Monday, April 13, 2020

एहतियात शायरी

कुछ एहतियात परिंदे भी रखना भूल गए
कुछ इंतिक़ाम भी आँधी ने बदतरीन लिए
- नुसरत ग्वालियारी

यानी कुछ इस तरह कि तुझे भी ख़बर न हो
इस एहतियात से तुझे देखा करूँगा मै
- अजमल सिराज

वो मेरे घर नहीं आता मैं उस के घर नहीं जाता
मगर इन एहतियातों से तअल्लुक़ मर नहीं जाता
- वसीम बरेलवी

मुझे संभालने में इतनी एहतियात न कर
बिखर न जाऊं कहीं मैं तिरी हिफ़ाज़त में
- सलीम कौसर


कुछ एहतियात परिंदे भी रखना भूल गए
कुछ इंतिक़ाम भी आंधी ने बदतरीन लिए
- नुसरत ग्वालियारी

लेते हैं लोग सांस भी अब एहतियात से
छोटा सा ही सही कोई फ़ित्ना उठाइए
- शहज़ाद अहमद


दिल की हालत अगर नहीं बदली
एहतियात-ए-नज़र से क्या होगा
- शम्सी मीनाई

वो मेरे घर नहीं आता मैं उस के घर नहीं जाता
मगर इन एहतियातों से तअल्लुक़ मर नहीं जाता
- वसीम बरेलवी


ज़मीं पे पांव ज़रा एहतियात से धरना
उखड़ गए तो क़दम फिर कहाँ संभलते हैं
- नजीब अहमद

तू बहुत एहतियात करता था
तेरे हाथों में आज क्यूं नहीं कुछ
- महमूद अज़हर


दिल की वारफ़्तगी है अपनी जगह
फिर भी कुछ एहतियात सी है अभी
- अहमद फ़राज़

संभल संभल के चलो एहतियात से पहनो
बड़े नसीब से मिलता है आदमी का लिबास
- असग़र मेहदी होश


अब एहतियात की दीवार क्या उठाते हो
जो चोर दिल में छुपा था वो काम कर भी गया
- अहमद फ़राज़

तेरे ख्याल से कभी फुर्सत नहीं मिली

सब कुछ मिला सुकून की दौलत नहीं मिली, 
एक तुझको भूल जाने की मौहलत नहीं मिली, 

करने को बहुत काम थे अपने लिए मगर, 
हमको तेरे ख्याल से कभी फुर्सत नहीं मिली।। 

रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यूँ हैं

मैं ना जुगनू हूँ, दिया हूँ ना कोई तारा हूँ,
रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यूँ हैं......

नींद से मेरा तअल्लुक़ ही नहीं बरसों से, 
ख़्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यूँ हैं....

तेरे ख्याल से कभी फुर्सत नहीं मिली

सब कुछ मिला सुकून की दौलत नहीं मिली, 
एक तुझको भूल जाने की मौहलत नहीं मिली, 

करने को बहुत काम थे अपने लिए मगर, 
हमको तेरे ख्याल से कभी फुर्सत नहीं मिली।। 

आपकी खुशी की ख़्वाहिश की.

ना दुआ माँगी ना कोई #गुज़ारिश की, 
ना कोई फरियाद ना कोई नुमाइश की

जब भी झुका सर खुदा के आगे,
हमने बस आपकी खुशी की ख़्वाहिश की. 

बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए: राहत इंदौरी

बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए 
मैं पीना चाहता हूँ पिला देनी चाहिए 

अल्लाह बरकतों से नवाज़ेगा इश्क़ में 
है जितनी पूँजी पास लगा देनी चाहिए 

दिल भी किसी फ़क़ीर के हुजरे से कम नहीं 
दुनिया यहीं पे ला के छुपा देनी चाहिए

मैं ख़ुद भी करना चाहता हूँ अपना सामना 
तुझ को भी अब नक़ाब उठा देनी चाहिए 

मैं फूल हूँ तो फूल को गुल-दान हो नसीब 
मैं आग हूँ तो आग बुझा देनी चाहिए 

मैं ताज हूँ तो ताज को सर पर सजाएँ लोग 
मैं ख़ाक हूँ तो ख़ाक उड़ा देनी चाहिए 
मैं जब्र हूँ तो जब्र की ताईद बंद हो 
मैं सब्र हूँ तो मुझ को दुआ देनी चाहिए 

मैं ख़्वाब हूँ तो ख़्वाब से चौंकाइए मुझे 
मैं नींद हूँ तो नींद उड़ा देनी चाहिए 

सच बात कौन है जो सर-ए-आम कह सके 
मैं कह रहा हूँ मुझ को सज़ा देनी चाहिए! 

