दौलत नहीं, शोहरत नहीं,
ना वाह वाह चाहिये।
कहाँ हो ? कैसे हो ?
बस दो लब्जों की परवाह चाहिये।।
Tuesday, October 23, 2018
कहाँ हो, कैसे हो
Saturday, October 13, 2018
दोस्त पुराने
अब ना मैं हूँ, ना बाकी हैं ज़माने मेरे,
फिर भी मशहूर हैं शहरों में फ़साने मेरे,
ज़िन्दगी है तो नए ज़ख्म भी लग जाएंगे,
अब भी बाकी हैं कई दोस्त पुराने मेरे।
हिफाज़त
जो तीर भी आता वो खाली नहीं जाता,
मायूस मेरे दिल से सवाली नहीं जाता।
काँटे ही किया करते हैं फूलों की हिफाज़त,
फूलों को बचाने कोई माली नहीं जाता।
बेमुकाम
शायद यही ज़िंदगी का इम्तिहान होता है,
कि हर एक शख्स गुलाम होता है।
कोई ढूढ़ता है ज़िंदगी भर मंज़िलों को,
कोई पाकर मंज़िलों को भी बेमुकाम होता है।।
Sunday, October 7, 2018
Tuesday, October 2, 2018
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