Wednesday, August 27, 2025

बंदगी (शेर, शायरी)

 

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बंदगी हम ने छोड़ दी है 'फ़राज़'

क्या करें लोग जब ख़ुदा हो जाएँ

 

अहमद फ़राज़

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दिल है क़दमों पर किसी के सर झुका हो या न हो

बंदगी तो अपनी फ़ितरत है ख़ुदा हो या न हो

 

जिगर मुरादाबादी

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यही है ज़िंदगी अपनी यही है बंदगी अपनी

कि उन का नाम आया और गर्दन झुक गई अपनी

 

माहिर-उल क़ादरी

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क़ुबूल हो कि न हो सज्दा ओ सलाम अपना

तुम्हारे बंदे हैं हम बंदगी है काम अपना

 

मुबारक अज़ीमाबादी

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सिदक़-ओ-सफ़ा-ए-क़ल्ब से महरूम है हयात

करते हैं बंदगी भी जहन्नम के डर से हम

 

शकील बदायूनी

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शाहों की बंदगी में सर भी नहीं झुकाया

तेरे लिए सरापा आदाब हो गए हम

 

ताबिश देहलवी

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ख़ुलूस हो तो कहीं बंदगी की क़ैद नहीं

सनम-कदे में तवाफ़-ए-हरम भी मुमकिन है

 

मुज़्तर हैदरी

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मिल जाता है दो पल का सुकून, बंद आँखों की बंदगी में,

वरना थोड़ा-थोड़ा परेशां तो, हर शख़्स है अपनी जिंदगी में...!

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद

अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता

अकबर इलाहाबादी

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आग थे इब्तिदा-ए-इश्क़ में हम

अब जो हैं ख़ाक इंतिहा है ये

 

मीर तक़ी मीर

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बहार (शेर, शायरी)

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दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला

वही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला

 

अब उसे लोग समझते हैं गिरफ़्तार मिरा

सख़्त नादिम है मुझे दाम में लाने वाला

 

सुब्ह-दम छोड़ गया निकहत-ए-गुल की सूरत

रात को ग़ुंचा-ए-दिल में सिमट आने वाला

 

क्या कहें कितने मरासिम थे हमारे उस से

वो जो इक शख़्स है मुँह फेर के जाने वाला

 

तेरे होते हुए आ जाती थी सारी दुनिया

आज तन्हा हूँ तो कोई नहीं आने वाला

 

मुंतज़िर किस का हूँ टूटी हुई दहलीज़ पे मैं

कौन आएगा यहाँ कौन है आने वाला

 

क्या ख़बर थी जो मिरी जाँ में घुला है इतना

है वही मुझ को सर-ए-दार भी लाने वाला

 

मैं ने देखा है बहारों में चमन को जलते

है कोई ख़्वाब की ताबीर बताने वाला

 

तुम तकल्लुफ़ को भी इख़्लास समझते हो 'फ़राज़'

दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला

-अहमद फ़राज़

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बहार आए तो मेरा सलाम कह देना

मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने

 

कैफ़ी आज़मी

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मिरी ज़िंदगी पे न मुस्कुरा मुझे ज़िंदगी का अलम नहीं

जिसे तेरे ग़म से हो वास्ता वो ख़िज़ाँ बहार से कम नहीं

 

शकील बदायूनी

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मेरी आँखों में हैं आँसू तेरे दामन में बहार

गुल बना सकता है तू शबनम बना सकता हूँ मैं

 

नुशूर वाहिदी

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शग़ुफ़्तगी-ए-दिल-ए-कारवाँ को क्या समझे

वो इक निगाह जो उलझी हुई बहार में है

 

शकील बदायूनी

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जब से छूटा है गुलिस्ताँ हम से

रोज़ सुनते हैं बहार आई है

 

जलील मानिकपूरी

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ग़ुरूर से जो ज़मीं पर क़दम नहीं रखती

ये किस गली से नसीम-ए-बहार आती है

 

जलील मानिकपूरी

 

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तिनकों से खेलते ही रहे आशियाँ में हम

आया भी और गया भी ज़माना बहार का

 

