Saturday, November 30, 2019

कैफ़ियत शायरी

ये कैफ़ियत है मेरी जान अब तुझे खो कर, 
कि हम ने ख़ुद को भी पाया नहीं बहुत दिन से!

ना वो कैफ़ियत पूछते हैं ना वो ख़ैरियत पूछते हैं
ये जो अहबाब हैं सारे वो बस हैसियत पूछते हैं!

कैफ़ियत-ए-नशात है मौसम-ए-मयकदा.
हर हाथ में नूर है हर चेहरे पर मस्ती! 

#कैफ़ियत क्या थी यहाँ आलम-ए-ग़म से पहले 
कौन आया था तिरी बज़्म में हम से पहले 
सब करम है तिरे अंदाज़-ए-सितम से ऐ दोस्त 
ज़ौक़-ए-ग़म दिल को न था तेरे सितम से पहले! 

ज़मीन जब भी हुई कर्बला हमारे लिए 
तो आसमान से उतरा ख़ुदा हमारे लिए
अजीब कैफ़ियत-ए-जज़्ब-ओ-हाल रखती है 
तुम्हारे शहर की आब-ओ-हवा हमारे लिए! 

अपनी "कैफ़ियत" तुमको क्या बताएं हम, 
वही टूटा दिल वही तन्हा राते वही रूठा सनम! 

कैफ़ियत - अवस्था, स्थिति

रूह सिलवट हटा रही होगी

फिर मेरी याद आ रही होगी, 
फिर वो दीपक बुझा रही होगी.

फिर उसी ने उसे छुआ होगा, 
फिर उसी से निभा रही होगी.

जिस्म चादर सा बिछ गया होगा,
रूह सिलवट हटा रही होगी


कुमार विश्वास

Wednesday, November 27, 2019

छल-रहित व्यवहार मेरा

मैं छिपाना जानता तो
जग मुझे साधू समझता,
शत्रु मेरा बन गया है
छल-रहित व्यवहार मेरा!

~ हरिवंशराय बच्चन

पलट के आऊंगी शाखों पे खुशबुएँ लेकर

पलट के आऊंगी शाखों पे खुशबुएँ लेकर,
खिज़ां की ज़द में हूँ मौसम ज़रा बदलने दे!

Tuesday, November 26, 2019

रास्ते बंद हैं सब कूचा-ए-क़ातिल के सिवा

काम अब कोई न आएगा बस इक दिल के सिवा 
रास्ते बंद हैं सब कूचा-ए-क़ातिल के सिवा! 

Monday, November 25, 2019

ग़म-ए-आशिक़ी से कह दो रह-ए-आम तक न पहुँचे

ग़म-ए-आशिक़ी से कह दो रह-ए-आम तक न पहुँचे 

मुझे ख़ौफ़ है ये तोहमत तिरे नाम तक न पहुँचे 

मैं नज़र से पी रहा था तो ये दिल ने बद-दुआ दी 

तिरा हाथ ज़िंदगी भर कभी जाम तक न पहुँचे 

वो नवा-ए-मुज़्महिल क्या न हो जिस में दिल की धड़कन 

वो सदा-ए-अहल-ए-दिल क्या जो अवाम तक न पहुँचे 

मिरे ताइर-ए-नफ़स को नहीं बाग़बाँ से रंजिश 

मिले घर में आब-ओ-दाना तो ये दाम तक न पहुँचे 

नई सुब्ह पर नज़र है मगर आह ये भी डर है 

ये सहर भी रफ़्ता रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुँचे 

ये अदा-ए-बे-नियाज़ी तुझे बेवफ़ा मुबारक 

मगर ऐसी बे-रुख़ी क्या कि सलाम तक न पहुँचे 

जो नक़ाब-ए-रुख़ उठा दी तो ये क़ैद भी लगा दी 

उठे हर निगाह लेकिन कोई बाम तक न पहुँचे 

उन्हें अपने दिल की ख़बरें मिरे दिल से मिल रही हैं 

मैं जो उन से रूठ जाऊँ तो पयाम तक न पहुँचे 

वही इक ख़मोश नग़्मा है 'शकील' जान-ए-हस्ती 

जो ज़बान पर न आए जो कलाम तक न पहुँचे 


शकील बदायूंनी 


हम उन्हें देखें, की उनका देखना देखें

नजाकत ले के आँखों में, वो उनका देखना तौबा, 
या खुदा ! हम उन्हें देखें, की उनका देखना देखें ।

परवीन शाकिर के 3 शेर–

परवीन शाकिर के 3 शेर–

1)
मैं सच कहूँगी मगर फिर भी हार जाऊँगी
वो झूट बोलेगा और ला-जवाब कर देगा

2)
इक नाम क्या लिखा तिरा साहिल की रेत पर
फिर उम्र भर हवा से मेरी दुश्मनी रही

3)
वो कहीं भी गया लौटा तो मिरे पास आया
बस यही बात है अच्छी मिरे हरजाई की

#ParveenShakir

Sunday, November 24, 2019

दर्द क्या होता है बताएँगे किसी रोज़

दर्द क्या होता है बताएँगे किसी रोज़ 
कमाल की ग़ज़ल तुम को सुनायेंगे किसी रोज़ ।

थी उन की ज़िद के मैं जाऊँ उन को मनाने 
मुझ को ये वहम था वो बुलाएंगे किसी रोज़ ।

उड़ने दो इन परिंदों को आज़ाद फ़िज़ाओं में 
तुम्हारे होंगे अगर, तो लौट आएंगे किसी रोज़ ।

#परवीन शाकिर 

मीर की ग़ज़लें ढूंड रहा हूँ तुलसी की चौपाई में

जाने मुझको क्या सूझी है शब्दों की अँगनाई में, 
मीर की ग़ज़लें ढूंड रहा हूँ तुलसी की चौपाई में!