Tuesday, January 7, 2014

किसी ज़ेवर की तरह

उसको सजने की, संवरने की.. जरुरत ही क्या है....
उसपे जँचती है हया भी.. किसी ज़ेवर की तरह......

तादाद से क्या होता है

जंग में कागज़ी अफ़राद से क्या होता है....
हिम्मतें लड़ती हैं, तादाद से क्या होता है....

खुश रहने को

नया दिन, महीना , साल , चलो अच्छा है..
खुश रहने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है ।

एक नमी सी

एक गज़ल मीर की पढ़ता है पड़ोसी मेरा....
एक नमी सी.. मेरी दीवार में आ जाती है...

मैं कैसे मान जाऊं

मेरे पास से गुजर कर मेरा हाल तक ना पूछा,
मैं कैसे मान जाऊं की तू दूर जा के रोया..

यादें

अब तो यादें भी बूढ़ी हो गई हैं तेरी,
किसी और के सहारे ही आती है।

एक लम्हा

बंधी है हाथ पे सब के घड़ियाँ मगर,
पकड़ में एक भी लम्हा नहीं...

दो कौड़ी की औकात

आशिकों ने ही दिया है, तुझको ये मुकाम गज़ब का.......
वरना ऐ इश्क.... तेरी दो कौड़ी की औकात नहीं.....

डूबने न दिया

ये समंदर भी 
तेरी तरह खुदगर्ज़ निकला,
ज़िंदा थे तो तैरने न दिया और
मर गए तो डूबने न दिया...

Friday, January 3, 2014

हम अकेले तो गुनहगार नहीं

दीवाने हैं उनके इस बात से इनकार नहीं,
कैसे कहें कि हमे उनसे प्यार नहीं..
कुछ तो कसूर है उनकी अदाओं का दोस्तों,
वरना हम अकेले तो गुनहगार नहीं...