Tuesday, June 30, 2020

असुलझे सवालों सी हो गयी है ज़िन्दगी।

मकड़ी के जालों सी हो गयी है ज़िन्दगी ,

असुलझे सवालों सी हो गयी है ज़िन्दगी।

संतुष्टि से सिवा सब कुछ मिल रहा है यहाँ,

फिर भी उलझनों के जंजालों सी हो गयी है ज़िन्दगी।

क्या करें, क्या न करें? इसी में उलझ के रह गये;

ये खुश रहे, वो बुरा ना माने; इसी में फंस के रह गये।

समाज के नियमों ने इस कदर जकड़ा है हमें,

कि आधार बिना ईमारत सी हो गयी है ज़िन्दगी।

हर एक को खुश रखना मुमकिन नहीं यहाँ,

पर अब अंतर्मन की ध्वनि इंसान सुनता है कहाँ।

इसी उम्मीद में वर्तमान को जलाकर कर रहे हैं रोशनी,

कि आज थोड़ा सह ले कल जी लेंगे ज़िन्दगी।।

पर क्या वो कल आएगा???

कल भी तो फिर वर्तमान बन जायेगा! 

नज़र भर देख लूँ तुम्हें तो

नज़र भर देख लूँ तुम्हें तो उस नज़र से प्यार हो जाता है, 
वो एक नज़र तुम्हारी जिस कि नज़र मेरा प्यार हो जाता है! 
नज़र को नज़र में नज़रबन्द कर लो, 
कमबख्त इसे हर नज़र में प्यार हो जाता है|

बारिश शायरी

शायद कोई ख्वाहिश रोटी रहती है, 
मेरे अन्दर बारिश होती रहती है! 
-Faraj 

याद आई वो पहली बारिश
जब तुझे एक नज़र देखा था
- नासिर काज़मी

उस ने बारिश में भी खिड़की खोल के देखा नहीं
भीगने वालों को कल क्या क्या परेशानी हुई
- जमाल एहसानी

उस को आना था कि वो मुझ को बुलाता था कहीं
रात भर बारिश थी उस का रात भर पैग़ाम था
- ज़फ़र इक़बाल

टूट पड़ती थीं घटाएँ जिन की आँखें देख कर
वो भरी बरसात में तरसे हैं पानी के लिए
- सज्जाद बाक़र रिज़वी

साथ बारिश में लिए फिरते हो उस को 'अंजुम'
तुम ने इस शहर में क्या आग लगानी है कोई
- अंजुम सलीमी

मैं वो सहरा जिसे पानी की हवस ले डूबी 
तू वो बादल जो कभी टूट के बरसा ही नहीं 
- सुल्तान अख़्तर

अब भी बरसात की रातों में बदन टूटता है 
जाग उठती हैं अजब ख़्वाहिशें अंगड़ाई की 
- परवीन शाकिर

टूट पड़ती थीं घटाएँ जिन की आँखें देख कर 
वो भरी बरसात में तरसे हैं पानी के लिए 
- सज्जाद बाक़र रिज़वी

बरसात के आते ही तौबा न रही बाक़ी 
बादल जो नज़र आए बदली मेरी नीयत भी 
- हसरत मोहानी

दूर तक छाए थे बादल और कहीं साया न था 
इस तरह बरसात का मौसम कभी आया न था 
- क़तील शिफ़ाई

बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने 
किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है 
- निदा फ़ाज़ली

याद आई वो पहली बारिश 
जब तुझे एक नज़र देखा था 
- नासिर काज़मी

Monday, June 29, 2020

अमृता प्रीतम की प्रेम कविता: ऐ मेरे दोस्त ! मेरे अजनबी !

ऐ मेरे दोस्त ! मेरे अजनबी !
एक बार अचानक – तू आया
वक़्त बिल्कुल हैरान
मेरे कमरे में खड़ा रह गया।
साँझ का सूरज अस्त होने को था,
पर न हो सका
और डूबने की क़िस्मत वो भूल-सा गया...
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फिर आदि के नियम ने एक दुहाई दी,
और वक़्त ने उन खड़े क्षणों को देखा
और खिड़की के रास्ते बाहर को भागा...

