Friday, March 3, 2023

देखते ही उन्हें सवाल सब भूल गया

देखते ही उन्हें सवाल सब भूल गया, 
अजीब पुराना इश्क है, 
देखते ही उन्हें, अपना सवाल भूल गया, 
लाख चाहा,कि उनको याद ना करूं, 
मगर वो हंसती है, तो आईना हंसता है, 
और दोनों हंसते हैं, तो मेरा मन हंसता है, 
जिंदगी का हिस्सा बनाने की चाह थी, 
पर किस्मत ने, अहसास करा दिया, 
कि मन तो सुंदर सलोना है, 
उनका मिलना, दिल बहलाने का बहाना है 

हास्य-व्यंग्य रचना- जब तुलसीदास पहुंचे सरकारी दफ्तर

प्रसंग - रामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी आज के युग में होते और सरकारी दफ्तरों के बाबुओं से दो-चार हो रहे होते, तो अपनी अवधी में किस तरह से वार्तालाप कर रहे होते, बस यही छोटा सा प्रयास किया है इस रचना में।



चित्रकूट के राशनकार्ड दफ्तर में लोगों की लाइन लगी थी.. हर किसी को चाह थी कि प्रधानमंत्री योजना के तहत मिलने वाला सरकारी मुफ़्त राशन उसके घर भी पहुंचे। छोटे बाबू लगातार लोगों से लेनदेन के मामले में उलझे हुए थे। सामने फाइलों का अंबार लगा था। 

ये किसकी फाइल है भाई, तुलसी कौन है? कौन है तुलसीदास? - छोटे बाबू बोले।
तभी चोटीधारी एक शख्स माथे पर टीका लगाए धोती में छोटे बाबू के सामने नमूदार होता है, और कहता है -

हर दिन आवत जात हूं, लगी रहता है आस
राशन कार्ड बना नहीं, नाम है तुलसीदास ।


छोटे बाबू ने ऐनक नीचे करते हुए तुलसीदास को बड़े गौर से देखा और बोले - क्या कहना चाहते हो?


तुलसी बोले- अब विलम्ब केहि कारन कीन्हा, जौन कह्यों तौन हम दीन्हां।

लेकिन तुमने सब कुछ तो दिया, आधार नहीं दिया -छोटे बाबू बोले।

सकल बिस्व कै राम अधारा, हमरौ करिहैं बेड़ा पारा-तुलसीदास बोले।

लेकिन बाबा यहां तो प्रमाणपत्र चलता है, कागज वाला, वही लाओ -छोटे बाबू बोले।

जस प्रमाण दीन्हेंनि हनुमंता, वस चाहौ तौ देइ तुरंता -तुलसीदास खीझते हुए बोले।

छोटे बाबू बोले -नहीं महाराज, आपको छाती फाड़ने की ज़रूरत नहीं है। अच्छा बताइये आपके परिवार में कितने लोग हैं, कौन-कौन है।
 

पत्नी एक नाम है रत्ना, बालक नाहिं करेहुं बहु जतना, याचक की तरह तुलसी का दर्द फूटा।

अच्छा अब सबसे ज़रूरी बात ये बताइये कि आपकी इनकम कितनी है, यानी आमदनी - छोटे बाबू मुद्दे पर आए।

मैं चाकर हूं राम पियारा, बिनु वेतन अरु बिन आहारा-तुलसी बोले।

मेरा मतलब था कि तुम टैक्स पेयर हो या नहीं? किसी टैक्स स्लैब में आते हो या नहीं, ओह, तुम तो अंग्रेजी जानते नहीं हो। मेरा मतलब कि कर देते हो या नहीं?, उंगलियों से पैसे का इशारा करते हुए छोटे बाबू बोले।

हाथ जोड़ते हुए तुलसी विनम्र हो कर बोले -

कर-कर के कर दुख गए, जोड़े हूं कर भाय
का करिहौ कर पूछिकै, कर दीजौ कोऊ उपाय।

 

अच्छा ये बताओ कि तुम किराए पर रहते हो या अपना मकान है, कितने स्क्वायर फीट में है, कौन गांव है? – छोटे बाबू ने आखिरी पासा फेंकना चाहा।

दीन-हीन तुलसी बोले -

गंगा तीरे रहत हूं, जहं तरुवर की छांव
पर्ण कुटी छाई अहै, उहै हमारो गांव।


तब तो आपका जाति प्रमाणपत्र भी नहीं होगा, कौन जाति के हो –छोटे बाबू तुलसी को हेय दृष्टि से देखते हुए बोले।

सिर पर शिखा विराजती, माथे पर तिरपुण्ड
तबहुं नहीं तुम चीन्हते, समझे का काकभुशुण्ड?।

 

परेशान हो कर छोटे बाबू बोले - तो सीधे-सीधे काहे नहीं कहते हो कि ब्राह्मण हो, पहेली क्यों बुझाते हो? कार्ड चाहिए तो कुछ खर्चा-पानी करो, EWS कोटा से जुगाड़ हो जाएगा, बोलो मंजूर है?

