Wednesday, August 27, 2025

टूटा-फूटा ही सही घर-बार होना चाहिए

 

बोझ उठाना शौक़ कहाँ है मजबूरी का सौदा है

रहते रहते स्टेशन पर लोग क़ुली हो जाते हैं

*

तो अब इस गांव से

रिश्ता हमारा खत्म होता है

फिर आंखें खोल ली जाएं कि

सपना खत्म होता है।

*

इश्क़ है तो इश्क़ का इज़हार होना चाहिए

आप को चेहरे से भी बीमार होना चाहिए

*

ज़िंदगी तू कब तलक दर-दर फिराएगी हमें

टूटा-फूटा ही सही घर-बार होना चाहिए

*

बरसों से इस मकान में रहते हैं चंद लोग

इक दूसरे के साथ वफ़ा के बग़ैर भी

*

तिरे एहसास की ईंटें लगी हैं इस इमारत में

हमारा घर तिरे घर से कभी ऊँचा नहीं होगा

*

मंज़िल क़रीब आते ही एक पांव कट गया

चौड़ी हुई सड़क तो मेरा गांव कट गया

*

मेरी मुट्ठी से ये बालू सरक जाने को कहती है
कि अब ये ज़िंदगी मुझसे थक जाने को कहती है 

*
जिसे हम ओढ़कर निकले थे आग़ाज़े जवानी में
वो चादर ज़िंदगी की अब मसक जाने को कहती है

*

मंज़िल क़रीब आते ही एक पांव कट गया
चौड़ी हुई सड़क तो मेरा गांव कट गय

*

कहानी ज़िंदगी की क्या सुनाएं अहले महफ़िल को
शकर घुलती नहीं और खीर पक जाने को कहती है

*

बुलंदियो का सफ़र भी अजीब होता है
पतंग देखिए कैसे हवा में जाती है

*




ग़ज़ल हर अहद में हमसे सलीका पूछने आई
बरेली में कहां मिलता है सुरमा पूछने आई

मैं जब दुनिया में था तो हाल तक मेरा नहीं पूछा
मैं जब चलने लगा तो सारी दुनिया पूछने आयी

*
बोझ उठाना शौक़ कहाँ है मजबूरी का सौदा है
रहते रहते स्टेशन पर लोग क़ुली हो जाते हैं

गर कभी रोना ही पड़ जाए तो इतना रोना
आ के बरसात तिरे सामने तौबा कर ले

*

कुछ बिखरी हुई यादों के क़िस्से भी बहुत थे
कुछ उस ने भी बालों को खुला छोड़ दिया था

--मुनव्वर राना

 

 

 

 

***

 

कोई चादर वफ़ा नहीं करती

वक़्त जब खींच-तान करता है

 

फ़हमी बदायूनी

इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है

 *

इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है

सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है

 

जिगर मुरादाबादी

*

पूछा जो उन से चाँद निकलता है किस तरह

ज़ुल्फ़ों को रुख़ पे डाल के झटका दिया कि यूँ

 

आरज़ू लखनवी

*

बे-ख़ुदी बे-सबब नहीं 'ग़ालिब'

कुछ तो है जिस की पर्दा-दारी है

 

मिर्ज़ा ग़ालिब

*

ग़रज़ कि काट दिए ज़िंदगी के दिन ऐ दोस्त

वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में

 

फ़िराक़ गोरखपुरी

*

उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया

देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया

 

मीर तक़ी मीर

*

सुब्ह होती है शाम होती है

उम्र यूँही तमाम होती है

 

मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम

*

हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है

बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा

 

अल्लामा इक़बाल

*

वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है

कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं

 

मिर्ज़ा ग़ालिब

*

मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी

किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी

 

बशीर बद्र

*

हम से क्या हो सका मोहब्बत में

ख़ैर तुम ने तो बेवफ़ाई की

 

