Wednesday, November 6, 2019

तन्हाई को जगह जगह बिखराया हम ने

घर से निकले चौक गए फिर पार्क में बैठे, 
तन्हाई को जगह जगह बिखराया हम ने! 

अच्छी सूरत पे ग़ज़ब टूट के आना दिल का

अच्छी सूरत पे ग़ज़ब टूट के आना दिल का, 
याद आता है हमें हाए ज़माना दिल का! 


अच्छी सूरत पे ग़ज़ब टूट के आना दिल का

याद आता है हमें हाए ज़माना दिल का

तुम भी मुँह चूम लो बे-साख़्ता प्यार जाए

मैं सुनाऊँ जो कभी दिल से फ़साना दिल का

निगह-ए-यार ने की ख़ाना-ख़राबी ऐसी

ठिकाना है जिगर का ठिकाना दिल का

पूरी मेहंदी भी लगानी नहीं आती अब तक

क्यूँकर आया तुझे ग़ैरों से लगाना दिल का

ग़ुंचा-ए-गुल को वो मुट्ठी में लिए आते थे

मैं ने पूछा तो किया मुझ से बहाना दिल का

इन हसीनों का लड़कपन ही रहे या अल्लाह

होश आता है तो आता है सताना दिल का

दे ख़ुदा और जगह सीना पहलू के सिवा

कि बुरे वक़्त में हो जाए ठिकाना दिल का

मेरी आग़ोश से क्या ही वो तड़प कर निकले

उन का जाना था इलाही कि ये जाना दिल का

निगह-ए-शर्म को बे-ताब किया काम किया

रंग लाया तिरी आँखों में समाना दिल का

उँगलियाँ तार-ए-गरेबाँ में उलझ जाती हैं

सख़्त दुश्वार है हाथों से दबाना दिल का

हूर की शक्ल हो तुम नूर के पुतले हो तुम

और इस पर तुम्हें आता है जलाना दिल का

छोड़ कर उस को तिरी बज़्म से क्यूँकर जाऊँ

इक जनाज़े का उठाना है उठाना दिल का

बे-दिली का जो कहा हाल तो फ़रमाते हैं

कर लिया तू ने कहीं और ठिकाना दिल का

बा'द मुद्दत के ये 'दाग़' समझ में आया

वही दाना है कहा जिस ने माना दिल का 

तुम को चाहा तो ख़ता क्या है बता दो

तुम को चाहा तो ख़ता क्या है बता दो मुझ को, 
दूसरा कोई तो अपना सा दिखा दो मुझ को.


अच्छी सूरत भी क्या बुरी शय है

अच्छी सूरत भी क्या बुरी शय है, 
जिस ने डाली बुरी नज़र डाली! 

हाय इक बुत की इबादत का नशा!

पहले पहले की मुहब्बत का नशा, 
हाय इक बुत की इबादत का नशा! 
बाद तक हम दर्द से ग़ाफ़िल रहे, 
बाक़ी था नज़रे इनायत का नशा! 

रिश्ते ❤️तो तुम्हारे जैसे प्यारे लोगों से महकते हैं!

ये इत्र की शीशियाँ बेकार ही इतराती है खुद पर, 
रिश्ते ❤️तो तुम्हारे जैसे प्यारे लोगों से महकते हैं! 

दिल-ए-बेताब को आदत है मचल जाने की

आप पहलू में जो बैठें तो सँभल कर बैठें
दिल-ए-बेताब को आदत है मचल जाने की

~जलील मानिकपूरी 

Tuesday, November 5, 2019

कभी किताबों में फूल रखना कभी दरख़्तों पे नाम लिखना,

कभी किताबों में फूल रखना कभी दरख़्तों पे नाम लिखना, 
हमें भी याद है आज तक वो नज़र से हर्फ-ए-सलाम लिखना! 
वो चांद चेहरे वो बहकी बातें सुलगते दिन थे महकती रातें, 
वो छोटे छोटे से काग़ज़ों पे मोहब्बतों के पयाम लिखना! 

गिरने लगी हैं सितम की बिजलियाँ!

सहमा सहमा आलम है , सहमी हैं , मेरे चमन की तितलियाँ,
अब तो झ्न पे भी गिरने लगी हैं सितम की बिजलियाँ! 

हसीनों को भी कितना सहल है बिजली गिरा देना

हया से सर झुका लेना अदा से मुस्कुरा देना 
हसीनों को भी कितना सहल है बिजली गिरा देना! 

~अकबर इलाहाबादी