फ़ानी बदायुनी

अश्क, आँसू (शेर, शायरी)

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क्या दुख है समुंदर को बता भी नहीं सकता

आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता

 

तू छोड़ रहा है तो ख़ता इस में तिरी क्या

हर शख़्स मिरा साथ निभा भी नहीं सकता

 

प्यासे रहे जाते हैं ज़माने के सवालात

किस के लिए ज़िंदा हूँ बता भी नहीं सकता

 

घर ढूँड रहे हैं मिरा रातों के पुजारी

मैं हूँ कि चराग़ों को बुझा भी नहीं सकता

 

वैसे तो इक आँसू ही बहा कर मुझे ले जाए

ऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नहीं सकता

 

-वसीम बरेलवी

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आँख कम-बख़्त से उस बज़्म में आँसू न रुका

एक क़तरे ने डुबोया मुझे दरिया हो कर

 

हफ़ीज़ जालंधरी

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एक आँसू भी हुकूमत के लिए ख़तरा है

तुम ने देखा नहीं आँखों का समुंदर होना

 

मुनव्वर राना

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मुद्दत के बा'द उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह

जी ख़ुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े

 

कैफ़ी आज़मी

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एक आँसू ने डुबोया मुझ को उन की बज़्म में

बूँद भर पानी से सारी आबरू पानी हुई

 

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

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शबनम ने रो के जी ज़रा हल्का तो कर लिया

ग़म उस का पूछिए जो न आँसू बहा सके

 

सलाम संदेलवी

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कोई मंज़िल नहीं मिलती तो ठहर जाते हैं

अश्क आँखों में मुसाफ़िर की तरह आते हैं

 

कफ़ील आज़र अमरोहवी 

Sunday, August 24, 2025

परवीन शाकिर (शेर, शायरी, ग़ज़ल)

कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उस ने

बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की


परवीन शाकिर

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वो मुझ को छोड़ के जिस आदमी के पास गया

बराबरी का भी होता तो सब्र आ जाता


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मैं सच कहूँगी मगर फिर भी हार जाऊँगी

वो झूट बोलेगा और ला-जवाब कर देगा

*

काँप उठती हूँ मैं ये सोच के तन्हाई में

मेरे चेहरे पे तिरा नाम न पढ़ ले कोई

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वो कहीं भी गया लौटा तो मिरे पास आया
बस यही बात है अच्छी मिरे हरजाई की

*

बहुत से लोग थे मेहमान मेरे घर लेकिन

वो जानता था कि है एहतिमाम किस के लिए

***

वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा

मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा


हम तो समझे थे कि इक ज़ख़्म है भर जाएगा

क्या ख़बर थी कि रग-ए-जाँ में उतर जाएगा


वो हवाओं की तरह ख़ाना-ब-जाँ फिरता है

एक झोंका है जो आएगा गुज़र जाएगा


वो जब आएगा तो फिर उस की रिफ़ाक़त के लिए

मौसम-ए-गुल मिरे आँगन में ठहर जाएगा


आख़िरश वो भी कहीं रेत पे बैठी होगी

तेरा ये प्यार भी दरिया है उतर जाएगा


मुझ को तहज़ीब के बर्ज़ख़ का बनाया वारिस

जुर्म ये भी मिरे अज्दाद के सर जाएगा

***

अक्स-ए-ख़ुशबू हूँ बिखरने से न रोके कोई
और बिखर जाऊँ तो मुझ को न समेटे कोई

काँप उठती हूँ मैं ये सोच के तन्हाई में
मेरे चेहरे पे तिरा नाम न पढ़ ले कोई

जिस तरह ख़्वाब मिरे हो गए रेज़ा रेज़ा
उस तरह से न कभी टूट के बिखरे कोई

मैं तो उस दिन से हिरासाँ हूँ कि जब हुक्म मिले
ख़ुश्क फूलों को किताबों में न रक्खे कोई