वह बीते और ठहरे क्षणों की घटना 
अब तुझे भी बड़ा आश्चर्य होता है
और मुझे भी बड़ा आश्चर्य होता है
और शायद वक़्त को भी
फिर वह ग़लती गवारा नहीं

अब सूरज रोज वक़्त पर डूब जाता है
और अँधेरा रोज़ मेरी छाती में उतर आता है...
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पर बीते और ठहरे क्षणों का एक सच है-
अब तू और मैं मानना चाहें या नहीं
यह और बात है।
पर उस दिन वक़्त
जब खिड़की के रास्ते बाहर को भागा
और उस दिन जो खून
उसके घुटनों से रिसा
वह खून मेरी खिड़की के नीचे
अभी तक जमा हुआ है...

हरिवंशराय बच्चन की कविताएँ

हरिवंशराय बच्चन:
तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों का निमंत्रण 


   1-
रात का अंतिम प्रहर है,
झिलमिलाते हैं सितारे ,
वक्ष पर युग बाहु बाँधे
मैं खड़ा सागर किनारे,
         वेग से बहता प्रभंजन
         केश पट मेरे उड़ाता,
    शून्य में भरता उदधि -
    उर की रहस्यमयी पुकारें;
इन पुकारों की प्रतिध्वनि 
हो रही मेरे हृदय में,
है प्रतिच्छायित जहाँ पर 
सिंधु का हिल्लोल कंपन 
तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
आज लहरों में निमंत्रण !
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2-

विश्व की संपूर्ण पीड़ा
सम्मिलित हो रो रही है,
शुष्क पृथ्वी आंसुओं से 
पाँव अपने धो रही है,
          इस धरा पर जो बसी दुनिया 
          यही अनुरूप उनके-
    इस व्यथा से हो न विचलित 
    नींद सुख की सो रही है;
क्यों धरनि अब तक न गलकर
लीन जलनिधि में हो गई हो ?
देखते क्यों नेत्र कवि के
भूमि पर जड़-तुल्य जीवन ?
तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
आज लहरों में निमंत्रण !
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 3-

  जर जगत में वास कर भी 
  जर नहीं व्यवहार कवि का,
  भावनाओं से विनिर्मित
  और ही संसार कवि का,
         बूँद से उच्छवास को भी 
         अनसुनी करता नहीं वह
किस तरह होती उपेक्षा -
पात्र पारावार कवि का ,
  विश्व- पीड़ा से , सुपरिचित
  हो तरल बनने, पिघलने ,
  त्याग कर आया यहाँ कवि
  स्वप्न-लोकों के प्रलोभन 
  तीर पर कैसे रुकूं मैं,
  आज लहरों में निमंत्रण ! 
 4-

  जिस तरह मरु के ह्रदय में
  है कहीं लहरा रहा सर ,
  जिस तरह पावस- पवन में
  है पपीहे का छुपा स्वर ,
         जिस तरह से अंश्रु- आहों से
         भरी कवि की निशा में 
नींद की परियां बनातीं
कल्पना का लोक सुखकर,
  सिंधु के इस तीव्र हा हा-
  कर ने , विश्वास मेरा ,
  है छिपा रक्खा कहीं पर
  एक रस-परिपूर्ण गायन
  तीर पर कैसे रुकूं मैं 
  आज लहरों में निमंत्रण !
  5-

  नेत्र सहसा आज मेरे
  तम पटल के पार जाकर 
  देखते हैं रत्न- सीपी से
  बना प्रासाद सुंदर ,
         है जिसमें उषा ले 
         दीप कुंचित रश्मियों का ;
ज्योति में जिसकी सुनहली 
सिंधु कन्याएँ मनोहर
  गूढ़ अर्थों से भरी मुद्रा
  बनाकर गान करतीं
  और करतीं अति अलौकिक
  ताल पर उन्मत्त नर्तन 
  तीर पर कैसे रुकूं मैं
  आज लहरों में निमंत्रण !
 
