Monday, June 5, 2023

मेरा ये ख़्वाब कि तुम मेरे क़रीब आई हो

मेरा ये ख़्वाब कि तुम मेरे क़रीब आई हो 

अपने साए से झिझकती हुई घबराती हुई 
अपने एहसास की तहरीक पे शरमाती हुई 
अपने क़दमों की भी आवाज़ से कतराती हुई
 
अपनी साँसों के महकते हुए अंदाज़ लिए 
अपनी ख़ामोशी में गहनाए हुए राज़ लिए 
अपने होंटों पे इक अंजाम का आग़ाज़ लिए 
दिल की धड़कन को बहुत रोकती समझाती हुई 
अपनी पायल की ग़ज़ल-ख़्वानी पे झल्लाती हुई 

नर्म शानों पे जवानी का नया बार लिए 
शोख़ आँखों में हिजाबात से इंकार लिए 
तेज़ नब्ज़ों में मुलाक़ात के आसार लिए 
काले बालों से बिखरती हुई चम्पा की महक 
सुर्ख़ आरिज़ पे दमकते हुए शालों की चमक 
नीची नज़रों में समाई हुई ख़ुद्दार झिजक 

नुक़रई जिस्म पे वो चाँद की किरनों की फुवार 
चाँदनी रात में बुझता हुआ पलकों का सितार 
फ़र्त-ए-जज़्बात से महकी हुई साँसों की क़तार 
दूर माज़ी की बद-अंजाम रिवायात लिए 
नीची नज़रें वही एहसास-ए-मुलाक़ात लिए 
वही माहौल वही तारों भरी रात लिए 

आज तुम आई हो दोहराती हुई माज़ी को 
मेरा ये ख़्वाब कि तुम मेरे क़रीब आई हो 
काश इक ख़्वाब रहे तल्ख़ हक़ीक़त न बने 
ये मुलाक़ात भी दीवाने की जन्नत न बने 

Waseem Barelvi



रूह को सुकून देती हैं, तुम्हारी आंखें

रूह को सुकून देती हैं, तुम्हारी आंखें

दुनिया में सबसे हसीं हैं, तुम्हारी आंखें 

हमको लत लग चुकी है जिस नशे की 
दुनिया की वो सर्वोत्तम मधुशाला हैं .. 
तुम्हारी आंखें 

आओ निहारो एक बार, सलीके से आईने को 
तुम्हे ही मदहोश कर देंगी, तुम्हारी आंखें 

वो एक रोज पूंछ बैठे आईने से 
क्यों इतनी हसीन दी ये आंखें 

आईने ने कहा - जो नशा नही करते हैं 
उन्हे मदहोश करने को दी ये आंखें ll 


क्या बताऊँ कैसा ख़ुद को दर-ब-दर मैं ने किया


क्या बताऊँ कैसा ख़ुद को दर-ब-दर मैं ने किया, 

उम्र-भर किस किस के हिस्से का सफ़र मैं ने किया


तू तो नफ़रत भी न कर पाएगा इस शिद्दत के साथ 
जिस बला का प्यार तुझ से बे-ख़बर मैं ने किया 

कैसे बच्चों को बताऊँ रास्तों के पेच-ओ-ख़म 
ज़िंदगी-भर तो किताबों का सफ़र मैं ने किया 

किस को फ़ुर्सत थी कि बतलाता तुझे इतनी सी बात 
ख़ुद से क्या बरताव तुझ से छूट कर मैं ने किया 

चंद जज़्बाती से रिश्तों के बचाने को 'वसीम' 
कैसा कैसा जब्र अपने आप पर मैं ने किया  

Waseem Barelvi

ये तो नहीं कि ग़म नहीं, हाँ मिरी आँख नम नहीं

ये तो नहीं कि ग़म नहीं

हाँ मिरी आँख नम नहीं 
नश्शा सँभाले है मुझे 
बहके हुए क़दम नहीं 

कहते हो दहर को भरम 
मुझ को तो ये भरम नहीं 

और ही है मक़ाम-ए-दिल 
दैर नहीं हरम नहीं 

तुम भी तो तुम नहीं हो आज 
हम भी तो आज हम नहीं 

क्या मिरी ज़िंदगी तिरी 
भूली हुई क़सम नहीं 

'ग़ालिब'-ओ-'मीर'-ओ-'मुसहफ़ी' 
हम भी 'फ़िराक़' कम नहीं 

Firaq Gorakhpuri


Friday, June 2, 2023

तुम्हारे साथ रहकरअक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है

तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है
कि दिशाएं पास आ गयी हैं,
हर रास्ता छोटा हो गया है,
दुनिया सिमटकर
एक आँगन-सी बन गयी है
जो खचाखच भरा है,
कहीं भी एकान्त नहीं
न बाहर, न भीतर।

हर चीज़ का आकार घट गया है,
पेड़ इतने छोटे हो गये हैं
कि मैं उनके शीश पर हाथ रख
आशीष दे सकता हूँ,
आकाश छाती से टकराता है,
मैं जब चाहूँ बादलों में मुँह छिपा सकता हूँ।

तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे महसूस हुआ है
कि हर बात का एक मतलब होता है,
यहाँ तक कि घास के हिलने का भी,
हवा का खिड़की से आने का,
और धूप का दीवार पर
चढ़कर चले जाने का।

तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे लगा है
कि हम असमर्थताओं से नहीं
सम्भावनाओं से घिरे हैं,
हर दिवार में द्वार बन सकता है
और हर द्वार से पूरा का पूरा
पहाड़ गुज़र सकता है।

