Thursday, May 10, 2012

खुशबू

इतना टूटा हूँ कि छूने से बिखर जाऊँगा,
अब अगर और दुआ दोगे तो, मर जाऊँगा!
फूल रह जायेंगे, गुलदानों में यादों की नज़र,
मैं तो खुशबू हूँ, फिज़ाओं में बिखर जाऊँगा॥

मैं

आँखों में रहा दिल में उतरकर नहीं देखा,
कश्ती के मुसाफ़िर ने समन्दर नहीं देखा |

पत्थर कहता है मुझे मेरा चाहनेवाला,
मैं मोम हूँ उसने मुझे छूकर नहीं देखा ||

Sunday, April 22, 2012

हरी घास पर क्षण-भर : अज्ञेय की लंबी कविता

आओ बैठें
इसी ढाल की हरी घास पर।
माली-चौकीदारों का यह समय नहीं है,
और घास तो अधुनातन मानव-मन की भावना की तरह
सदा बिछी है... हरी, न्योतती, कोई आकर रौंदे।

आओ बैठो
तनिक और सटकर, कि हमारे बीच स्नेह-भर का व्यवधान रहे, बस
नहीं दरारें सभ्य शिष्ट जीवन की।

चाहे बोलो, चाहे धीरे-धीरे बोलो, स्वगत गुनगुनाओगे,
चाहे चुप रह जाओ...
हो प्रकृतस्थ : तनो मत कटी-छंटी उस बाड़ सरीखी,
नमो, खुल खिलो, सहज मिलो
अंत:स्मित, अंत:संयत हरी घास-सी

क्षणभर भुला सकें हम
नगरी की बेचैन बुदकती गड्ड-मड्ड अकुलाहट-
और मानें उसे पलायन,
क्षण-भर देख सकें आकाश, धरा, दूर्वा, मेघाली,
पौधे, लता दोलती, फूल, झरे पत्ते, ‍तितली-भुनगे,
फुनगी पर पूंछ उठाकर इतराती छोटी-सी चिडि़या-
और सहसा चोर कह उठे मन में-
प्रकृतिवाद है स्खलन
क्योंकि युग जनवादी है।

क्षणभर में हम रहें रहकर भी
सुनें गूंज भीतर के सूने सन्नाटे में किसी दूर सागर की लोल लहर की
जिसकी छाती की हम दोनों छोटी-सी सिहरन हैं-
जैसी सीपी सदा सुना करती है।

क्षण-भर लय हों- मैं भी, तुम भी,
और सिमटें सोच कि हमने
अपने से भी बड़ाकिसी भी अपर को क्यों माना!

क्षण-भर अनायास हम याद करें :
तिरती नाव नदी में,
धूलभरे पथ पर असाढ़ की भभक, झील में साथ तैरना,
हंसी अकारण खड़े महावट की छाया में,
वदन घाम से लाल, स्वेद से जमी अलक-लट,
चीड़ों का वन, साथ-साथ दुलकी चलते दो घोड़े,
गीली हवा नदी की, फूले नथुने, भराई सीटी स्टीमर की,
खंडहर, ग्रसित अंगुलियां, बांसे का मधु,
डाकिए के पैरों की चाप,
अधजानी बबूल की धूल मिली-सी गंध,
झरा रेशमशिरीष का, कविता के पद,
मसजिद के गुंबद के पीछे सूर्य डूबता धीरे-धीरे,
झरने के चमकीले पत्थर, मोर-मोरनी, घुंघरूं,
संथाली झुमूर का लंबा कसकभरा आलाप,
रेल का आह की तरह धीरे-धीरे खिंचना, लहरें,
आंधी-पानी,
नदी किनारे की रेती पर बित्ते-भर की छांह झाड़ की
अंगुल-अंगुल नाप-नापकर तोड़े तिनकों का समूह,
लू,
मौन।

याद कर सकें अनायास : और मानें
हम अतीत के शरणाथीं हैं;
स्मरण हमारा-जीवन के अनुभव का प्रत्यवलोकन-
हमें हीन बनावे प्रत्यभिमुख होने के पाप-बोध से।
आओ बैठो : क्षण-भर :
यह क्षण हमें मिला है नहीं नगर-सेठों की फैयाजी से।
हमें मिला है अपने जीवन की निधि से ब्याज सरीखा।

आओ बैठो : क्षण-भर तुम्हेंनिहारूं।
अपनी जानी एक-एक रेखा पहचानूं
चेहरे की, आंखों की-अंतर्मन की
और-हमारी साझे की अनगिन स्मृतियों की :
तुम्हें निहारूं,
झिझक हो कि निरखना दबी वासना की विकृति है!

धीरे-धीरे
धुंधले में चेहरे की रेखाएं मिट जाएं-
केवल नेत्र जगें : उतनी ही धीरे
हरी घास की पत्ती-पत्ती भी मिट जाए लिपट झाडि़यों के पैरों में
और झाडि़यां भी धुल जाएं क्षिति-रेखा के मसृण ध्वांत में,
केवल बना रहे विस्तार- हमारा बोध
मुक्ति का,
सीमाहीन खुलेपन का ही।

चलो, उठें अब,
अब तक हम थे बंधु सैर को आए...
(देखें हैं क्या कभी घास पर लोट-पोट होते सतभैये शोर मचाते?)
और रहे बैठे तो लोग कहेंगे
धुंधले में दुबके प्रेमी बैठे हैं।

...वह हम हों भी तो यह हरी घास ही जाने :
(जिसके खुले निमंत्रण के बल जग ने सदा उसे रौंदा है
और वह नहीं बोली),
नहीं सुनें हम वह नगरी के नागरिकों से
जिनकी भाषा में अतिशय चिकनाई है साबुन की
किंतु नहीं करुणा।

उठो, चलें प्रिय!

Saturday, April 14, 2012

कभी कभी

कुछ अपना होश न तुम्हारा ख्याल कभी,
यूँ ही गुजर गयी ज़िंदगी कभी कभी।
ऐ दोस्त हमने दर्दे मोहब्बत के बावजूद,
महसूस की है तेरी जरूरत कभी कभी।।

रक्स

अब तो करम का हाथ बढ़ा दे ऐ अजीज़,

बड़ी मुद्दत हुई तेरे दर पे खड़े हुए।

तिनके तो रक्स करतें हैं तूफान की गोद में,

दरिया में डूबतें हैं सफीने भड़े हुए॥

Wednesday, February 29, 2012

लुत्फ़, मजा

बादशाहों की मुअत्तर ख्वाबगाहों में कहाँ,
वह मजा जो भीगी-भीगी घास पर सोने में है.
मुतमईन बेफिक्र लोगों की हँसी में भी कहाँ,
लुत्फ़ जो एक-दूसरे को देखकर रोने में हैं..

Saturday, December 3, 2011

गाल, गुलाबी, Til

यूँ तो होते हैं हजारों गाल गुलाबी,
गुलाबी गालों पे तिल बरी मुश्किल से होते है..

Saturday, November 5, 2011

माजरा

दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है
हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार
या इलाही ये माजरा क्या है
-ग़ालिब


O innocent heart, what happened to you
What is the cure for this affliction
My affections are met with coldness
O God, what is happening?

ख़ुशी

ख़ुशी तो फिर ख़ुशी है रंज को समझा ख़ुशी हमने
तेरी ख़ातिर बदल डाला निज़ामे-ज़िन्दगी हमने

याराना

गो ज़रा सी बात पर बरसों के याराने गये
लेकिन इतना तो हुआ कुछ लोग पहचाने गये
-ख़ातिर ग़ज़नवी