दमड़ी पीछे अस पड़े, जस चिउंटा गुड़ माहि
धरौ कार्ड तुम आपुनो, हमै चाहिए नाहिं।


और छोटे बाबू के सामने गुस्से में अपनी फाइल पटकते हुए, अपनी शिखा पर हाथ फेरते हुए तुलसीदास घर को वापस लौट आए और फिर व्यथित मन से यें दोहा गढ़ डाला –

तुलसी कबहुं न जाइए, सरकारी बाबू के पास,
बोटी-बोटी नोचिहैं, रहए न पाए मांस।


- करुणेश त्रिपाठी

महफ़िल शायरी

मोहब्बत करने वाले कम न होंगे
तिरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे
- हफ़ीज़ होशियारपुरी 


भाँप ही लेंगे इशारा सर-ए-महफ़िल जो किया
ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं
- लाला माधव राम जौहर 


तुम हुस्न की ख़ुद इक दुनिया हो शायद ये तुम्हें मालूम नहीं
महफ़िल में तुम्हारे आने से हर चीज़ पे नूर आ जाता है
- साहिर लुधियानवी


तेरी महफ़िल से उठाता ग़ैर मुझ को क्या मजाल
देखता था मैं कि तू ने भी इशारा कर दिया
- हसरत मोहानी 

एक महफ़िल में कई महफ़िलें होती हैं शरीक
जिस को भी पास से देखोगे अकेला होगा
- निदा फ़ाज़ली 


बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तिरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी
- बहादुर शाह ज़फ़र 

घर में ख़ुद को क़ैद तो मैं ने आज किया है
तब भी तन्हा था जब महफ़िल महफ़िल था मैं
- शारिक़ कैफ़ी 


तिरे सिवा भी कहीं थी पनाह भूल गए
निकल के हम तिरी महफ़िल से राह भूल गए
- मजरूह सुल्तानपुरी 

तेरे होते हुए महफ़िल में जलाते हैं चराग़
लोग क्या सादा हैं सूरज को दिखाते हैं चराग़
- अहमद फ़राज़ 


शायद मुझे निकाल के पछता रहे हों आप
महफ़िल में इस ख़याल से फिर आ गया हूँ मैं
- अब्दुल हमीद अदम

बदलते मौसम पर शेर

उम्मीद ओ यास की रुत आती जाती रहती है
मगर यक़ीन का मौसम नहीं बदलता है
- मंज़ूर हाशमी 


मिरी ज़बान के मौसम बदलते रहते हैं
मैं आदमी हूँ मिरा ए'तिबार मत करना
- आसिम वास्ती 


बर्क़ बाराँ तीरगी और ज़लज़ला
बदला बदला सा है मौसम का मिज़ाज
- आसिम शहनवाज़ शिबली 


ज़रा मौसम तो बदला है मगर पेड़ों की शाख़ों पर नए पत्तों के आने में अभी कुछ दिन लगेंगे
बहुत से ज़र्द चेहरों पर ग़ुबार-ए-ग़म है कम बे-शक पर उन को मुस्कुराने में अभी कुछ दिन लगेंगे
- जावेद अख़्तर

गए मौसम में जो खिलते थे गुलाबों की तरह
दिल पे उतरेंगे वही ख़्वाब अज़ाबों की तरह
- परवीन शाकिर 


मंज़र मंज़र जी लो जितना जी पाओ
मौसम पल पल रंग बदलता रहता है
- अज़हर इक़बाल 

मैं बदलते मौसमों के रंग से बेज़ार हूँ
हर नई रुत से चमन में बरसर-ए-पैकार हूँ
- सबा नक़वी 


हवा सहर की है इन दिनों में
बदलते मौसम के ख़्वाब जैसी
- मुनीर नियाज़ी 

तेरे तेवर देख के अक्सर
मौसम रंग बदलता होगा
- ख़्वाजा साजिद 


ग़मों की रुत हो या कोई ख़ुशी का मौसम हो
बदलते रहते हैं मौसम बदलता रहता है
- अब्दुल्लाह नदीम