सुला कर तेज़ धारों को किनारो तुम न सो जाना

सुला कर तेज़ धारों को किनारो तुम न सो जाना 
रवानी ज़िंदगानी है तो धारो तुम न सो जाना 

मुझे तुम को सुनानी है मुकम्मल दास्ताँ अपनी 
अधूरी दास्ताँ सुन कर सितारो तुम न सो जाना 

तुम्हारे दायरे में ज़िंदगी महफ़ूज़ रहती है 
निज़ाम-ए-बज़्म-ए-हस्ती के हिसारो तुम न सो जाना

तुम्हीं से जागता है दिल में एहसास-ए-रवा-दारी 
क़याम-ए-रब्त-ए-बाहम के सहारो तुम न सो जाना 

अगर नींद आ गई तुम को तो चश्मे सूख जाएँगे 
कभी ग़फ़लत में पड़ कर कोहसारो तुम न सो जाना 
तुम्हीं से बहर-ए-हस्ती में रवाँ है कश्ती-ए-हस्ती 
अगर साहिल भी सो जाएँ तो धारो तुम न सो जाना 

सदा-ए-दर्द की ख़ातिर तुम्हें 'कौसर' ने छेड़ा है 
शिकस्ता-साज़ के बेदार तारो तुम न सो जाना

वो मेरे घर नहीं आता मैं उस के घर नहीं जाता

वो मेरे घर नहीं आता मैं उस के घर नहीं जाता 
मगर इन एहतियातों से तअ'ल्लुक़ मर नहीं जाता 

बुरे अच्छे हों जैसे भी हों सब रिश्ते यहीं के हैं 
किसी को साथ दुनिया से कोई ले कर नहीं जाता 

घरों की तर्बियत क्या आ गई टी-वी के हाथों में 
कोई बच्चा अब अपने बाप के ऊपर नहीं जाता

खुले थे शहर में सौ दर मगर इक हद के अंदर ही 
कहाँ जाता अगर मैं लौट के फिर घर नहीं जाता 

मोहब्बत के ये आँसू हैं उन्हें आँखों में रहने दो 
शरीफ़ों के घरों का मसअला बाहर नहीं जाता 

'वसीम' उस से कहो दुनिया बहुत महदूद है मेरी 
किसी दर का जो हो जाए वो फिर दर दर नहीं जाता! 

वो कहें कैसे हो आप? और मैं रोने लग जाऊं।

ये भी मुमकिन है कि आँख भिगोने लग जाऊं,
वो कहें कैसे हो आप? और मैं रोने लग जाऊं।

-जौन एलिया 

दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में

ज़िंदगी जिस दयार में गुज़री
इक तेरे इख़्तियार में गुज़री
उम्र जो इश्क़ में गुज़रनी थी
वो तेरे इंतज़ार में गुज़री!


‏उम्र-ए-दराज़ माँग के लाई थी चार दिन 
दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में 
~ सीमाब अकबराबादी

वजह तक पूछने का.... मौका ही ना मिला! 
बस लम्हे गुजरते गए.... हम अजनबी होते गए!


रोज़ कहता हूँ कि अब उन को न देखूँगा कभी 
रोज़ उस कूचे में इक काम निकल आता है

#सीमाब_अकबराबादी

ग़म मुझे हसरत मुझे वहशत मुझे सौदा मुझे 
एक दिल दे कर ख़ुदा ने दे दिया क्या क्या मुझे 

है हुसूल-ए-आरज़ू का राज़ तर्क-ए-आरज़ू 
मैं ने दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे 

देखते ही देखते दुनिया से मैं उठ जाऊँगा 
देखती की देखती रह जाएगी दुनिया मुझे 

★★★
सीमाब अकबराबादी

दिल की बिसात क्या थी निगाह-ए-जमाल में 
इक आईना था टूट गया देख-भाल में 

आज़ुर्दा इस क़दर हूँ सराब-ए-ख़याल से 
जी चाहता है तुम भी न आओ ख़याल में 

दुनिया है ख़्वाब हासिल-ए-दुनिया ख़याल है 
इंसान ख़्वाब देख रहा है ख़याल में 

★★★
सीमाब अकबराबादी