Sunday, July 9, 2023

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सभी कुछ है तेरा दिया हुआ सभी राहतें सभी कुल्फ़तें

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सभी कुछ है तेरा दिया हुआ सभी राहतें सभी कुल्फ़तें


कभी सोहबतें कभी फ़ुर्क़तें कभी दूरियाँ कभी क़ुर्बतें 

ये सुख़न जो हम ने रक़म किए ये हैं सब वरक़ तिरी याद के 
कोई लम्हा सुब्ह-ए-विसाल का कोई शाम-ए-हिज्र की मुद्दतें 

जो तुम्हारी मान लें नासेहा तो रहेगा दामन-ए-दिल में क्या 
न किसी अदू की अदावतें न किसी सनम की मुरव्वतें 

चलो आओ तुम को दिखाएँ हम जो बचा है मक़्तल-ए-शहर में 
ये मज़ार अहल-ए-सफ़ा के हैं ये हैं अहल-ए-सिद्क़ की तुर्बतें 

मिरी जान आज का ग़म न कर कि न जाने कातिब-ए-वक़्त ने 
किसी अपने कल में भी भूल कर कहीं लिख रखी हों मसर्रतें 



फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा

​अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा

मगर तुम्हारी तरह कौन मुझ को चाहेगा 

तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा 
मगर वो आँखें हमारी कहाँ से लाएगा 

न जाने कब तिरे दिल पर नई सी दस्तक हो 
मकान ख़ाली हुआ है तो कोई आएगा 

मैं अपनी राह में दीवार बन के बैठा हूँ 
अगर वो आया तो किस रास्ते से आएगा 

तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है 
तुम्हारे बा'द ये मौसम बहुत सताएगा
Bashir बद्र 

बहुत देर की मेहरबाँ आते आते

​फिरे राह से वो यहाँ आते आते 

अजल मर रही तू कहाँ आते आते 

न जाना कि दुनिया से जाता है कोई 
बहुत देर की मेहरबाँ आते आते 

सुना है कि आता है सर नामा-बर का 
कहाँ रह गया अरमुग़ाँ आते आते 

यक़ीं है कि हो जाए आख़िर को सच्ची 
मिरे मुँह में तेरी ज़बाँ आते आते 

सुनाने के क़ाबिल जो थी बात उन को 
वही रह गई दरमियाँ आते आते 

मुझे याद करने से ये मुद्दआ था 
निकल जाए दम हिचकियाँ आते आते 

अभी सिन ही क्या है जो बेबाकियाँ हों 
उन्हें आएँगी शोख़ियाँ आते आते 

कलेजा मिरे मुँह को आएगा इक दिन 
यूँही लब पर आह-ओ-फ़ुग़ाँ आते आते 

चले आते हैं दिल में अरमान लाखों 
मकाँ भर गया मेहमाँ आते आते 

नतीजा न निकला थके सब पयामी 
वहाँ जाते जाते यहाँ आते आते 

तुम्हारा ही मुश्ताक़-ए-दीदार होगा 
गया जान से इक जवाँ आते आते 

तिरी आँख फिरते ही कैसा फिरा है 
मिरी राह पर आसमाँ आते आते 

पड़ा है बड़ा पेच फिर दिल-लगी में 
तबीअत रुकी है जहाँ आते आते 

मिरे आशियाँ के तो थे चार तिनके 
चमन उड़ गया आँधियाँ आते आते 

किसी ने कुछ उन को उभारा तो होता 
न आते न आते यहाँ आते आते 

क़यामत भी आती थी हमराह उस के 
मगर रह गई हम-इनाँ आते आते 

बना है हमेशा ये दिल बाग़ ओ सहरा 
बहार आते आते ख़िज़ाँ आते आते 

नहीं खेल ऐ 'दाग़' यारों से कह दो 
कि आती है उर्दू ज़बाँ आते आते 

चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ

​चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ

जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए 
बस अश्क कहूँ तो एक आँसू 
तेरे गोरे गाल को धो जाए 
मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए 
मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे 
मेरे शाने पर सर रक्खे तू 
मैं नींद कहूँ तू सो जाए 
मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ 
तेरे होंठों पर मुस्कान आए 
मैं दिल लिक्खूँ तू दिल थामे 
मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए 
तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से 
फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ 
कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँ 
कुछ सीधा उल्टा हो जाए 
मैं आह लिखूँ तू हाय करे 
बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू 
फिर बेचैन का बे काटूँ 
तुझे चैन ज़रा सा हो जाए 
अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे 
फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े 
जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो 
मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

फिर दिल से आ रही है सदा उस गली में चल

​फिर दिल से आ रही है सदा उस गली में चल

शायद मिले ग़ज़ल का पता उस गली में चल 

कब से नहीं हुआ है कोई शेर काम का 
ये शेर की नहीं है फ़ज़ा उस गली में चल 

वो बाम ओ दर वो लोग वो रुस्वाइयों के ज़ख़्म 
हैं सब के सब अज़ीज़ जुदा उस गली में चल 