बसंत के मौसम पर शेर

साक़ी कुछ आज तुझ को ख़बर है बसंत की
हर सू बहार पेश-ए-नज़र है बसंत की
- उफ़ुक़ लखनवी


मुँह पर नक़ाब-ए-ज़र्द हर इक ज़ुल्फ़ पर गुलाल
होली की शाम ही तो सहर है बसंत की
लाला माधव राम जौहर 

अब के बसंत आई तो आँखें उजड़ गईं
सरसों के खेत में कोई पत्ता हरा न था
- बिमल कृष्ण अश्क 


पूरा करेंगे होली में क्या वादा-ए-विसाल
जिन को अभी बसंत की ऐ दिल ख़बर नहीं
- कल्ब-ए-हुसैन नादिर 

किसी ईद पर या बसंत पर वो मिलेगा उम्र के अंत पर
मैं ये सोचता हूँ कि ये भी कोई बहाना हो कहीं यूँ न हो
- साबिर ज़फ़र 

पत्थर नहीं हैं आप तो पसीजिए हुज़ूर

पत्थर नहीं हैं आप तो पसीजिए हुज़ूर ।
संपादकी का हक़ तो अदा कीजिए हुज़ूर ।

अब ज़िंदगी के साथ ज़माना बदल गया,
पारिश्रमिक भी थोड़ा बदल दीजिए हुज़ूर ।
 
कल मयक़दे में चेक दिखाया था आपका,
वे हँस के बोले इससे ज़हर पीजिए हुज़ूर ।

शायर को सौ रुपए तो मिलें जब ग़ज़ल छपे,
हम ज़िन्दा रहें ऐसी जुगत कीजिए हुज़ूर ।

लो हक़ की बात की तो उखड़ने लगे हैं आप,
शी! होंठ सिल के बैठ गए, लीजिए हुजूर ।

जब आपका ग़ज़ल में हमें ख़त मिला हुज़ूर ।
पढ़ते ही यक-ब-यक ये कलेजा हिला हुज़ूर ।

ये "धर्मयुग" हमारा नहीं सबका पत्र है,
हम घर के आदमी हैं हमीं से गिला हुज़ूर ।
 

भोपाल इतना महँगा शहर तो नहीं कोई,
महँगी का बाँधते हैं हवा में किला हुज़ूर ।

पारिश्रमिक का क्या है बढ़ा देंगे एक दिन,
पर तर्क आपका है बहुत पिलपिला हुज़ूर ।

शायर को भूख ने ही किया है यहाँ अज़ीम,
हम तो जमा रहे थे यही सिलसिला हुज़ूर ।

दुष्यंत कुमार 

 

हँस-हँस कर यहाँ निराशा, थी अपने खेल दिखाती

रीती होती जाती थी

जीवन की मधुमय प्याली।
फीकी पड़ती जाती थी
मेरे यौवन की लाली।।

हँस-हँस कर यहाँ निराशा
थी अपने खेल दिखाती।
धुंधली रेखा आशा की
पैरों से मसल मिटाती।।

युग-युग-सी बीत रही थीं
मेरे जीवन की घड़ियाँ।
सुलझाये नहीं सुलझती
उलझे भावों की लड़ियाँ।

जाने इस समय कहाँ से
ये चुपके-चुपके आए।
सब रोम-रोम में मेरे
ये बन कर प्राण समाए।

मैं उन्हें भूलने जाती
ये पलकों में छिपे रहते।
मैं दूर भागती उनसे
ये छाया बन कर रहते।

विधु के प्रकाश में जैसे
तारावलियाँ घुल जातीं।
वालारुण की आभा से
अगणित कलियाँ खुल जातीं।।
 

आओ हम उसी तरह से
सब भेद भूल कर अपना।
मिल जाएँ मधु बरसायें
जीवन दो दिन का सपना।।

फिर छलक उठी है मेरे
जीवन की मधुमय प्याली।
आलोक प्राप्त कर उनका
चमकी यौवन की लाली।।

Subhadra Kumari Chauhan




पल में काँटा बदल गया

कूड़ा करकट रहा सटकता, चुगे न मोती हंसा ने
करी जतन से जर्जर तन की लीपापोती हंसा ने
पहुँच मसख़रों के मेले में धरा रूप बाजीगर का
पड़ा गाल पर तभी तमाचा, साँसों के सौदागर का
हंसा के जड़वत् जीवन को चेतन चाँटा बदल गया
तुलने को तैयार हुआ तो पल में काँटा बदल गया

