Friday, May 28, 2021

मिट्टी शायरी

मिट्टी की आवाज़ सुनी जब मिट्टी ने
सांसों की सब खींचा-तानी ख़त्म हुई
- नज़र जावेद


भीगी मिट्टी की महक प्यास बढ़ा देती है
दर्द बरसात की बूंदों में बसा करता है
- मरग़ूब अली 

मिट्टी का बदन कर दिया मिट्टी के हवाले
मिट्टी को कहीं ताज-महल में नहीं रक्खा
- मुनव्वर राना 


मैं तो चाक पे कूज़ा-गर के हाथ की मिट्टी हूं
अब ये मिट्टी देख खिलौना कैसे बनती है
- ज़ेब ग़ौरी

मिट्टी में कितने फूल पड़े सूखते रहे
रंगीन पत्थरों से बहलता रहा हूं मैं
- असग़र मेहदी होश


मिट्टी पर उंगली से मिट्टी लिख देना
मैं ने अपना दिल बहलाना सीख लिया
- मुक़द्दस मालिक 

सुब्ह मिट्टी है शाम है मिट्टी
या'नी अपना मक़ाम है मिट्टी
- आसिम तन्हा


मिट्टी से कुछ ख़्वाब उगाने आया हूं
मैं धरती का गीत सुनाने आया हूं 
- नज़ीर क़ैसर

कोई ख़ुश्बू मिट्टी से आने लगी है
ज़मीं पर वो बूंदें गिराने लगी है
- साइमा जबीं महक


मिट्टी पे कोई नक़्श भी उभरा न रहेगा
गिर जाएगी दीवार तो साया न रहेगा
- नज़ीर क़ैसर

एक-दूसरे को बिना जाने पास-पास होना

एक-दूसरे को बिना जाने
पास-पास होना
और उस संगीत को सुनना
जो धमनियों में बजता है,
उन रंगों में नहा जाना
जो बहुत गहरे चढ़ते-उतरते हैं ।

शब्दों की खोज शुरु होते ही
हम एक-दूसरे को खोने लगते हैं
और उनके पकड़ में आते ही
एक-दूसरे के हाथों से
मछली की तरह फिसल जाते हैं ।

हर जानकारी में बहुत गहरे
ऊब का एक पतला धागा छिपा होता है,
कुछ भी ठीक से जान लेना
खुद से दुश्मनी ठान लेना है ।

कितना अच्छा होता है
एक-दूसरे के पास बैठ खुद को टटोलना,
और अपने ही भीतर
दूसरे को पा लेना ।

 : सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 

तुम सच हो बाक़ी जो है फ़साना है और बस


मिलना न मिलना एक बहाना है और बस 
तुम सच हो बाक़ी जो है फ़साना है और बस 

लोगों को रास्ते की ज़रूरत है और मुझे 
इक संग-ए-रहगुज़र को हटाना है और बस 

मसरूफ़ियत ज़ियादा नहीं है मिरी यहाँ 
मिट्टी से इक चराग़ बनाना है और बस 

सोए हुए तो जाग ही जाएँगे एक दिन 
जो जागते हैं उन को जगाना है और बस 
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तुम वो नहीं हो जिन से वफ़ा की उम्मीद है 
तुम से मिरी मुराद ज़माना है और बस 

फूलों को ढूँडता हुआ फिरता हूँ बाग़ में 
बाद-ए-सबा को काम दिलाना है और बस 

आब ओ हवा तो यूँ भी मिरा मसअला नहीं 
मुझ को तो इक दरख़्त लगाना है और बस 
नींदों का रत-जगों से उलझना यूँही नहीं 
इक ख़्वाब-ए-राएगाँ को बचाना है और बस 

इक वादा जो किया ही नहीं है अभी 'सलीम' 
मुझ को वही तो वादा निभाना है और बस 

Thursday, May 27, 2021

हंसो तो साथ हंसेंगी दुनिया बैठ अकेले रोना होगा

हंसो तो साथ हंसेंगी दुनिया बैठ अकेले रोना होगा
चुपके चुपके बहा कर आंसू दिल के दुख को धोना होगा

बैरन रीत बड़ी दुनिया की आंख से जो भी टपका मोती
पलकों ही से उठाना होगा पलकों ही से पिरोना होगा

खोने और पाने का जीवन नाम रखा है हर कोई जाने
उस का भेद कोई न देखा क्या पाना क्या खोना होगा

बिन चाहे बिन बोले पल में टूट फूट कर फिर बन जाए
बालक सोच रहा है अब भी ऐसा कोई खिलौना होगा

प्यारों से मिल जाएं प्यारे अनहोनी कब होनी होगी
कांटे फूल बनेंगे कैसे कब सुख सेज बिछौना होगा

बहते बहते काम न आए लाख भंवर तूफ़ानी-सागर
अब मंजधार में अपने हाथों जीवन नाव डुबोना होगा

जो भी दिल ने भूल में चाहा भूल में जाना हो के रहेगा
सोच सोच कर हुआ न कुछ भी आओ अब तो खोना होगा

क्यूं जीते-जी हिम्मत हारें क्यूं फ़रियादें क्यूं ये पुकारें
होते होते हो जाएगा आख़िर जो भी होना होगा

'मीरा-जी' क्यूं सोच सताए पलक पलक डोरी लहराए
क़िस्मत जो भी रंग दिखाए अपने दिल में समोना होगा

बेपनाह हुस्न


तुझको नज़रों ने देखा है मेरी, 
लबों से तारीफ़ कैसे करूं.

निगाहों में जो क़ैद है अक्स तेरा, 
उसे लफ़्ज़ों में बयाँ कैसे करूँ. 

