“सीमा नहीं बना करतीं हैं काग़ज़ खींची लकीरों से,
ये घटती-बढ़ती रहती हैं वीरों की शमशीरों से.
(कवि बलवीर सिंह करुण)
सीमा नहीं बना करतीं हैं काग़ज़ खींची लकीरों से,
ये घटती-बढ़ती रहती हैं वीरों की शमशीरों से।
आशु तो कुछ भी नहीं आसूँ के सिवा, जाने क्यों लोग इसे पलकों पे बैठा लेते हैं।
“सीमा नहीं बना करतीं हैं काग़ज़ खींची लकीरों से,
ये घटती-बढ़ती रहती हैं वीरों की शमशीरों से.
(कवि बलवीर सिंह करुण)
सीमा नहीं बना करतीं हैं काग़ज़ खींची लकीरों से,
ये घटती-बढ़ती रहती हैं वीरों की शमशीरों से।
उन्हें अब शायद याद कुछ आती नहीं मेरी।
लगता है चाहत के दिन अब पूरे हो चले।
मन समर्पित तन समर्पित और यह जीवन समर्पित
चाहता हूँ देश की धरती तुझे अभी कुछ और भी दूँ
माँ तुम्हारा ऋण बहुत है मैं अकिंचन
किन्तु इतना कर रहा फिर भी निवेदन
थाल में लाऊँ सजाकर भाल जब
स्वीकार कर लेना दयाकर यह समर्पण
गान अर्पित प्राण अर्पित रक्त का कण-कण समर्पित
माँज दो तलवार को लाओ न देरी
बाँध दो कसकर कमर पर ढाल मेरी
भाल पर मल दो चरण की धूल थोड़ी
शीष पर आशीष की छाया घनेरी
स्वप्न अर्पित प्रश्न अर्पित आयु का क्षण-क्षण समर्पित
तोड़ता हूँ मोह का बन्धन क्षमा दो
गाँव मेरा द्वार घर आँगन क्षमा दो
आज सीधे हाथ में तलवार दे दो
और बाएँ हाथ में ध्वज को थमा दो
ये सुमन लो ये चमन लो नीड़ का तृण-तृण समर्पित.
- रामावतार त्यागी
तेरे नखरे भी कमाल हैं जिंदगी
बिना बात के बवाल है जिंदगी।
कुरबतें हो हमसफ़र से अगर
फिर तो बस धमाल है जिंदगी।
हर अदा जिंदगी की कातिलना
अनसुलझा सवाल है जिंदगी।
आखिरी मंजिल तो मौत ही है
क्यूं फिर इक जंजाल है जिंदगी।
ठहर जाए ग़म जब आकर यहां
मानो बात बस पामाल है जिंदगी।
दीवाली के दीप जलाएँ आ जाओ
रौशन रौशन गीत सुनाएँ आ जाओ
गोशे गोशे में तज़ईन-ओ-ज़ेबाई
साफ़ करें हर दिल की मैली अँगनाई
फ़ितरत ने भी मस्ती में ली अंगड़ाई
ख़ुशियों का संगीत सुनाएँ आ जाओ
दीवाली के दीप जलाएँ आ जाओ
रौशन रौशन गीत सुनाएँ आ जाओ
आशाओं की मंज़िल पर सब कॉमन हो
नफ़रत जाए प्यार की ज्योति रौशन हो
प्रेम नगर में चाहे दाव पे जीवन हो
भेद-भाव पे तीर चलाएँ आ जाओ
दीवाली के दीप जलाएँ आ जाओ
रौशन रौशन गीत सुनाएँ आ जाओ
रौशनियों के जाल भी कितने सुंदर हैं
दीपक मालाएँ घर घर का ज़ेवर हैं
फुल-झड़ियों जैसे चेहरों पर तेवर हैं
हर ज़ुल्मत को आज मिटाएँ आ जाओ
दीवाली के दीप जलाएँ आ जाओ
रौशन रौशन गीत सुनाएँ आ जाओ
हार चुके हर बाज़ी अब रावन वाले
लक्ष्मी की पूजा करते हैं धन वाले
अपनी दुनिया हम बेचारे मन वाले
आतिश-बाज़ी चमकाएँ आ जाओ
दीवाली के दीप जलाएँ आ जाओ
रौशन रौशन गीत सुनाएँ आ जाओ
सब के लिए ख़ुश-हाली का ये साल रहे
हर इंसाँ की क़िस्मत में ज़र माल रहे
न कोई अब इस धरती पर कंगाल रहे
