  प्यार  से  सहलायंगे

वर्णमाला को भरम की, नित भुलाना है तुम्हें ।

मैं ठहरा नहीं हूँ

 यारो ठोकरें खा कर भी, मैं ठहरा नहीं हूँ

रस्ते भले ही अजीब हैं, मैं भटका नहीं हूँ

ये आंधियां ये ज़लज़ले आते रहेंगे रोज़ ही,
पर उड़ा न पाएंगे मुझे, मैं तिनका नहीं हूँ

मुझे हर तरफ से घेर लेती हैं पुरानी यादें,
लोगों को ज़रा कह दो, कि मैं तन्हा नहीं हूँ

मेरे दिल में डोलते हैं जाने कितने फ़साने,
ज़रा यार भी समझ लें, कि मैं बदला नहीं हूँ

जाता हूँ जिधर भी सुनाई पड़ता है शोरगुल,
इन शरीफों से ज़रा कह दो, मैं बहरा नहीं हूँ

सच है कि मेरे दिल पे बोझ ज्यादा है 
पर दुनिया ये समझ ले, कि मैं बहका नहीं हूँ