तेरे लबों में सिमटे हैं जो सुर्ख़ गुलाब, 
उन्हें छूने की हसरत होती है बार बार. 

तेरी पलकों में रखा है मैंने सावन, 
उसमें भीगने को बेक़रार है मेरा तन मन. 

तेरे रुखसार पे खिला है ये जो मख़मली चाँद का नूर, आईने में तू भी इसे एक बार देखना जरूर. 

बेपनाह हुस्न की तू ही तो है मल्लिका, 
हो जाएगा तुझे ख़ुद पर ही गुरुर! 

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जीवन मुझ से मैं जीवन से शरमाता हूं

जीवन मुझ से मैं जीवन से शरमाता हूं
मुझ से आगे जाने वालो में आता हूं

जिन की यादों से रौशन हैं मेरी आंखें
दिल कहता है उन को भी मैं याद आता हूं

सुर से सांसों का नाता है तोड़ूं कैसे
तुम जलते हो क्यूं जीता हूं क्यूं गाता हूं

तुम अपने दामन में सितारे बैठ कर टांको
और मैं नए बरन लफ़्ज़ों को पहनाता हूं

जिन ख़्वाबों को देख के मैं ने जीना सीखा
उन के आगे हर दौलत को ठुकराता हूं

ज़हर उगलते हैं जब मिल कर दुनिया वाले
मीठे बोलों की वादी में खो जाता हूं

'जालिब' मेरे शेर समझ में आ जाते हैं
इसी लिए कम-रुत्बा शाएर कहलाता हूं

Monday, May 24, 2021

मजरूह सुल्तानपुरी शायरी



मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर
लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया 


देख ज़िंदां से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार
रक़्स करना है तो फिर पांव की ज़ंजीर न देख 

कोई हम-दम न रहा कोई सहारा न रहा
हम किसी के न रहे कोई हमारा न रहा


शब-ए-इंतिज़ार की कश्मकश में न पूछ कैसे सहर हुई
कभी इक चराग़ जला दिया कभी इक चराग़ बुझा दिया 

बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए
हम एक बार तिरी आरज़ू भी खो देते


अब सोचते हैं लाएंगे तुझ सा कहां से हम
उठने को उठ तो आए तिरे आस्तां से हम 

कुछ बता तू ही नशेमन का पता
मैं तो ऐ बाद-ए-सबा भूल गया


मुझे ये फ़िक्र सब की प्यास अपनी प्यास है साक़ी
तुझे ये ज़िद कि ख़ाली है मिरा पैमाना बरसों से 

तुझे न माने कोई तुझ को इस से क्या मजरूह
चल अपनी राह भटकने दे नुक्ता-चीनों को 

यही है मौक़ा-ए-इज़हार आओ सच बोलें: क़तील शिफ़ाई

यही है मौक़ा-ए-इज़हार आओ सच बोलें: क़तील शिफ़ाई

खुला है झूट का बाज़ार आओ सच बोलें 
न हो बला से ख़रीदार आओ सच बोलें 

सुकूत छाया है इंसानियत की क़द्रों पर 
यही है मौक़ा-ए-इज़हार आओ सच बोलें 

हमें गवाह बनाया है वक़्त ने अपना 
ब-नाम-ए-अज़्मत-ए-किरदार आओ सच बोलें 

सुना है वक़्त का हाकिम बड़ा ही मुंसिफ़ है 
पुकार कर सर-ए-दरबार आओ सच बोलें 
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तमाम शहर में क्या एक भी नहीं मंसूर 
कहेंगे क्या रसन-ओ-दार आओ सच बोलें 

बजा कि ख़ू-ए-वफ़ा एक भी हसीं में नहीं 
कहाँ के हम भी वफ़ादार आओ सच बोलें 

जो वस्फ़ हम में नहीं क्यूँ करें किसी में तलाश 
अगर ज़मीर है बेदार आओ सच बोलें 
छुपाए से कहीं छुपते हैं दाग़ चेहरे के 
नज़र है आइना-बरदार आओ सच बोलें 

'क़तील' जिन पे सदा पत्थरों को प्यार आया 
किधर गए वो गुनहगार आओ सच बोलें 

जिगर और दिल को बचाना भी हैनज़र आप ही से मिलाना भी है

जिगर और दिल को बचाना भी है
नज़र आप ही से मिलाना भी है

मोहब्बत का हर भेद पाना भी है
मगर अपना दामन बचाना भी है

जो दिल तेरे ग़म का निशाना भी है
क़तील-ए-जफ़ा-ए-ज़माना भी है

ये बिजली चमकती है क्यूं दम-ब-दम
चमन में कोई आशियाना भी है

ख़िरद की इताअत ज़रूरी सही
यही तो जुनूं का ज़माना भी है

न दुनिया न उक़्बा कहां जाइए
कहीं अहल-ए-दिल का ठिकाना भी है

मुझे आज साहिल पे रोने भी दो
कि तूफ़ान में मुस्कुराना भी है

ज़माने से आगे तो बढ़िए 
ज़माने को आगे बढ़ाना भी है 

Sunday, May 16, 2021

आ गई याद शाम ढलते ही

 आ गई याद शाम ढलते ही

बुझ गया दिल चराग़ जलते ही 


खुल गए शहर-ए-ग़म के दरवाज़े 
इक ज़रा सी हवा के चलते ही 

कौन था तू कि फिर न देखा तुझे 
मिट गया ख़्वाब आँख मलते ही 

ख़ौफ़ आता है अपने ही घर से 
माह-ए-शब-ताब के निकलते ही

तू भी जैसे बदल सा जाता है 
अक्स-ए-दीवार के बदलते ही 

ख़ून सा लग गया है हाथों में 
चढ़ गया ज़हर गुल मसलते ही