 6-

  मौन हो गन्धर्व बैठे 
  कर स्रवन इस गान का स्वर,
  वाद्य - यंत्रों पर चलाते 
  हैं नहीं अब हाथ किन्नर,
         अप्सराओं के उठे जो 
         पग उठे ही रह गए हैं,
कर्ण उत्सुक, नेत्र अपलक 
साथ देवों के पुरंदर
  एक अदभुत और अविचल
  चित्र- सा है जान पड़ता,
  देव- बालाएँ विमानों से 
  रहीं कर पुष्प- वर्षण
  तीर पर कैसे रुकूं मैं,
  आज लहरों में निमंत्रण !
7-

  दीर्घ उर में भी जलधि के 
  है नहीं खुशियां समाती,
  बोल सकता कुछ न उठती
  फूल बारंबार छाती,
         हर्ष रत्नागार अपना 
         कुछ दिखा सकता जगत को 
भावनाओं से भरी यदि
यह फफककर फूट जाती;
  सिंधु जिस पर गर्व करता 
  और जिसकी अर्चना को 
  स्वर्ग झुकता, क्यों न उसके 
  प्रति करे कवि अर्ध्य अर्पण 
  तीर पर कैसे रुकूं मैं,
  आज लहरों में निमंत्रण !
 8-

   आज अपने स्वप्न को मैं 
   सच बनाना चाहता हूँ ,
   दूर कि इस कल्पना के 
   पास जाना चाहता हूँ
         चाहता हूँ तैर जाना 
         सामने अंबुधि पड़ा जो ,
कुछ विभा उस पार की
इस पार लाना चाहता हूँ;
   स्वर्ग के भी स्वप्न भू पर 
   देख उनसे दूर ही था,
   किंतु पाऊँगा नहीं कर 
   आज अपने पर नियंत्रण .
   तीर पर कैसे रुकूं मैं ,
   आज लहरों में निमंत्रण !
 9-

   लौट आया यदि वहाँ से 
   तो यहाँ नवयुग लगेगा ,
   नव प्रभाती गान सुनकर 
   भाग्य जगती का जागेगा ,
          शुष्क जड़ता शीघ्र बदलेगी 
          सरस चैतन्यता में ,
यदि न पाया लौट , मुझको 
लाभ जीवन का मिलेगा;
   पर पहुँच ही यदि न पाया 
   व्यर्थ क्या प्रस्थान होगा?
कर सकूंगा विश्व में फिर 
भी नए पथ का प्रदर्शन
तीर पर कैसे रुकूं मैं ,
आज लहरों में निमंत्रण ! 
 10-

    स्थल गया है भर पथों से 
    नाम कितनों के गिनाऊँ,
    स्थान बाकी है कहाँ पथ
    एक अपना भी बनाऊं?
          विशव तो चलता रहा है 
          थाम राह बनी-बनाई,
किंतु इस पर किस तरह मैं 
कवि चरण अपने बढ़ाऊँ?
    राह जल पर भी बनी है 
    रूढ़ि पर, न हुई कभी वह,
    एक तिनका भी बना सकता 
    यहाँ पर मार्ग नूतन !
    तीर पर कैसे रुकूं मैं,
    आज लहरों में निमंत्रण !
11-

  देखता हूँ आँख के आगे 
    नया यह क्या तमाशा --
    कर निकलकर दीर्घ जल से 
    हिल रहा करता माना- सा 
            है हथेली मध्य चित्रित 
            नीर भग्नप्राय बेड़ा !
मैं इसे पहचानता हूँ ,
है नहीं क्या यह निराशा ?
    हो पड़ी उद्दाम इतनी 
    उर-उमंगें , अब न उनको 
    रोक सकता हाय निराशा का,
    न आशा का प्रवंचन.
    तीर पर कैसे रुकूं मैं ,
    आज लहरों में निमंत्रण !
12- 

    पोत अगणित इन तरंगों ने 
    डुबाए मानता मैं 
    पार भी पहुंचे बहुत से -
    बात यह भी जनता मैं ,
          किंतु होता सत्य यदि यह 
          भी, सभी जलयान डूबे,
पार जाने की प्रतिज्ञा 
आज बरबस ठानता मैं,
    डूबता मैं किंतु उतराता
    सदा व्यक्तित्व मेरा,
    हों युवक डूबे भले ही 
    है कभी डूबा न यौवन !
    तीर पर कैसे रुकूं मैं,
    आज लहरों में निमंत्रण !
13- 