रिश्तों की चाशनी लगी थी फीकी-फीकी हंसा को
जायदाद पुरखों की दिखी ढोंग सरीखी हंसा को
पानी हुआ ख़ून का रिश्ता उस दिन बातों बातों में
भाई सगा खड़ा था सिर पर लिए कुदाली हाथों में
खड़ी हवेली के टुकड़े कर हिस्सा बाँटा बदल गया
 

खेल-खेल में हुई खोखली आख़िर खोली हंसा की
नीम हक़ीमों ने मिल-जुलकर नव्ज़ टटोली हंसा की
कब तक हंसा बंदी रहता तन की लौह सलाखों में
पल में तोड़ सांस की सांकल प्राण आ बसे आंखों में
जाने कब दारुण विलाप में जड़ सन्नाटा बदल गया
 

मिला हुक़म यम के हरकारे पहुँचे द्वारे हंसा के
पंचों ने सामान जुटा पाँहुन सत्कारे हंसा के
धरा रसोई, नभ रसोइया, चाकर पानी अगन हवा
देह गुंदे आटे की लोई मरघट चूल्हा चिता तवा
निर्गुण रोटी में काया का सगुण परांठा बदल गया


अल्हड़ बीकानेरी

वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो

वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो
वही या'नी वा'दा निबाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो

वो जो लुत्फ़ मुझ पे थे बेशतर वो करम कि था मिरे हाल पर
मुझे सब है याद ज़रा ज़रा तुम्हें याद हो कि न याद हो
वो नए गिले वो शिकायतें वो मज़े मज़े की हिकायतें
वो हर एक बात पे रूठना तुम्हें याद हो कि न याद हो

कभी बैठे सब में जो रू-ब-रू तो इशारतों ही से गुफ़्तुगू
वो बयान शौक़ का बरमला तुम्हें याद हो कि न याद हो
 

हुए इत्तिफ़ाक़ से गर बहम तो वफ़ा जताने को दम-ब-दम
गिला-ए-मलामत-ए-अक़रिबा तुम्हें याद हो कि न याद हो

कोई बात ऐसी अगर हुई कि तुम्हारे जी को बुरी लगी
तो बयाँ से पहले ही भूलना तुम्हें याद हो कि न याद हो
 

कभी हम में तुम में भी चाह थी कभी हम से तुम से भी राह थी
कभी हम भी तुम भी थे आश्ना तुम्हें याद हो कि न याद हो

सुनो ज़िक्र है कई साल का कि किया इक आप ने वा'दा था
सो निबाहने का तो ज़िक्र क्या तुम्हें याद हो कि न याद हो
 

कहा मैं ने बात वो कोठे की मिरे दिल से साफ़ उतर गई
तो कहा कि जाने मिरी बला तुम्हें याद हो कि न याद हो

वो बिगड़ना वस्ल की रात का वो न मानना किसी बात का
वो नहीं नहीं की हर आन अदा तुम्हें याद हो कि न याद हो
 

जिसे आप गिनते थे आश्ना जिसे आप कहते थे बा-वफ़ा
मैं वही हूँ 'मोमिन'-ए-मुब्तला तुम्हें याद हो कि न याद हो

मोमिन ख़ां मोमिन 

उस जैसा तो दूसरा मिलना था दुश्वार

मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार 
दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार 

सीधा-साधा डाकिया जादू करे महान 
एक ही थैले में भरे आँसू और मुस्कान

उस जैसा तो दूसरा मिलना था दुश्वार 
लेकिन उस की खोज में फैल गया संसार 
 

घर को खोजें रात दिन घर से निकले पाँव 
वो रस्ता ही खो गया जिस रस्ते था गाँव 
 

नैनों में था रास्ता हृदय में था गाँव 
हुई न पूरी यात्रा छलनी हो गए पाँव 
 

मैं भी तू भी यात्री चलती रुकती रेल 
अपने अपने गाँव तक सब का सब से मेल 
 

चिड़िया ने उड़ कर कहा मेरा है आकाश 
बोला शिकरा डाल से यूँही होता काश 
 

बच्चा बोला देख कर मस्जिद आली-शान 
अल्लाह तेरे एक को इतना बड़ा मकान 
 

सब की पूजा एक सी अलग अलग हर रीत 
मस्जिद जाए मौलवी कोयल गाए गीत 
 

वो सूफ़ी का क़ौल हो या पंडित का ज्ञान 
जितनी बीते आप पर उतना ही सच मान 


निदा फ़ाज़ली