Tuesday, December 31, 2019

आना हो तुम्हें तो हक़ीक़त में आओयूँ सपनों में आकर मुझे न तड़पाओ

आना हो तुम्हें तो हक़ीक़त में आओ
यूँ सपनों में आकर मुझे न तड़पाओ


सब ख़्वाहिशें पूरी हों 'दोस्त' ऐसा नहीं है जैसे कई अशआर मुकम्मल नहीं होते

सब ख़्वाहिशें पूरी हों 'दोस्त' ऐसा नहीं है 
जैसे कई अशआर मुकम्मल नहीं होते 


आना हो तुम्हें तो हक़ीक़त में आओयूँ सपनों में आकर मुझे न तड़पाओ

आना हो तुम्हें तो हक़ीक़त में आओ
यूँ सपनों में आकर मुझे न तड़पाओ


न तापी जाती है आग तुमसे न डाला जाता है तुम से पानी.

उठा के शोले हमारे दिल में अलाव से दूर क्यों खड़ी हो,

न तापी जाती है आग तुमसे न डाला जाता है तुम से पानी.

तू दिसम्बर की धूप, सी गायब सी रहती हैं.

मैं यादों की सर्दी मे ठिठुरता सा रेहता हूं.. 
तू दिसम्बर की धूप, सी गायब सी रहती हैं.

तू दिसम्बर की धूप, सी गायब सी रहती हैं.

मैं यादों की सर्दी मे ठिठुरता सा रेहता हूं.. 
तू दिसम्बर की धूप, सी गायब सी रहती हैं.

सर्दी लगी तो ख़ुद को दोबारा पहन लिया.

गर्मी लगी तो ख़ुद से अलग हो के सो गए,
सर्दी लगी तो ख़ुद को दोबारा पहन लिया.

तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं

तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं

मैं बेपनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ
मैं इन नज़ारों का अँधा तमाशबीन नहीं

#दुष्यंत_कुमार

तिरा ज़िक्र क्या था अलाव था

बड़ी सर्द रात थी कल मगर बड़ी आँच थी बड़ा ताव था
सभी तापते रहे रात भर तिरा ज़िक्र क्या था अलाव था

Monday, December 30, 2019

तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं

तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं

मैं बेपनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ
मैं इन नज़ारों का अँधा तमाशबीन नहीं

#दुष्यंत_कुमार