शक्ति अगर सीमित है
तो हर चीज़ अशक्त भी है,
भुजाएँ अगर छोटी हैं,
तो सागर भी सिमटा हुआ है,
सामर्थ्य केवल इच्छा का दूसरा नाम है,
जीवन और मृत्यु के बीच जो भूमि है
वह नियति की नहीं मेरी है।

एक रोज़ आपसे किनारा कर के

एक रोज़ आपसे किनारा कर के
हम भी देखेंगे फाकों में गुजारा कर के

जमीर जगेगा या आंखों को शर्म आयेगी
जब इबादत को जायेंगे आप तौबा कर के

ये तो सच है की हमने सारी उम्र कुछ न किया
आपने क्या हासिल किया हम जैसों से किनारा कर के

जाइए जा कर आसमान को छू लीजिए
हमारी बज्म में ना आइए अपना खसारा कर के

हम जैसे लोग तो खुद को भी नहीं लगते अच्छे
आपने अच्छा किया,बहुत अच्छा किया हमसे किनारा कर के

मोहब्बत में भीगने कामियाद नही रहा

वफा करते समय
कुछ भी याद नही रहा
मोहब्बत में भीगने का
मियाद नही रहा
खुशबू उड गई
तितली उड़ जाने के बाद
गुलशन का भौंरा
तब से आजाद नही रहा

उदासी आसमाँ है दिल मिरा कितना अकेला है


उदासी आसमाँ है दिल मिरा कितना अकेला है


परिंदा शाम के पुल पर बहुत ख़ामोश बैठा है

मैं जब सो जाऊँ इन आँखों पे अपने होंट रख देना
यक़ीं आ जाएगा पलकों तले भी दिल धड़कता है

तुम्हारे शहर के सारे दिए तो सो गए कब के
हवा से पूछना दहलीज़ पे ये कौन जलता है

अगर फ़ुर्सत मिले पानी की तहरीरों को पढ़ लेना
हर इक दरिया हज़ारों साल का अफ़्साना लिखता है

कभी मैं अपने हाथों की लकीरों से नहीं उलझा
मुझे मालूम है क़िस्मत का लिक्खा भी बदलता है 

Bashir Badra

गर करते थे मोहब्बत मुझसे इतनी

आंखों में अपनी छुपा लिया मुझको
किसीको को  भी बताया  क्यों नही
गर करते थे मोहब्बत मुझसे इतनी
तो फिर मुझे कभी जताया क्यों नही

अकेले  ही गम  ए  इश्क  सहते  रहे
छुपछुपके कभी रोते कभी हसते रहे
खुद जलते रहे मेरी बेरुखी से ऐसेही
दिलसे मुझे वाकिफ कराया क्यो नही

झुलस रहे थे हम तपिश ए दुनिया से
जुल्फों में  अपनी छुपाया क्यों नही
वजह मेरी नाराजगी की गलत फहमी थी
तो  फिर मुझे  प्यार से  मनाया  क्यों नही

हटाते नही परदा वो चेहरे से अपने और
पूछते है मुझ से मेरी नाराजगी का सबब
अब कैसे कहे कोई प्यासा समंदर से की
था बेपनाह पानी  फिर पिलाया क्यों नहीं

हो जाय  अगर उनसे  मुलाकात  कभी
सवाल  उनसे  बस  एक  ही  पूछना  है
जलाया था दिल मे जो चिराग मुहब्बत का
बिछड़ने से  पहले उसे  बुझाया  क्यो  नही

Thursday, June 1, 2023

नज़र हटी थी कि फिर मुस्कुरा के लूट लिया

नज़र मिला के मिरे पास आ के लूट लिया 

नज़र हटी थी कि फिर मुस्कुरा के लूट लिया 

शिकस्त-ए-हुस्न का जल्वा दिखा के लूट लिया 
निगाह नीची किए सर झुका के लूट लिया 

दुहाई है मिरे अल्लाह की दुहाई है 
किसी ने मुझ से भी मुझ को छुपा के लूट लिया 

सलाम उस पे कि जिस ने उठा के पर्दा-ए-दिल 
मुझी में रह के मुझी में समा के लूट लिया 

उन्हीं के दिल से कोई उस की अज़्मतें पूछे 
वो एक दिल जिसे सब कुछ लुटा के लूट लिया 

यहाँ तो ख़ुद तिरी हस्ती है इश्क़ को दरकार 
वो और होंगे जिन्हें मुस्कुरा के लूट लिया 
ख़ुशा वो जान जिसे दी गई अमानत-ए-इश्क़ 
रहे वो दिल जिसे अपना बना के लूट लिया 

निगाह डाल दी जिस पर हसीन आँखों ने 
उसे भी हुस्न-ए-मुजस्सम बना के लूट लिया 

बड़े वो आए दिल ओ जाँ के लूटने वाले 
नज़र से छेड़ दिया गुदगुदा के लूट लिया 

रहा ख़राब-ए-मोहब्बत ही वो जिसे तू ने 
ख़ुद अपना दर्द-ए-मोहब्बत दिखा के लूट लिया 

कोई ये लूट तो देखे कि उस ने जब चाहा 
तमाम हस्ती-ए-दिल को जगा के लूट लिया 

करिश्मा-साज़ी-ए-हुस्न-ए-अज़ल अरे तौबा 
मिरा ही आईना मुझ को दिखा के लूट लिया 

न लुटते हम मगर उन मस्त अँखड़ियों ने 'जिगर' 
नज़र बचाते हुए डबडबा के लूट लिया 

Jigar Muradabadi