राहों का ख़्याल है मुझे, मंज़िल का हिसाब नहीं रखता।
अल्फ़ाज़ दिल से निकलते है, मैं कोई किताब नहीं रखता।।
Saturday, September 1, 2018
अल्फाज दिल से निकलते हैं
मुक़द्दर की बात
किस पर ठहरती है नज़र,
ये नज़र-नज़र की बात है;
कौन, किसका, कब बन जाता है अजीज,
यह मुकद्दर की बात है!
इजहार ए इश्क़
तेरे बदन से छिटककर, मेरे चेहरे से लिपटा,
इज़हार ए इश्क़, तेरा ये दुपट्टा करता है!
इजहार ए इश्क़
तेरे बदन से छिटककर, मेरे चेहरे से लिपटा,
इज़हार ए इश्क़, तेरा ये दुपट्टा करता है!
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