Monday, October 2, 2017

यूं ही बेसबब न फिरा करो

यूं ही बेसबब न फिरा करो, शाम घर भी रहा करो
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है, उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो

कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो

अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आएगा, कोई जाएगा
तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया, उसे भूलने की दुआ करो

मुझे इश्तिहार-सी लगती हैं, ये मोहब्बतों की कहानियां
जो कहा नहीं, वो सुना करो, जो सुना नहीं, वो कहा करो

ये ख़िज़ां की ज़र्द-सी शाल में, जो उदास पेड़ के पास है
ये तुम्हारे घर की बहार है, इसे आंसुओं से हरा करो

-बशीर बद्र

आरज़ुओं का सिलसिला

आरज़ुओं का सिलसिला कब ख़त्म होगा ऐ दोस्त,
खिल गये गुल तो, कलियाँ और पैदा हो गयीं!

हर उम्र में प्यार

क्या खूब रंग दिखाती है जिंदगी,
क्या इक्तेफ़ाक होता है।
प्यार में ऊम्र नही होती पर,
हर ऊम्र में प्यार होता है!

तुम्हारे नाम

दिल में हमने तुम्हारे प्यार
की दास्तान लिखी है,
ना थोड़ी ना तमाम लिखी है,
कभी हमारे लिये भी दुआ,
कर लिया करो सनम,
हमने तो हर एक सांस
तुम्हारे नाम लिखी है !❤

उम्र

एक "उम्र" के बाद,
"उस उम्र" की बातें,
"उम्र भर" याद आती हैं।
पर "वह उम्र" फिर,
"उम्र भर" नहीं आती!
   

थमें रास्ते

गुज़र जाते हैं खूबसूरत लम्हें,
यूँ ही मुसाफिरों की तरह।
यादें वहीं खड़ी रह जाती हैं,
थमें रास्तों की तरह!

तुम

चाहत बन गये हो या,
आदत बन गये हो तुम!
हर सांस में यूँ आते जाते हो,
जैसे इबादत बन गये हो तुम!

मालूम

ज़िन्दगी में हर चीज मालूम हो,
ये जरुरी तो नहीं,
देखो ना...
तुम साँसों में रहोगे ये मालूम है,
साँसें कब तक चलेंगी ये मालूम नहीं!

तुम मिले और

“हमें कहाँ मालूम था, कि इश्क़ होता क्या है?
बस एक ‘तुम’ मिले और ज़िन्दगी, मुहब्बत बन गई!

फासला

फ़ासला भी ज़रूरी था,
चिराग़ रौशन करते वक़्त!
पर ये तजुर्बा हासिल हुआ,
हाथ के जल जाने के बाद.!!