Thursday, May 25, 2023

सच है विपत्ति जब आती है

सच है विपत्ति जब आती है

कायर को ही दहलाती है

सूरमा नहीं विचलित होते

क्षण एक नहीं धीरज खोते,

विघ्नों को गले लगाते हैं

काँटों में राह बनाते हैं।


है कौन विघ्न ऐसा जग में

टिक सके आदमी के मन में,

खम ठोंक ठेलता है जब नर

पर्वत के जाते पाँव उखड़,

मानव जब जोर लगाता है

पत्थर पानी बन जाता है।


गुण बड़े एक से एक प्रखर

हैं छिपे मानवों के भीतर,

मेंहदी में जैसे लाली हो

वर्तिका बीच उजियाली हो,

बत्ती जो नहीं जलाता है

रोशनी नहीं वह पाता है।


रामधारी सिंह ‘दिनकर’

हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा

न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा

हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा


-राहत इंदौरी  

सहर शायरी

raat aa kar guzar bhi jaati hai

ik hamaari sahar nahin hoti

~Ibn-e-Insha


अपनी भी ज़िंदगी में वो मुक़ाम आएगा

हम सहर पे निकलेंगे और शाम आएगा 


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Gham-e-hasti ka 'asad' kis se ho juz marg ilaaj 

Sham'a har rang mei jalti hai sahar hone tak 


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तन्हाई से लिपटी हुई ख़ामोश सियाह रात

 इस आस में बैठी है कि आएगी सहर भी

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सहर है जो रोज झूटे ख़्वाब दिखाती है

और शाम रोज इंतज़ार में कट जाती है  


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ये दाग़ दाग़ उजाला , ये शब ग़ज़ीदा सहर

वो इंतिज़ार था जिसका ये वो सहर तो नहीं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़


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शब-ए-इंतिज़ार की कश्मकश में न पूछ कैसे सहर हुई

कभी इक चराग़ जला दिया कभी इक चराग़ बुझा दिया

मजरूह सुल्तानपुरी


रोज़ कहते हैं आप आज नहीं

दाग़ देहलवी


इस नहीं का कोई इलाज नहीं  

रोज़  कहते हैं आप आज नहीं   








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धूप तो धूप है इसकी शिकायत कैसी

धूप तो धूप है इसकी शिकायत कैसी

अबकी बरसात मे कुछ पेड़ लगाना साहब

उनकी फ़रमाइश हुई है, इसको दोबारा कहे

हो चुकी जब ख़त्म अपनी ज़िंदगी की दास्ताँ,

उनकी  फ़रमाइश हुई है, इसको दोबारा कहे.

मुहब्बत एक तरफ है उससे झगड़ा एक तरफ

वह लड़कर भी सो जाए तो उसका माथा चूमूं मैं,

उससे मुहब्बत एक तरफ है उससे झगड़ा एक तरफ।


आज तक सुलगते हैं ज़ख़्म रहगुज़ारों के

इस तरफ़ से गुज़रे थे क़ाफ़िले बहारों के,

आज तक सुलगते हैं ज़ख़्म रहगुज़ारों के  

ख़ल्वतों के शैदाई ख़ल्वतों में खुलते हैं  
हम से पूछ कर देखो राज़ पर्दा-दारों के  

गेसुओं की छाँव में दिल-नवाज़ चेहरे हैं  
या हसीं धुँदलकों में फूल हैं बहारों के  

पहले हँस के मिलते हैं फिर नज़र चुराते हैं  
आश्ना-सिफ़त हैं लोग अजनबी दयारों के 

तुम ने सिर्फ़ चाहा है हम ने छू के देखे हैं 
पैरहन घटाओं के जिस्म बर्क़-पारों के 

शुग़्ल-ए-मय-परस्ती गो जश्न-ए-ना-मुरादी था 
यूँ भी कट गए कुछ दिन तेरे सोगवारों के 

Sahir Ludhianvi

तुझे सोचते रहना ज़रूरत है मेरी

बात दिल की है इसलिए इजाज़त है मेरी,

हाँ तुझे सोचते रहना ज़रूरत है मेरी । 

Wednesday, May 24, 2023

सौभाग्य न सब दिन सोता है

वर्षों तक वन में घूम-घूम

बाधा-विघ्नों को चूम-चूम

सह धूप-घाम, पानी-पत्थर

पांडव आये कुछ और निखर

सौभाग्य न सब दिन सोता है

देखें, आगे क्या होता है

                                       

रामधारी सिंह दिनकर