    आ रहीं प्राची क्षितिज से 
    खींचने वाली सदाएं 
    मानवों के भाग्य निर्णायक 
    सितारों ! दो दुआएं ,
           नाव, नाविक फेर ले जा ,
           है नहीं कुछ काम इसका ,
आज लहरों से उलझने को 
फड़कती हैं भुजाएं, 
     प्राप्त हो उस पार भी इस 
     पार-सा चाहे अँधेरा ,
     प्राप्त हो युग की उषा 
     चाहे लुटाती नव किरण-धन
     तीर पर कैसे रुकूं मैं ,
     आज लहरों में निमंत्रण

मेरा दिन बीत जाता है।

सुबह की आँख लगना
मुझे बेहद पसंद है
काम-काज की दुनिया को
ये जिद कहाँ पसंद है
बिस्तर पर चादर की ओट में गुम
किसको रास नहीं
खुली आँखों से देखने को सपने
किसकी आस नहीं
नाश्ते में मनपसंद चीजों की फरमाइश न हो
तो क्या ही ठाठ रहे
ज़िंदगी की भागा दौड़ी में तो
सारे याद वो पाठ रहे
चाय की प्याली कब खाली हो
कौन ध्यान देता है
मेरे घर के बगीचे में अखबार
किसी कोने में रहता है
धीरे-धीरे सुबह से दुपहरिया आती है
धीमे से वो मेरे कमरे को नींद दे जाती है
फिर...
किसी यार की
किसी दिलदार की
याद लिए शाम पधारी है
पर,
मेरी ज़िंदगी उनके सामने कहाँ ही हारी है
अपनी बातों में तो बस ख़ुशियाँ ही होती है
गमों को बांटने की हिम्मत किसमें ही होती है
अब रातों का जागना शायद मेरा वक़्त है
ये वक़्त तो रुकता कहाँ, भागता हर वक़्त है
पर क्या ही सोचूं
अगले दिन की ही सोच लिए
मेरा दिन बीत जाता है।

नतीजा शायरी

नतीजा देखिए कुछ दिन में क्या से क्या निकल आया 
कहीं पे बीज बोया था कहीं पौधा निकल आया


मिरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा
इसी सियाह समुंदर से नूर निकलेगा
- अमीर क़ज़लबाश

रास्ता सोचते रहने से किधर बनता है
सर में सौदा हो तो दीवार में दर बनता है
-जलील आली

ऐ मौज-ए-बला उन को भी ज़रा दो चार थपेड़े हल्के से
कुछ लोग अभी तक साहिल से तूफ़ाँ का नज़ारा करते हैं
-मुईन अहसन जज़्बी

गुफ़्तुगू देर से जारी है नतीजे के बग़ैर 
इक नई बात निकल आती है हर बात के साथ 
-ऐतबार साजिद

ख़ूब नासेह की नसीहत का नतीजा निकला 
हम ने अश्कों को सँभाला तो कलेजा निकला 
-रहमत क़रनी

अपना ज़माना आप बनाते हैं अहल-ए-दिल
हम वो नहीं कि जिन को ज़माना बना गया
-जिगर मुरादाबादी

वफ़ा का लाज़मी था ये नतीजा
सज़ा अपने किए की पा रहा हूँ
- हफ़ीज़ जालंधरी

दिल के मुआमले में नतीजे की फ़िक्र क्या
आगे है इश्क़ जुर्म-ओ-सज़ा के मक़ाम से
- साहिर लुधियानवी

तुम जो पर्दे में सँवरते हो नतीजा क्या है
लुत्फ़ जब था कि कोई देखने वाला होता
- जलील मानिकपूरी
 
कहूँ कुछ उन से मगर ये ख़याल होता है
शिकायतों का नतीजा मलाल होता है
- क़मर बदायुनी

