Sunday, January 8, 2023

वो तेरी यादें

​न भूला हूँ मैं वो तेरी यादें 

तुझे पाने के लिए जो रब से की थी 
न भूला हूँ मैं वो फरियादें 

भीगी भीगी सी फिजा में 
शहर की गलियों में तुझसे मिलना 
इक वो समां न भूल पाया हूँ मैं 
न भूला हूँ मैं वो बरसातें 

तेरी गली के नुक्कड़ पर बैठ कर 
तेरी इक झलक पाने को बेताब रहना 
इक वो दिन न भूल पाया हूँ मैं 
न भूला हूँ मैं वो गलियारे 

घर से बहाने बना कर तेरा निकलना 
चांदनी रातों में आकर मुझसे मिलना 
इक वो वक्त न भूल पाया हूँ मैं 
न भूला हूँ मैं वो मुलाकातें 

इक तेरे शहर को न भूल पाया हूँ मैं 
न भूला हूँ मैं वो तेरी यादें | 

Wednesday, January 4, 2023

एक रात गुजारी न गई तेरे बग़ैर

एक रात गुजारी न गई तेरे बग़ैर
एक रुस्वाई उठाई न गई तेरे बग़ैर 

बेजार हो गया तुझ से बिछड़कर 
खुशियाँ बे-स्वाद हो गई तेरे बग़ैर 

रूह बदन से रुख्सत हो गया 
रूत बेहोश हो गई तेरे बग़ैर 

क्या कहूँ कितनी विरानी है 
क्या कहूँ कितनी जहालत है तेरे बग़ैर 

बदन की पीड़ा झेल नहीं पाया 
जिंदगी अजाब हो गई तेरे बग़ैर 

बहारें उजड़ गई अपनी 
दुनियाँ नाशाद हो गई तेरे बग़ैर 

कुछ नहीं बचा है इस जिस्म में ऐ दोस्त
जिस्म जिस्म को खाता है अब तेरे बग़ैर |

Monday, January 2, 2023

मुक़द्दर में चलना था चलते रहे

मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे

मुक़द्दर में चलना था चलते रहे 


मिरे रास्तों में उजाला रहा 
दिए उस की आँखों में जलते रहे 

कोई फूल सा हाथ काँधे पे था 
मिरे पाँव शो'लों पे जलते रहे 

सुना है उन्हें भी हवा लग गई 
हवाओं के जो रुख़ बदलते रहे 

वो क्या था जिसे हम ने ठुकरा दिया 
मगर उम्र भर हाथ मलते रहे 

मोहब्बत अदावत वफ़ा बे-रुख़ी 
किराए के घर थे बदलते रहे 

लिपट कर चराग़ों से वो सो गए 
जो फूलों पे करवट बदलते रहे

बशीर बद्र 

Saturday, December 31, 2022

अधरों पर मुस्कान ले, कहता है नव वर्ष

​पलकों के तट चूमकर, कहे नयन-जलधार ।

बीते हैं पल दर्द के, हुआ नया भिनसार ।।

जीवन कहते हैं जिसे, है सुख-दुख का मेल ।
ख़ुशियाँ दो पल जो मिलें, लेकर दुख भी झेल ।।

अब खूँटी पर टाँग दे, नफ़रत-भरी कमीज़ ।
बोना है नव वर्ष में, मुस्कानों के बीज ।।

भाई ने परदेस से, किया बहिन को फोन ।
तेरी खुशियों से बड़ा, मेरा जग में कौन ।।

घर में या परदेस में ,सबसे मुझको प्यार ।
सबके आँगन में खिले, फूलों का संसार ।।

नए साल से हम कहें-कर लो दुआ कुबूल ।
माफ़ करें हर एक की, जो-जो खटकी भूल ।। 

मुड़-मुड़कर क्या देखना, पीछे उड़ती धूल ।
फूलों की खेती करो, हट जाएँगे शूल ।। 

अधरों पर मुस्कान ले, कहता है नव वर्ष ।
छोड़ उदासी को यहाँ, आ पहुँचा है हर्ष ।। 

जितनी खुद से है हमें ,जीवन की हर आस ।
उससे भी ज़्यादा हमें, तुम पर है विश्वास । 

जिसके मन में नेह है, सच्ची है हर साँस।
और मीत से प्यार है, वह पहले ही पास ।

तुम जैसे होंगे जहाँ ,इस धरती पर लोग ॥
स्वर्ग बनेगे घर -नगर , मिट जाएँगे सोग ॥

-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' 

Thursday, December 29, 2022

मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूँ पर कहता नहीं - दुष्यंत कुमार

आगे निकल गए हैं घिसटते हुए क़दम
राहों में रह गए हैं निशाँ और भी ख़राब 


माथे पे रख के हाथ बहुत सोचते हो तुम
गंगा क़सम बताओ हमें क्या है माजरा 


उन का कहीं जहाँ में ठिकाना नहीं रहा
हम को तो मिल गया है अदब में मक़ाम और 


जाने किस किस का ख़याल आया है
इस समुंदर में उबाल आया है 

एक बूढ़ा आदमी है मुल्क में या यूँ कहो
इस अँधेरी कोठरी में एक रौशन-दान है


मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूँ पर कहता नहीं
बोलना भी है मना सच बोलना तो दरकिनार 

एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी
ये अँधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है


यहाँ तक आते आते सूख जाती है कई नदियाँ
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा 

सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मिरा मक़्सद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए 


अब तो इस तालाब का पानी बदल दो
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं 


दुष्यंत क़ुमार

Monday, September 12, 2022

एक मुकम्मल तेरा चेहरा बनता है

​धूप में जलते हैं तब साया बनता है,

बड़े जतन से कोई अपना बनता है,


सारे बिखरे ख़्वाब इकट्ठा करने पर,

एक मुकम्मल तेरा चेहरा बनता है!

      

        ~अक्स समस्तीपुरी 

Friday, September 9, 2022

मीरा से पूछोगे तो अमृत ही कहेगी

​बेर कैसे थे, ये शबरी से पूछो,

श्रीराम से पूछोगे तो मीठे ही कहेंगे।


ज़हर का स्वाद शिव से पूछो,

मीरा से पूछोगे तो अमृत ही कहेगी।


नीरज

Saturday, August 13, 2022

तुम्हारी मोतियों की और ज़री के तार की राखी

​चली आती है अब तो हर कहीं बाज़ार की राखी 

सुनहरी सब्ज़ रेशम ज़र्द और गुलनार की राखी 
बनी है गो कि नादिर ख़ूब हर सरदार की राखी 
सलोनों में अजब रंगीं है उस दिलदार की राखी 
न पहुँचे एक गुल को यार जिस गुलज़ार की राखी 

अयाँ है अब तो राखी भी चमन भी गुल भी शबनम भी 
झमक जाता है मोती और झलक जाता है रेशम भी 
तमाशा है अहा हा-हा ग़नीमत है ये आलम भी 
उठाना हाथ प्यारे वाह-वा टुक देख लें हम भी 
तुम्हारी मोतियों की और ज़री के तार की राखी 

मची है हर तरफ़ क्या क्या सलोनों की बहार अब तो 
हर इक गुल-रू फिरे है राखी बाँधे हाथ में ख़ुश हो 
हवस जो दिल में गुज़रे है कहूँ क्या आह मैं तुम को 
यही आता है जी में बन के बाम्हन, आज तो यारो 
मैं अपने हाथ से प्यारे के बाँधूँ प्यार की राखी 

हुई है ज़ेब-ओ-ज़ीनत और ख़ूबाँ को तो राखी से 
व-लेकिन तुम से ऐ जाँ और कुछ राखी के गुल फूले 
दिवानी बुलबुलें हों देख गुल चुनने लगीं तिनके 
तुम्हारे हाथ ने मेहंदी ने अंगुश्तों ने नाख़ुन ने 
गुलिस्ताँ की चमन की बाग़ की गुलज़ार की राखी


अदा से हाथ उठते हैं गुल-ए-राखी जो हिलते हैं 
कलेजे देखने वालों के क्या क्या आह छिलते हैं 
कहाँ नाज़ुक ये पहुँचे और कहाँ ये रंग मिलते हैं 
चमन में शाख़ पर कब इस तरह के फूल खिलते हैं 
जो कुछ ख़ूबी में है उस शोख़-ए-गुल-रुख़्सार की राखी 

फिरें हैं राखियाँ बाँधे जो हर दम हुस्न के तारे 
तो उन की राखियों को देख ऐ जाँ चाव के मारे 
पहन ज़ुन्नार और क़श्क़ा लगा माथे उपर बारे 
'नज़ीर' आया है बाम्हन बन के राखी बाँधने प्यारे 
बँधा लो उस से तुम हँस कर अब इस त्यौहार की राखी 

Wednesday, August 10, 2022

​तेरे मेरे रिश्ते का यही एक हिसाब रहा,

​तेरे मेरे रिश्ते का यही एक हिसाब रहा,  

मैं दिल ही दिल रहा तू सदा दिमाग रहा.

Friday, August 5, 2022

थी जिस की जुस्तुजू वो हक़ीक़त नहीं मिली

​थी जिस की जुस्तुजू वो हक़ीक़त नहीं मिली 

इन बस्तियों में हम को रिफ़ाक़त नहीं मिली 

अब तक हैं इस गुमाँ में कि हम भी हैं दहर में 
इस वहम से नजात की सूरत नहीं मिली 

रहना था उस के साथ बहुत देर तक मगर 
इन रोज़ ओ शब में मुझ को ये फ़ुर्सत नहीं मिली 

कहना था जिस को उस से किसी वक़्त में मुझे 
इस बात के कलाम की मोहलत नहीं मिली 

कुछ दिन के बा'द उस से जुदा हो गए 'मुनीर' 
उस बेवफ़ा से अपनी तबीअ'त नहीं मिली