Tuesday, March 31, 2026

अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ

 


अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी सकूँ

ऐसे ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी सकूँ

*

तूफ़ानों से आँख मिलाओ सैलाबों पे वार करो
मल्लाहों का चक्कर छोड़ो तैर के दरिया पार करो

*

ये सहारा जो नहीं हो तो परेशां हो जायें

मुश्किलें जान ही ले लें अगर आसां हो जायें..

*

ये जो कुछ लोग फरिश्तों से बने फिरते हैं

मेरे हथ्ते कभी चढ़ जायें तो इनसां हो जायें...

-राहत इंदौरी

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अपनी हालत का ख़ुद एहसास नहीं है मुझ को

मैं ने औरों से सुना है कि परेशान हूँ मैं

आसी उल्दनी

*

जितने अपने थेसब पराये थे,
हम हवा को गले लगाए थे.

जितनी कसमे थीसब थी शर्मिंदा,
जितने वादे थे
सर झुकाये थे.

जितने आंसू थेसब थे बेगाने,
जितने मेहमां थे
बिन बुलाए थे.

सब किताबें पढ़ी-पढ़ाई थीं,
सारे किस्से सुने-सुनाए थे.


एक बंजर जमीं के सीने में,
मैने कुछ आसमां उगाए थे.

सिर्फ दो घूंट प्यास कि खातिर,
उम्र भर धूप मे नहाए थे.

हाशिए पर खड़े हूए है हम,
हमने खुद हाशिए बनाए थे.

मैं अकेला उदास बैठा था,
सामने कहकहे लगाए थे.

है गलत उसको बेवफा कहना,
हम कौन सा धुले-धुलाए थे.

आज कांटो भरा मुकद्दर है,
हमने गुल भी बहुत खिलाए थे.
डॉ राहत इंदौरी

*

जितने अपने थे, सब पराये थे,

हम हवा को गले लगाये थे,

है तेरा कर्ज मेरी आँखों पर,

तूने सपने बहुत दिखाए थे। 

*

अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो, जान थोड़ी है 
ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है 

लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में 
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है 

मैं जानता हूँ के दुश्मन भी कम नहीं लेकिन 
हमारी तरहा हथेली पे जान थोड़ी है 

हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है 
हमारे मुँह में तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है 

जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे
किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है 

सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में 
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है

 

*

सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए

ऐ ख़ुदा दुश्मन भी मुझ को ख़ानदानी चाहिए

-राहत इंदौरी

 

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