फ़िराक़ गोरखपुरी

*

वो बात सारे फ़साने में जिस का ज़िक्र न था

वो बात उन को बहुत ना-गवार गुज़री है

 

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

*

कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तिरा

कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तिरा

 

इब्न-ए-इंशा

*

ग़ैरों से कहा तुम ने ग़ैरों से सुना तुम ने

कुछ हम से कहा होता कुछ हम से सुना होता

 

चराग़ हसन हसरत

*

तुम से बिछड़ कर ज़िंदा हैं

जान बहुत शर्मिंदा हैं

 

इफ़्तिख़ार आरिफ़

 

कैफ़ी आज़मी (शेर, शायरी, ग़ज़ल)

 *

इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े

हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े

 

जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क

यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े

 

इक तुम कि तुम को फ़िक्र-ए-नशेब-ओ-फ़राज़ है

इक हम कि चल पड़े तो बहर-हाल चल पड़े

 

साक़ी सभी को है ग़म-ए-तिश्ना-लबी मगर

मय है उसी की नाम पे जिस के उबल पड़े

 

मुद्दत के बा'द उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह

जी ख़ुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े

*

गर डूबना ही अपना मुक़द्दर है तो सुनो

डूबेंगे हम ज़रूर मगर नाख़ुदा के साथ

-कैफ़ी आज़मी

*

जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क

यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े

*

कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले

उस इंक़लाब का जो आज तक उधार सा है

*

रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे

फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ

 

रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे

फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ

 

बार-हा तोड़ चुका हूँ जिन को

उन्हीं दीवारों से टकराता हूँ

 

रोज़ बसते हैं कई शहर नए

रोज़ धरती में समा जाते हैं

 

ज़लज़लों में थी ज़रा सी गर्मी

वो भी अब रोज़ ही आ जाते हैं

 

जिस्म से रूह तलक रेत ही रेत

न कहीं धूप न साया न सराब

 

कितने अरमान हैं किस सहरा में

कौन रखता है मज़ारों का हिसाब

 

नब्ज़ बुझती भी भड़कती भी है

दिल का मामूल है घबराना भी

 

रात अंधेरे ने अंधेरे से कहा

एक आदत है जिए जाना भी

 

क़ौस इक रंग की होती है तुलू

एक ही चाल भी पैमाने की

 

गोशे गोशे में खड़ी है मस्जिद

शक्ल क्या हो गई मय-ख़ाने की

 

कोई कहता था समुंदर हूँ मैं

और मिरी जेब में क़तरा भी नहीं

 

ख़ैरियत अपनी लिखा करता हूँ

अब तो तक़दीर में ख़तरा भी नहीं

 

अपने हाथों को पढ़ा करता हूँ

कभी क़ुरआँ कभी गीता की तरह

 

चंद रेखाओं में सीमाओं में

ज़िंदगी क़ैद है सीता की तरह

 

राम कब लौटेंगे मालूम नहीं

काश रावण ही कोई आ जाता

 

-कैफ़ी आज़मी

*

बेलचे लाओ खोलो ज़मीं की तहें

मैं कहाँ दफ़्न हूँ कुछ पता तो चले

*

बहार आए तो मेरा सलाम कह देना

मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने

*

जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ

यहाँ तो कोई मिरा हम-ज़बाँ नहीं मिलता

-कैफ़ी आज़मी

 *

*

कोई कहता था समुंदर हूँ मैं

और मिरी जेब में क़तरा भी नहीं

*

बस इक झिजक है यही हाल-ए-दिल सुनाने में

कि तेरा ज़िक्र भी आएगा इस फ़साने में

*

इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं

दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बाद

*

झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं

दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं

*

बस्ती में अपनी हिन्दू मुसलमाँ जो बस गए

इंसाँ की शक्ल देखने को हम तरस गए

*

कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले

उस इंक़लाब का जो आज तक उधार सा है

*

रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई

तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई

 

-कैफ़ी आज़मी