हर क़िस्मत पर नूर बनाएँ आ जाओ
दीवाली के दीप जलाएँ आ जाओ
रौशन रौशन गीत सुनाएँ आ जाओ
अबरार किरतपुरी
तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो
जो मिले ख़्वाब में वो दौलत होथोड़ा सा माहौल बनाना होता है
वर्ना किसी के साथ ज़माना होता है
सच्चा शेर सुनाने वाले ख़त्म हुए
अब तो ख़ाली खेल दिखाना होता है
आँसू पहली शर्त है इस समझौते की
ग़म तो साँसों का जुर्माना होता है
लाल-क़िले की दीवारों पर लिखवा दो
दिल सब से महफ़ूज़ ठिकाना होता है
दुनिया में भर-मार है नक़ली लोगों की
सौ में कोई एक दिवाना होता है
रात हमारे घर जल्दी आ जाया कर
हमें सवेरे काम पे जाना होता है
ऐसी कोई बात नहीं मायूसी की
सच में थोड़ा सा अफ़्साना होता है
सब की अपनी एक इकाई होती है
सब का अपना एक ज़माना होता है
हम ने तो उन को भी लुटते देखा है
जिन के चार-क़दम पर थाना होता है
आज बिछड़ते वक़्त मुझे मालूम हुआ
लोगों में एहसास का ख़ाना होता है
शकील जमाली
आग़ाज़-ए-इश्क़ उम्र का अंजाम हो गया
नाकामियों के ग़म में मिरा काम हो गयाचाँदनी था कि ग़ज़ल था कि सबा था क्या था
मैं ने इक बार तिरा नाम सुना था क्या था
अब के बिछड़े हैं तो लगता है कि कुछ टूट गया
मेरा दिल था कि तिरा अहद-ए-वफ़ा था क्या था
ख़ुद-कुशी कर के भी बिस्तर से उठा हूँ ज़िंदा
मैं ने कल रात को जो ज़हर पिया था क्या था
तुम तो कहते थे ख़ुदा तुम से ख़फ़ा है 'क़ैसर'
डूबते वक़्त वो जो इक हाथ बढ़ा था क्या था
क़ैसर-उल जाफ़री
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ
दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!
बहुत बार आई-गई यह दिवाली
मगर तम जहां था वहीं पर खड़ा है,
बहुत बार लौ जल-बुझी पर अभी तक
कफन रात का हर चमन पर पड़ा है,
न फिर सूर्य रूठे, न फिर स्वप्न टूटे
उषा को जगाओ, निशा को सुलाओ!
दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!
सृजन शान्ति के वास्ते है जरूरी
कि हर द्वार पर रोशनी गीत गाये
तभी मुक्ति का यज्ञ यह पूर्ण होगा,
कि जब प्यार तलावार से जीत जाये,
घृणा बढ रही है, अमा चढ़ रही है
मनुज को जिलाओ, दनुज को मिटाओ!
दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!
बड़े वेगमय पंख हैं रोशनी के
न वह बंद रहती किसी के भवन में,
किया क़ैद जिसने उसे शक्ति छल से
स्वयं उड़ गया वह धुंआ बन पवन में,
न मेरा-तुम्हारा सभी का प्रहर यह
इसे भी बुलाओ, उसे भी बुलाओ!
दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!
मगर चाहते तुम कि सारा उजाला
रहे दास बनकर सदा को तुम्हारा,
नहीं जानते फूस के गेह में पर
बुलाता सुबह किस तरह से अंगारा,
न फिर अग्नि कोई रचे रास इससे
सभी रो रहे आँसुओं को हंसाओ!
दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!
गोपालदास "नीरज"