उस फूल के बग़ैर बहुत जी उदास है 
मुझ को भी साथ ले के सबा उस गली में चल 

दुनिया तो चाहती है यूँही फ़ासले रहें 
दुनिया के मशवरों पे न जा उस गली में चल 

बे-नूर ओ बे-असर है यहाँ की सदा-ए-साज़ 
था उस सुकूत में भी मज़ा उस गली में चल 

'जालिब' पुकारती हैं वो शोला-नवाइयाँ 
ये सर्द रुत ये सर्द हवा उस गली में चल 

ज़ख़्मों के नए फूल खिलाने के लिए

​ज़ख़्मों के नए फूल खिलाने के लिए,

फिर मौसम-ए-गुल याद दिलाने के लिए आ 

मस्ती लिए आँखों में बिखेरे हुए ज़ुल्फ़ें 
आ फिर मुझे दीवाना बनाने के लिए आ 

अब लुत्फ़ इसी में है मज़ा है तो इसी में 
आ ऐ मिरे महबूब सताने के लिए आ 

आ रख दहन-ए-ज़ख़्म पे फिर उँगलियाँ अपनी 
दिल बाँसुरी तेरी है बजाने के लिए आ 

हाँ कुछ भी तो देरीना मोहब्बत का भरम रख 
दिल से न आ दुनिया को दिखाने के लिए आ 

माना कि मिरे घर से अदावत ही तुझे है 
रहने को न आ आग लगाने के लिए आ 

प्यारे तिरी सूरत से भी अच्छी है जो तस्वीर 
मैं ने तुझे रक्खी है दिखाने के लिए, आ 

आशुफ़्ता कहे है कोई दीवाना कहे है 
मैं कौन हूँ दुनिया को बताने के लिए आ 

कुछ रोज़ से हम शहर में रुस्वा न हुए हैं 
आ फिर कोई इल्ज़ाम लगाने के लिए आ 

अब के जो वो आ जाए तो 'दोस्त' उसे ले कर 
महफ़िल में ग़ज़ल अपनी सुनाने के लिए आ

Thursday, July 6, 2023

मंजिल यूँ ही नहीं मिलती राही को

​मंजिल यूँ ही नहीं मिलती राही को,

जूनून सा दिल में जगाना पड़ता है.

पूछा चिड़िया को, कि घोंसला कैसे बनता है,

बोली, तिनका तिनका उठाना पड़ता है.

Monday, July 3, 2023

तुम कहते हो कि तुम कुछ भी नहीं

​तुम कहते हो कि तुम कुछ भी नहीं

क्यूँ तुमसे नजर मिलते ही जुगनू से चमक जाते हैं मेरी बुझी बुझी सी आँखों में 
क्यूँ तुम्हें अपने पास महसूस कर तितलियाँ सी उड़ने लगती हैं सारे बदन में 
क्यूँ तुम्हारे साथ जिये हुये वो अंतहीन लम्हे भर जाते हैं एक समंदर सा ज्वार 
तुम्हारे तन की खुश्बू क्यूँ चिपट कर रह जाती है मुझसे मेरे आँचल की तरह 
मेरे मलिन मुखड़े पर टाँक जाती है गुलाब की रंगत एक लजीली दुल्हन सी 
संदली हवा बनकर आना और फिर मेरे इर्द गिर्द ही ठहर कर रह जाना तेरा। 
गिरा कर लाज का घूंघट मेरा चुपके से, मुझ पर सोलहवाँ बसन्त बिखरा जाना 
करा जाता है एहसास तेरे होने का मुझमें या फिर मैं ही तिल तिल कर घुल रही तुझमें 
मैं जड़ हो गयी जिन्दगी को फिर से घसीट कर चल पड़ती हूँ तेरी परछाँई को थाम हौले से। 
कुछ तो है तुम में सबसे अलग 
और तुम कहते हो कि तुम कुछ भी नहीं। 

Saturday, July 1, 2023

मैं नज़र से पी रहा हूँ ये समाँ बदल न जाए

​मैं नज़र से पी रहा हूँ ये समाँ बदल न जाए 

न झुकाओ तुम निगाहें कहीं रात ढल न जाए 


मिरे अश्क भी हैं इस में ये शराब उबल न जाए 

मिरा जाम छूने वाले तिरा हाथ जल न जाए 


अभी रात कुछ है बाक़ी न उठा नक़ाब साक़ी 

तिरा रिंद गिरते गिरते कहीं फिर सँभल न जाए 


मिरी ज़िंदगी के मालिक मिरे दिल पे हाथ रखना 

तिरे आने की ख़ुशी में मिरा दम निकल न जाए 


मुझे फूँकने से पहले मिरा दिल निकाल लेना 

ये किसी की है अमानत मिरे साथ जल न जाए