उठो ये मंज़र-ए-शब-ताब देखने के लिए
कि नींद शर्त नहीं ख़्वाब देखने के लिए
-इरफ़ान सिद्दीक़ी

गुमशुदगी ही अस्ल में यारो राह-नुमाई करती है
राह दिखाने वाले पहले बरसों राह भटकते हैं
-हफ़ीज़ बनारसी

जलाने वाले जलाते ही हैं चराग़ आख़िर
ये क्या कहा कि हवा तेज़ है ज़माने की
-जमील मज़हरी

वक़्त की गर्दिशों का ग़म न करो
हौसले मुश्किलों में पलते हैं
-महफूजुर्रहमान आदिल

आसान शायरी

कोई मुझ तक पहुंच नहीं पाता
इतना आसान है पता मेरा
- जौन एलिया


पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा
कितना आसान था इलाज मिरा
- फ़हमी बदायूंनी



सब आसान हुआ जाता है
मुश्किल वक़्त तो अब आया है
- शारिक़ कैफ़ी


हार दिया है उजलत में
ख़ुद को किस आसानी से
- हम्माद नियाज़ी

तुम न आसान को आसाँ समझो
वर्ना मुश्किल मिरी मुश्किल तो नहीं
- सख़ी लख़नवी


हर ग़म सहना और ख़ुश रहना
मुश्किल है आसान नहीं है
- वक़ार मानवी

कितना आसान था बचपन में सुलाना हम को
नींद आ जाती थी परियों की कहानी सुन कर
- भारत भूषण पन्त


ये जो मैं इतनी सहूलत से तुझे चाहता हूँ
दोस्त इक उम्र में मिलती है ये आसानी भी
- सऊद उस्मानी

तेरे दिल तक आऊँ मैं
इतनी तो आसानी रख
- अब्दुस्समद ’तपिश’


न देखा फिर आख़िर कि मुश्किल पड़ी
उधर देखना ऐसा आसान है
- मीर असर

वो फूल खिल के रहेंगे जो खिलने वाले हैं

हज़ार बर्क़ गिरे लाख आंधियाँ उट्ठें
वो फूल खिल के रहेंगे जो खिलने वाले हैं
- साहिर लुधियानवी

थमते थमते थमेंगे आंसू
रोना है कुछ हंसी नहीं है
- बुध सिंह कलंदर

जो कोई आवे है नज़दीक ही बैठे है तिरे
हम कहां तक तिरे पहलू से सरकते जावें
- मीर हसन

ये धूप तो हर रुख़ से परेशां करेगी
क्यूं ढूंढ़ रहे हो किसी दीवार का साया
- अतहर नफ़ीस

Saturday, June 27, 2020

घटा शायरी

क्या ख़बर कब बरस के टूट पड़े
हर तरफ़ ऐसी है घटा छाई
- इंद्र सराज़ी


लिपट जाते हैं वो बिजली के डर से
इलाही ये घटा दो दिन तो बरसे
- दाग़ देहलवी


मेरी दुनिया में समुंदर का कहीं नाम नहीं
फिर घटा फेंकती है मुझ पे ये पत्थर कैसे
- अशहर हाशमी


क्यूं न टूटे मिरी तौबा जो कहे तू साक़ी
पी ले पी ले अरे घनघोर घटा छाई है
- रियाज़ ख़ैराबादी


क्या मुसीबत है कि जिस दिन से छुटी मय-नोशी
दिल जलाने के लिए रोज़ घटा आती है
- जलील मानिकपूरी


कब से टहल रहे हैं गरेबान खोल कर
ख़ाली घटा को क्या करें बरसात भी तो हो
- आदिल मंसूरी

उसी के शेर सभी और उसी के अफ़्साने
उसी की प्यास का बादल घटा में आया है
- विशाल खुल्लर


किस ने भीगे हुए बालों से ये झटका पानी
झूम के आई घटा टूट के बरसा पानी
- आरज़ू लखनवी

धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो
- निदा फ़ाज़ली


जो घटा छा के न बरसे वो घटा क्या है घटा
हाँ अगर टूट के बरसे तो घटा कहते हैं
- कौसर सीवानी