अब तो इस राह से वो शख़्स गुज़रता भी नहीं
अब किस उम्मीद पे दरवाज़े से झाँके कोई

कोई आहट कोई आवाज़ कोई चाप नहीं
दिल की गलियाँ बड़ी सुनसान हैं आए कोई

***

अब भला छोड़ के घर क्या करते
शाम के वक़्त सफ़र क्या करते

तेरी मसरूफ़ियतें जानते हैं
अपने आने की ख़बर क्या करते

जब सितारे ही नहीं मिल पाए
ले के हम शम्स-ओ-क़मर क्या करते

वो मुसाफ़िर ही खुली धूप का था
साए फैला के शजर क्या करते

ख़ाक ही अव्वल ओ आख़िर ठहरी
कर के ज़र्रे को गुहर क्या करते

राय पहले से बना ली तू ने
दिल में अब हम तिरे घर क्या करते

इश्क़ ने सारे सलीक़े बख़्शे
हुस्न से कस्ब-ए-हुनर क्या करते

***

बहुत रोया वो हम को याद कर के
हमारी ज़िंदगी बरबाद कर के

पलट कर फिर यहीं आ जाएँगे हम
वो देखे तो हमें आज़ाद कर के

रिहाई की कोई सूरत नहीं है
मगर हाँ मिन्नत-ए-सय्याद कर के

बदन मेरा छुआ था उस ने लेकिन
गया है रूह को आबाद कर के

हर आमिर तूल देना चाहता है
मुक़र्रर ज़ुल्म की मीआ'द कर के

***
परवीन शाकिर



अपनी तन्हाई मिरे नाम पे आबाद करे

 


अपनी तन्हाई मिरे नाम पे आबाद करे

कौन होगा जो मुझे उस की तरह याद करे


दिल अजब शहर कि जिस पर भी खुला दर इस का

वो मुसाफ़िर इसे हर सम्त से बरबाद करे


अपने क़ातिल की ज़ेहानत से परेशान हूँ मैं

रोज़ इक मौत नए तर्ज़ की ईजाद करे


इतना हैराँ हो मिरी बे-तलबी के आगे

वा क़फ़स में कोई दर ख़ुद मिरा सय्याद करे


सल्ब-ए-बीनाई के अहकाम मिले हैं जो कभी

रौशनी छूने की ख़्वाहिश कोई शब-ज़ाद करे


सोच रखना भी जराएम में है शामिल अब तो

वही मासूम है हर बात पे जो साद करे


जब लहू बोल पड़े उस के गवाहों के ख़िलाफ़

क़ाज़ी-ए-शहर कुछ इस बाब में इरशाद करे


उस की मुट्ठी में बहुत रोज़ रहा मेरा वजूद

मेरे साहिर से कहो अब मुझे आज़ाद करे


-परवीन शाकिर

कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी

 


कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी

दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी


बात वो आधी रात की रात वो पूरे चाँद की

चाँद भी 'ऐन चैत का उस पे तिरा जमाल भी


सब से नज़र बचा के वो मुझ को कुछ ऐसे देखता

एक दफ़'अ तो रुक गई गर्दिश-ए-माह-ओ-साल भी


दिल तो चमक सकेगा क्या फिर भी तरश के देख लें

शीशा-गिरान-ए-शहर के हाथ का ये कमाल भी


उस को न पा सके थे जब दिल का 'अजीब हाल था

अब जो पलट के देखिए बात थी कुछ मुहाल भी


मेरी तलब था एक शख़्स वो जो नहीं मिला तो फिर

हाथ दु'आ से यूँ गिरा भूल गया सवाल भी


उस की सुख़न-तराज़ियाँ मेरे लिए भी ढाल थीं

उस की हँसी में छुप गया अपने ग़मों का हाल भी


गाह क़रीब-ए-शाह-रग गाह बईद-ए-वहम-ओ-ख़्वाब

उस की रफ़ाक़तों में रात हिज्र भी था विसाल भी


उस के ही बाज़ुओं में और उस को ही सोचते रहे

जिस्म की ख़्वाहिशों पे थे रूह के और जाल भी


शाम की ना-समझ हवा पूछ रही है इक पता

मौज-ए-हवा-ए-कू-ए-यार कुछ तो मिरा ख़याल भी



-परवीन शाकिर